अपनी ही सरजमीं पर महफूज नहीं हैं बेटियां

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अक्षय नेमा//

भारत का दुर्भाग्य है कि उसकी सरजमीं पर उसकी अपनी बेटियां महफूज नहीं है। दिल्ली में एक लड़की के साथ चलती बस में हुआ सामूहिक बलात्कार इसका दर्दनाक उदाहरण है। हमारी प्रदेश सरकारें और केन्द्रीय सरकार महिलाओं को सुरक्षा मुहैयाँ कराने में नाकाम साबित हुई है। अभी हाल ही में दो दिन की मीडिया कार्यशाला के लिए मेरा  भोपाल जाना हुआ। इस कार्यशाला में मध्यप्रदेश सरकार की वास्तविकता सामने आई। जैसे हाथी के दांत  खाने के कुछ और, दिखाने के कुछ और होते है। प्रदेश सरकार का बेटी बचाओ अभियान जितना जोरों पर है, उससे कहीं ज्यादा महिलाओं पर प्रदेश में अत्याचार हो रहे है। एक सर्वेक्षण की रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश में रोजाना 9 बलात्कार किये जा रहे हैं। जिनमे 0-15 तक की 3 बच्चियां,15-30 तक की 2 युवतियां व 30-50  वर्ष की 4 महिलाएं शामिल है। अभी  तक राजस्थान, उत्तरप्रदेश जैसे राज्यों में महिलाएं सुरक्षित नहीं थी, पर हकीकत यह भी है कि मध्यप्रदेश में भी महिलाएं कभी सुरक्षित नहीं रही। भ्रूण हत्याएं आज भी आम है। भिंड,मुरैना,ग्वालियर व रीवा तरफ लिंग परीक्षण का खेल अब भी जारी है और सरकार बेटी बचाओं व कन्यादान के परदे से महिला उत्पीड़न को ढकने का प्रयास कर रही है।

1 जनवरी 2012 से अक्टूबर तक मध्यप्रदेश में 2868 महिलाओं के साथ बलात्कार हुआ, उत्तरप्रदेश में 1040, हरियाणा में 507 और दिल्ली में करीब 635 बलात्कार हुए। बीते वर्ष 2011 की अपेक्षा 2012 में बलात्कार जैसा घिनौना अपराध 29.27 फीसदी की दर से आगे बढ़ा है। रोजाना लगभग 50 महिलाओं के साथ बलात्कार होता है। अर्थात हर एक घंटे दो महिलाओं को इस दरिंदगी का शिकार होना पड़ता है। यदि इस पूरी दर्दनाक हकीकत पर सरकार का नजरिया देखा जाये तो प्रत्येक सरकार का रवैया बिलकुल शुष्क साबित हुआ है। अब देखना होगा कि आगे महिलाओं की सुरक्षा के लिए सरकार की तरफ से क्या वैधानिक कोशिश की जाती है?

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सदियों से इंसान बेहतरी की तलाश में आगे बढ़ता जा रहा है, तमाम तंत्रों का निर्माण इस बेहतरी के लिए किया गया है। लेकिन कभी-कभी इंसान के हाथों में केंद्रित तंत्र या तो साध्य बन जाता है या व्यक्तिगत मनोइच्छा की पूर्ति का साधन। आकाशीय लोक और इसके इर्द गिर्द बुनी गई अवधाराणाओं का क्रमश: विकास का उदेश्य इंसान के कारवां को आगे बढ़ाना है। हम ज्ञान और विज्ञान की सभी शाखाओं का इस्तेमाल करते हुये उन कांटों को देखने और चुनने का प्रयास करने जा रहे हैं, जो किसी न किसी रूप में इंसानियत के पग में चुभती रही है...यकीनन कुछ कांटे तो हम निकाल ही लेंगे।

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    With Best Wishes,
    Shivani

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