आश्वस्त (लघुकथा )

1
18

(उमेश मोहन धवन)

हाथ पैरों में झनझनाहट तथा आँखों में हलका धुँधलापन महसूस होने पर शर्मा जी ने डायबिटीज का शक दूर करने के इरादे से यूँही दफ्तर जाते हुए पेथोलॉजी में अपना खून दे दिया. वैसे उन्हें पक्का यकीन था कि उन्हें डायबिटीज नहीं निकलेगी. आँखों का धुँधलापन और हाथों की झनझनाहट तो देर तक कम्प्यूटर में काम करने की वजह से भी हो सकती है. शाम को रिपोर्ट ली तो शुगर सामान्य से दुगनी निकली. शर्मा जी चिन्तित होकर सोचने लगे “ मुझे छह महीने पहले भी शुगर निकली थी ,पर इलाज से सामान्य हो गयी थी । फिर मैने इलाज तथा परहेज दोनों ही छोड़ दिए तथा अपने को बिल्कुल ठीक समझ रहा था।
इसी सोच में उनका स्कूटर कब डाक्टर की क्लीनिक की तरफ मुड़ गया उन्हें पता भी नहीं चला. रास्ते में वे सोचते जा रहे थे कि डायबिटीज बड़ी तेजी से शरीर के सारे अंगों को नष्ट कर देती है । मेरे दो छोटे बच्चे हैं, कच्ची गृहस्थी है । आज से मैं संकल्प लेता हूँ कि हर प्रकार का मीठा जीवन भर के लिये बंद। एक दिन भी व्यायाम तथा दवा का नागा नहीं करूँगा. डाक्टर के सामने पहुँचकर वे अपराधी की तरह सिर झुकाकर बैठ गए तथा लगभग गिड़गिडाते हुए बोले “डाक्टर साहब,बस एक बार मुझे किसी तरह फिर से सामान्य कर दीजिए। अब वैसी गलतियाँ दोबारा नहीं करूँगा। डाक्टर ने उन्हें ज्यादा ही घबराते हुए देख धीरज बँधाने का प्रयास किया- “ देखिये आप इतना न घबराएँ । बस आप दवा बंद न करें । आपसे अधिक शुगर वाले भी सामान्य जीवन जी रहे हैं । आप भी कुछ दिनों में सामान्य हो जायेंगे।”
शर्मा जी की घबराहट अब काफी कम हो गयी थी,“दवा तो मैं बिल्कुल बंद नहीं करूँगा। वैसे आपकी बातों से मुझे बड़ी राहत मिली ।” शर्माजी आश्वस्त होकर क्लीनिक से बाहर आ गए तथा स्कूटर स्टार्ट करने ही वाले थे कि अचानक उन्हें एक बात याद आ गई। वे वापस क्लीनिक में दाखिल हुए और बोले -“डाक्टर साहब एक बात मैं आप से पूछना भूल गया- मीठे का पूरा परहेज करना है या कभी- कभार थोड़ा ले भी सकता हूँ?”

                                                    ***

1 COMMENT

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here