जन लोकपाल बिल : भ्रष्टाचार का एक और बड़ा कारखाना खोलने की तैयारी

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लोकपाल बिल के स्थान पर जन लोकपाल बिल को लेकर समाजसेवी अन्ना हजारे अनशन पर बैठे हुये हैं और भ्रष्टाचार से त्रस्त भारत में लोगों को बड़ी संख्या में इससे जुड़ने की अपील भी की जा रही है। सवाल उठता है कि क्या वाकई में जन लोकपाल बिल देश को भ्रष्टाचार से मुक्त कराने में सहायक होगा या फिर इसके तहत स्थापित व्यवस्था भी भ्रष्टाचार का एक और बड़ा कारखाना बन जाएगा। पूरा देश भ्रष्टाचार में लिपटा हुआ है, इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिए भ्रष्टाचार का एक और कारखाना खोल दिया जाये।

जन लोकपाल विधयेक का ड्राफ्ट तैयार करने में शांति भूषण, पूर्व आईपीएस किरण बेदी, न्यायधीश एन संतोष हेगड़े, वकील प्रशांत भूषण और पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त जे.एम. लिंग्दोह ने प्रमुख भूमिका निभाई है और इस बिल को लाने के भ्रष्टाचार के विरुद्ध भारत नामक एक संगठन चला रहा है। इस बिल के तहत केंद्र में लोकपाल और राज्यों लोक आयुक्त पर भ्रष्चार के खिलाफ मुहिल चलाते रहने की जिम्मेदारी होगी। इसके दायरे में प्रधान मंत्री सहित तमाम नेताओं और नौकरशाहों को भी लाने की योजना है। देखने और सुनने में यह काफी लुभावना लग रहा है और देश में चारो ओर फैले भ्रष्टाचार से निजात पाने की छटपटाहट के कारण लोग इसकी ओर आकर्षित भी हो रहे हैं और सबसे बड़ी बात यह है कि इसका प्रस्तुतिकरण बहुत ही धमाकेदार तरीके से किया जा रहा है। लेकिन क्या वाकई में जन लोकपाल बिल में भ्रष्टाचार पर नियंत्रण पाने की क्षमता है?

जन लोकपाल में अन्ना हजारे 10 सदस्यीय चयन समिति गठिक करने की बात कर रहे हैं, जिनमें से चार सदस्य कानून के क्षेत्र से होंगे। यानि चार सदस्यों का कानूनी क्षेत्र से होना अनिवार्य होगा। अघोषितरूप से कानूनी विशेषज्ञ लोकपाल पर हावी हो जाएंगे। एक तरह से जनता की ओर से निर्णय लेने में कानूनी हलकों के लोगों का दबदबा हो जाएगा। कानूनी हलकों में भ्रष्टाचार की गंगोत्री तो गजब रूप से बह रही है। यह कुछ ऐसा ही होगा जैसे परिंदों की रक्षा करने की जिम्मेदारी भेड़ियों को दे दी जाये। मजे की बात ये है कि इस चयन समिति में बाकी के सदस्यों की भी कुछ खास अहर्ताएं होंगी। जैसे दो सदस्य मैग्सेसे अवार्ड से सम्मानित होने चाहिये। अब सवाल उठता है कि सदस्यों के लिए मैग्सेसे अवार्ड की अहर्ता क्यों? क्या कोई विदेशी अवार्ड के आधार पर इस तरह की समिति के सदस्य बनाने की अहर्ता कहां तक उचित है? यहां के लोगों की योग्यता को परखने का आधार क्या विदेशी अवार्ड हो सकता है? किरण बेदी और अरविंद केजरीवाल जैसे लोग इस बिल के पक्ष में जोर शोर से बोल रहे हैं। जन लोकपाल बिल की ड्राफ्टिंग में भी इन दोनों का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। इस बिल के पास होने की स्थिति में चयन समिति में इनके आने का रास्ता साफ हो जाता है, इसमें कोई शक नहीं है, लेकिन इसके साथ ही बहुत बड़ी संख्या में अन्य क्षेत्रों से आने वाले लोगों का रास्ता भी बंद हो जाता है इस बात से भी इन्कार नहीं किया जा सकता है।

इसी तरह इस चयन समिति में एक सदस्य भारत रत्न पुरस्कार से सम्मानित व्यक्ति होगा। भारत रत्न पुरस्कार को लेकर क्या कुछ होता है किसी से छुपा नहीं है। देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम की बात सुनने में अच्छा लगता है, सहजरुप लोग यही चाहते हैं कि किसी भी कीमत पर भ्रष्टाचार का गला घोंटा जाये। ऐसे में अन्ना हजारे की अपील से लोगों का सहज जुड़ाव होना स्वाभाविक है, लेकिन इसके मसौदे में जिस तरह के प्रावधान है उस पर व्यापक स्तर पर पब्लिक डिबेट की जरूरत है।

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  1. बात आपकी भी सही है। मैं ठीक से इस बिल को जानता नहीं लेकिन अगर ऐसा है तो इसमें सुधार होना चाहिए या नये सिरे से विचार होना चाहिए। लेकिन लोग भी क्या करें लोगों को आदत पड़ गई है नेतृत्व के अन्दर का करने की। भ्रष्टाचार के नाम पर बहुत से लोग किसी भी तरह के आंदोलन में कूद पड़ते हैं। वैसे अन्ना हजारे का जीवन प्रेरणादायक है, वे एक अच्छे इंसान और महान नेता के तौर पे जाने जाते रहें। कम-से-कम व्यक्तिगत स्वार्थ तो नहीं है उनमें न जमीन, न जायदाद, न बैंक बैलेंस आदि ये सब चीजें उनको अन्य लोगों से अलग करती हैं। हो सकता है कि कुछ लोग उनका इस्तेमाल करके अपनी महत्त्वाकांक्षा पूरी करना चाहते हों। क्योंकि यह तो संभव नहीं लगता कि यह बिल पूरा का पूरा अन्ना ने अकेले ही बनाया हो। इसमें जिनका हाथ है वे दोषी हो सकते हैं अगर उन्होंने कुछ चालबाजी की है।

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