जिंदगी होम कर रही है सुधा वर्गीस, रोशनी तो होगी ही

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पथरीली राहों पर चलना कुछ लोगों की फितरत होती है। ऐसे ही लोग इतिहास की धारा को मोड़ने में कामयाब होते हैं। आराम भरी जिंदगी को ठुकरा कर निकल पड़ते हैं मानवता को सहेजने और संवारने। सुधा वर्गीस के कदम भी निरंतर इसी ओर बढ़ रहे हैं।

किशोर मन कोमल होता है, और इस अवस्था में कभी-कभी बातें सीधे दिल में उतर जाती हैं, चाहे वे किताबों में पढ़ी गई बातें ही क्यों न हो.सुधा वर्गीस के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ. कच्ची उम्र में बिहार की गरीबी के विषय में पढ़ने के बाद इस प्रदेश को नजदीक से देखने, समझने और यहां के लोगों के लिए कुछ करने की भावना उन पर हावी होती चली गई। फिर केरल में  अपने मां-बाप और  घर-द्वार को छोड़ कर यहां चली आईं.

नेट्रोडैम की मिशनरी शिक्षिकाओं के साथ बिहार में कदम रखने के बाद वहां की अमीरी देखकर सुधा वर्गीस को जल्द ही अहसास हो गया कि ये उनका लक्ष्य नहीं है.उस समय उन्हें हिंदी बिल्कुल नहीं आती थी, लेकिन यहां के गरीब तबकों के बीच काम करने का इरादा पक्का था, स्कूल में बच्चों को पढ़ाने के साथ-साथ हिन्दी सीखती रहीं. ताकि भविष्य में अपने लक्ष्य की ओर मजबूती से डग भर सके.

  गरीबों के लिए कुछ करने की ललक के साथ बिहार आने के बाद सुधा वर्गीस के कानों से जाति जैसे शब्द टकराये, जो उनके लिए नया था। यहां की सामाजिक संरचना को समझने की जरूरत उन्होंने महसूस की और अलग-अलग क्षेत्र से जुड़े लोगों से मुलाकात का सिलसिला शुरु हुआ, जिनमें सामाजिक कार्यकर्ता और समाजशास्त्री भी शामिल थें. एक तरह से प्रारंभिक दौर में वे यहां की चीजों को जमीनी स्तर पर टटोल रही थी और उस जमीन की तलाश भी कर रही थी, जहां भविष्य में मजबूती के साथ उन्हें जूझना था।

बिहार की जड़ों को समझने के क्रम में ही सुधा वर्गीस को यहां के सामाजिक बुनावट में नीचले पायदान पर खड़े मुसहर जाति के विषय में जानकारी मिली.धीरे-धीरे वह इस जाति पर केंद्रित होती चली गई.अपने जीवन की सार्थकता उन्हें इसी में दिखी और एक अविराम सफर का दौर शुरु हुआ.

 मुसहरों के बीच में काम करते हुये उन्हें जल्द ही अहसास हो गया कि जिस रास्ते पर वे चल रही हैं वो कंटकों से भरा हुआ.दानापुर के जिस गांव में वो रहती थीं वहां पर एक मुसहर किशोरी के साथ दबंगों द्वारा बलात्कार की घटना ने उन्हें अंदर तक झकझोर दिया। सामंती मानसिकता की शिकार बिहार पुलिस यह मानने को भी तैयार नहीं थी कि कोई मुसहर किशोरी के साथ बलात्कार भी कर सकता है, एफआईआर दर्ज करना तो दूर की बात थी.लेकिन टोले की महिलाओं ने पुलिस को एफआरआई दर्ज करने के लिए बाध्य कर दिया.                                                                                                                         

एक मुसहर महिला थाने में जाकर अपने साथ हुये बलात्कार की रपट लिखाये ये वहां के स्थानीय दबंगों को बर्दाश्त नहीं हुआ। वे लोग पीड़िता और उसके परिजनों के साथ-साथ सुधा वर्गीस को भी तरह-तरह से धमकाने लगे. लेकिन सुधा वर्गीस का इरादा अटल था, न्याय के लिए अंतिम सांस तक लड़ना। सुधा वर्गीस के साथ उस टोला की महिलाएं और अन्य लोगों ने भी इस अन्याय के खिलाफ लड़ाई ठान दी. 

 इनसान हाड़ मांस का बना पुतला है, सुधा वर्गीस भी इसकी अपवाद नहीं. दबंगों की ओर से मिलने वाली लगातार धमकियों से डर तो इन्हें भी लगा, लेकिन तबतक लोगों के बीच साईकिल वाली दीदी के नाम से मशहूर हो चुकी सुधा वर्गीस ने न सिर्फ डर पर काबू पाना सीख लिया, बल्कि इस सच्चाई से भी वाकिफ हो गईं कि बिहार में आप जितना डरेंगे लोग आपको उतना ही डराएंगे. 

संगठन में शक्ति है, इस फार्मूले को समझते हुये सुधा वर्गीस ने महसूस किया कि महिलाओं को एकजुट करना जरूरी है, ताकि अपनी बातों को कहने के लिए उनके पास एक साझा मंच हो, और लोग उन समस्याओं और परिस्थितियों की ओर ध्यान दें, जिनके कारण महिलाओं के जीवन में घुटन पैर जमाए हुये है. महिलाओं की आवाज की सशक्त अभिव्यक्ति का माध्यम बना 1987 में गठित संस्था नारी गूंजन, जो क्रमश: सुधा वर्गीस के जमीनी अनुभव और निरंतर चिंतन का प्रतिफल था.           

मुसहरों के बीच छोटी-छोटी बात को लेकर होने वाली लड़ाइयों को देखते हुये  सुधा वर्गीस को लगा कि उन्हें कानून की पढ़ाई जरूर पढ़नी चाहिये ताकि मुसहरों को अज्ञानता से उपजी मुसीबतों से बचाया जा सके.अज्ञानता के चादर में लिपटे हुये मुसहरों को कोर्टे में न्याय की प्रक्रियाओं के विषय में कोई जानकारी नहीं थी। कोर्ट में मुंशी ही इनके लिए सबकुछ था। मैसूर विश्ववाद्यालय से ग्रेजुएशन करने के लंबे समय बाद 1987 में सुधा वर्गीस ने खासतौर से मुसहरों को कोर्ट कचहरी से बचाने के लिए कानून की पढ़ाई बंगलूर विश्वविद्यालय से पूरी की। कानून की पढ़ाई बिहार में भी कर सकती थी, लेकिन यहां सत्र काफी पीछे चल रहा था और सुधा वर्गीस के पास वक्त कम था, जिस राह पर ये चल रही थी, उस पर इन्हें मीलों बढ़ना था।

अज्ञानता के गर्त्त में पड़े हुये मुसहरों के बीच ज्ञान की रोशनी फैलाने के लिए उनकी बेटियों को चूना, जो हर वक्त घर के कामों में लगी रहती थी, और जिनका ब्याह कच्ची उम्र में ही कर दिया जाता था. खुद जवान होने के पहले ही कई बच्चों की मां बन जाती थी। सुधा वर्गीस द्वारा यूनिसेफ की मदद से संचालित किशोरी शिक्षा केंद्रों का निर्माण दीप से दीप जलाने की एक धीमी लेकिन सशक्त प्रक्रिया है। शिक्षा केंद्रों में रहकर मुसहरों की बेटिया क ख ग घ के हथियार से लैस हो रही हैं, ताकि जीवन की दौड़ में उनके कदम कहीं थमे नहीं.  

दानापुर और फुलवारी में 50 किशोरी शिक्षा केंद्रों में मुसहरों की करीब 1500 बेटियां रही हैं, उन्हें हर उन चीजों की जानकारी दी जा रही है, जो उनकी जिंदगी को बेहतर बनाने में सहायक है….रीटा, मोना, सोना, रूबी, महिसी, देवी सब पढ़ रही हैं, स्वस्थ्य रखने के लिए उनके खुराख पर भी विशेष ध्यान दिया जा रहा है। उनकी साईकिल वाली दीदी चने के साथ गुड़ देने के लिए खासा सर्तक रहती हैं, गुड़ की मिठास को चीभ पर लाकर खुद चेक करती हैं, फिर उन्हें चने के साथ मिलाने को कहती हैं.साफ-सफाई का भी बेहद ख्याल रखती हैं,…इन बेटियों के माता-पिता, दादी-दादी को भले ही छुआछुत के नाम पर समाज की मुख्य धारा से दरकिनारा किया गया हो, लेकिन सुधा वर्गीस की वजह से आज ये कुरीतियों को सहज तरीके से तोड़ते हुये आगे बढ़ रही हैं….सुधा वर्गीस खुद इनके साथ घुलमिल कर इन्हें एक नये सांचे में ढाल रही हैं….आत्मविश्वास इनकी आंखों से छलक रहा है.     

कभी इनकी जिंदगी में कोलाहल था, लेकिन अब इन्हें सुकून और चैन की नींद मिल रही है। सोने की व्यवस्था पूरी तरह से सैनिक  बैरकों की तरह है. जिंदगी की दिशा को मोड़ने के लिए इन्हें थोड़ा टफ जो बनाना है। अच्छी नींद इन्हें अगले दिन के अभ्यासों के लिए तैयार कर देती है।     

 जिंदगी को पटरी पर सही तरीके से दौड़ाने के लिए शरीर का स्वस्थ्य होना निहायत ही जरूरी है। इस रहस्य को सुधा वर्गीस बखूबी जानती हैं, तभी तो किशोरी शिक्षा केंद्र कि लड़कियों को नियमित व्यायाम के लिए प्रेरित करती हैं। किसी लड़की पर नियंत्रण रखने के सुधा वर्गीस का उसका नाम लेकर पूकारना ही काफी होता है, सबकुछ वैसे ही होता है जैसे वह चाहती हैं। निर्माण की प्रक्रिया में अनुशासन का अपना महत्व होता है। किशोरियों को बेहतर नागरिक बनाने के लिए सुधा वर्गीस किशोरियों के बीच व्यवहारिक स्तर पर अनुशासन के महत्व को स्थापित कर रही हैं।              

मां-पिता का विश्वास किसी बेटी को मिल जाये तो क्या नहीं हो सकता, सुधा वर्गीस ने जिस राह को चुना है, उस पर निरंतर चलते रहने की प्रेरणा उन्हें आज भी उनके माता-पिता से मिलती रहती है। केरला में उनके फार्म में जब अलग-अलग नश्लों के बच्चे खेलने आते थे तो सुधा वर्गीस भी उनके साथ खूब खेलती थी, भेदभाव क्या होता है उन्हें पता नहीं था, उनके माता-पिता भी वहां आने वाले बच्चों से खूब बातें किया करते थे, फिर भला सुधा वर्गीस को क्यों रोकते….भेदभाव रहित समाज उन्हें विरासत में मिली.

पिछले दो दशक से जिस निरंतरता से सुधा वर्गीस अपने जीवन को सार्थक कार्य में लगाये हुये है। उनके कार्यों को तमाम तरह के सरकारी और गैर-सरकारी संस्थाओं द्वारा सराहा और पुरस्कृत भी किया गया है। बिहार सरकार और महिला आयोग ने भी सुधा वर्गीस के कार्यों का ऊंचा मूल्यांकन किया। वर्ष 2006 में भारत सरकार द्वारा उन्हें पद्मश्री के सम्मान से भी नवाजा गया. इस पुरस्कार के मिलने की जानकारी होने पर उन्हें थोड़ा आश्चर्य के साथ सुखद अनुभूति हुई थी.

परिवर्तन का पहिया धीरे-धीरे घूमता है, सदियों से जमी हुई सामाजिक कुरीतियों को निकाळ फेंकना आसान नहीं होता….प्रतिक्रियावादी शक्तियां पूरी मजबूती के साथ इनके पोषण में जुटी होती हैं….लेकिन धुन के पक्के लोग बिना किसी की परवाह किये अपनी राह पर चलते रहते हैं…….धुनी सुधा वर्गीस बेखौफ अंदाज में मानवता की सेवा में जुटी हैं…..हालांकि वो मानती हैं कि अभी भी बहुत कुछ करना बाकी है…….वैसे परिवर्तन हो रहा है।     

मंजिल कितनी भी दूर क्यों न हो, पहुंचता वही है जो निरंतर चलते रहने में यकीन करता है…..आंखों में एक बेहतर समाज का सपना लिये सुधा वर्गीस बिहार में गरीबों व मजलूमों के लिए अपनी जिंदगी होम कर रही हैं……यकीनन,  रोशनी तो होगी ही…….

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