बिहार में मरने वाले मरीजों के लिए जिम्मेदार कौन ?

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बिहार में जूनियर डाक्टर मेडिकल प्रोटेक्शन एक्ट की मांग कर रहे हैं। यानि की उनको ड्यूटी के वक्त प्रोटेक्शन दिया जाये, क्योंकि वे पब्लिक वर्क कर रहे हैं। खुद को प्रोटेक्ट करने के लिए उन्होंने हड़ताल कर कर रखा है, अस्पताल में काम नहीं कर रहे हैं, जहां-तहां तालाबंदी कर रखा है, नारे-वारे भी लगा रहे हैं। जूनियर डाक्टरों के चार दिन के हड़ताल में  राज्यभर में करीब 50 मरीजों की मौत हो गई, यदि हालत यही बनी रही तो शतक लगते देर नहीं लगेगी. जूनियर डाक्टरों की हड़ताल का मामला बहुत पुराना है। ये लोग बार-बार हड़ताल पर जाते हैं, सरकार से इनकी बातचीत भी होती है, और फिर आश्वसन भी इन्हें मिलते हैं, लेकिन बिहार में इनकी हड़तालों का सिलसिला थमता नजर नहीं आ रहा है। मरीज मरते रहते हैं। एक तरह से हड़ताल को लेकर बिहार जड़ता की स्थिति में है।   

लेकिन इस बार के हड़ताल में कुछ रोचक इंडिकेशन देखने को मिले। एक महिला मरीज को लेकर गया अस्पताल में विवाद हुआ। जूनियर डाक्टरों ने मरीज को पीएमसीएच रेफर कर दिया था जबकि मरीज  के परिजन चाह रहे थे कि उसका वहीं पर इलाज किया जाये। उसके बाद मरीज के परिजनों और डाक्टरों के बीच मारपीट हुई, फिर राजद विधायक सुरेंद्र यादव वहां पहुंचे। बात आगे बढ़ी और जूनियर डाक्टरों पर सुरेंद्र यादव के अंगरक्षकों ने फायरिंग कर दी। इसके बाद से जूनियर डाक्टरों ने गोलबंदी की और एक के बाद बिहार के सभी मेडिकल कालेज अस्पतालों में हड़ताल होती चली गई।

इस बीच बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार दिल्ली गये हुये थे, बिहार के लिए स्पेशल पैकेज के जुगाड़ में और मिस्र में वहां की अव्यस्था से उकाताये लोगों ने मुबाकर की घेराबंदी कर रखी थी। जूनियर डाक्टरों के हड़ताल के कारण करीब 50 लोग बिहार में असमय ही मौत के शिकार हो गये, और मिस्र में करीब 150 लोग। भले ही इनका कोई सीधा संबंध न हो, लेकिन इनसे इतना तो पता चलता है कि दुनियाभर में कुव्यवस्था की कीमत असमय सिविलियन डेथ होती है।

स्वस्थ्य रहने का अधिकार प्राकृतिक अधिकार है, बिहार में स्वास्थ्य सेवाओं को दुरुस्त करने के लिए मास्टर प्लानिंग बनाने के दावे किये जा रहे हैं, इन्फ्रास्ट्रक्चर पर काम होने की बात की जा रही है, ऐसे में शुरुआती दौर में ही सिर्फ हड़ताल की वजह 50 लोगों की मौत (सिर्फ पटना मेडिकल कालेज में 28 लोग मरे हैं) बहुत सोंचने के लिए खुराक देता है।

राज्यभर के विभिन्न अस्पतालों पर खड़े होकर अपने परिजनों के इलाज के लिए हो हल्ला करते रहे, वे साफ कह कह रहे थे कि उनके पास पैसे नहीं। उनकी समझ में नहीं आ रहा कि अपने मरीजों को लेकर वे कहां जायें. गया में तो मरीजों के परिजनों ने जोरदार प्रदर्शन भी किया।

फिलहाल सुरेंद्र यादव ने समर्पण कर दिया है और जूनियर डाक्टरों ने हड़ताल वापस ले ली है, अब सवाल उठता है कि इस हड़ताल की वजह से जो 50 लोग मरे हैं उसके लिए कौन जिम्मेदार है, सुरेंद्र यादव, जूनियर डाक्टर, प्रशासन, सरकार या फिर पूरा तंत्र। कारण चाहे जो भी हो लेकिन पिछले चार दिनों में बिहार में मानवाधिकारों को तार-तार कर दिया गया है। 50 लोगों की मौत कम नहीं होती।

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सदियों से इंसान बेहतरी की तलाश में आगे बढ़ता जा रहा है, तमाम तंत्रों का निर्माण इस बेहतरी के लिए किया गया है। लेकिन कभी-कभी इंसान के हाथों में केंद्रित तंत्र या तो साध्य बन जाता है या व्यक्तिगत मनोइच्छा की पूर्ति का साधन। आकाशीय लोक और इसके इर्द गिर्द बुनी गई अवधाराणाओं का क्रमश: विकास का उदेश्य इंसान के कारवां को आगे बढ़ाना है। हम ज्ञान और विज्ञान की सभी शाखाओं का इस्तेमाल करते हुये उन कांटों को देखने और चुनने का प्रयास करने जा रहे हैं, जो किसी न किसी रूप में इंसानियत के पग में चुभती रही है...यकीनन कुछ कांटे तो हम निकाल ही लेंगे।

2 COMMENTS

  1. सरकार का रवैया देखने से लगता है कि मुख्यमंत्री की उपस्थिति 50 लोगों को नहीं बचा सकती थी । अगर ऐसा है कि सिर्फ मुख्यमंत्री की उपस्थिति उन लोगों को बचा पाती तब तो वे कहीं बाहर जा ही नहीं सकते। सरकार में ऐसा कोई योग्य मंत्री या नेता नहीं जो इस स्थिति को सही तरीके से शांति से हैंडल कर पाये । अगर कोई बुरी घटना किसी के शासन में घटती है तो इतिहास उसे उसी की व्यवस्था को या लगभग उसे ही दोषी मानता है। यह घटना नीतीश सरकार के सुशासन पर एक कलंक है। मंत्रियों का क्या? उन्हें तो एसी वाले आफिस में रहना है, एसी वाले गाड़ी में घूमना है। डार्विन के सिद्धांतों से ज्यादा सच यह है कि कोई नेता किसी घटना के बाद आकर मरे हुए लोगों के प्रति चेहरे पर नकली आंसू के साथ सहानुभूति जताता है, सांत्वना देता है और रात में फिर अगले दिन की पार्टियों में जाने का प्रोग्राम बनाते हुए सो जाता है और फिर अगले दिन मुख्य अतिथि बन कर किसी समारोह में हंसते-मुस्कुराते टीवी पर, अखबारों में दिखने लगता है।
    और फिर यह बात भी गौर करने लायक है कि जाब कार्डों, बीपीएल सूचियों आदि के रहते हुए भी एक नागरिक यह कहता है उसके पास पैसे नहीं हैं इलाज करवाने के लिए।
    डाक्टरों को सुरक्षा चाहिए । जो सुरक्षा विभाग है खुद की रक्षा तो कर नहीं पाता। कल शिक्षकों पर हमले होंगे, दुकानदारों पर हमले होंगे, साधुओं पर हमले होंगे। सरकार किस-किस को सुरक्षा देगी?
    अंतत: सरकार का रवैया उसके मुंह पर कालिख पोतने के लिए पर्याप्त है। सुशासन बाबू के राज में 50 लोग परमानेंट शवासन करने चले गए हैं। माफी मांगने या अफसोस जताने से 50 लोगों की जान वापस नहीं आ सकती। यह घटना जिनके कारण हुई है वे माफी के काबिल कतई नहीं हैं।

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