सामाजिक न्याय से सामाजिक अन्याय की ओर बढ़ता आरक्षण

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रिटार्यड मेजर सरस त्रिपाठी

सामाजिक न्याय के नाम पर आरक्षण का दायरा जिस तरह से रक्तबीज (hydra) की तरह बढ़ाया जा रहा है, यह देश के लिए बहुत ही खतरनाक और विध्वंसकारी प्रमाणित होगा। 1932 में जब इंग्लैंड के प्रधानमंत्री रामसे मैकडोनाल्ड ने “कम्युनल अवार्ड” की घोषणा की थी तो भारत के लगभग सभी राष्ट्रीय नेताओं ने उसका पुरजोर विरोध इस आधार पर किया था किया था कि यह भारत के विभाजन की नींव रखेगा। कम्युनल अवार्ड के अंतर्गत ईसाइयों, मुसलमानों और दलितों को अलग-अलग पहचान मानकर उनकी सीटें सुरक्षित कर दी गई थीं। इसकी विभिषिका को समझकर महात्मा गांधी आमरण अनशन पर बैठे थे और पुणे की यरवदा जेल में कैद कर दिये गये थे। बाद में डॉक्टर भीमराव अंबेडकर को भी यह बात समझ में आई और उन्होंने महात्मा गांधी का आमरण अनशन तोड़ने के लिए पहल की तथा एक समझौता हुआ जिस पर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की तरफ से पंडित मदन मोहन मालवीय और दलितों के संघ की ओर से डॉ भीमराव अंबेडकर ने हस्ताक्षर किए। इसके अंतर्गत दलितों को हिंदुओं से अलग पहचान (एंटिटी) मानने की बजाय उन्हें हिंदुओं के लिए निर्धारित की गई सीटों में ही समुचित सीटें आरक्षित कर दी गई थी।

असल में आरक्षण का प्रारंभ यहीं से हुआ था और इसका मुख्य उद्देश्य प्रतिनिधित्व प्रदान करना था। 1951 में पहला संवैधानिक संशोधन करके पंडित जवाहरलाल नेहरू ने संविधान में “अनुसूचित” किये गये दो तरह के वर्गों – “अनुसूचित जाति” और “अनुसूचित जनजाति” को क्रमशः 15 और 7.5 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था की थी। यह मात्र लोकसभा और विधानसभा के प्रतिनिधित्व के लिए था। बाद में इसका विस्तार करके सरकारी नौकरियों में फिर शिक्षण संस्थानों में फैला दिया गया। आरक्षण प्रारंभ में 1952 से लेकर 1962 तक मात्र दस वर्ष के लिए ही था लेकिन बाद में इसकी अवधि बढ़ाई जाती रही और अब यह विकराल रूप धारण करता जा रहा है। 70 वर्ष हो गए और तीन पीढ़ियां आरक्षण ले चुकी हैं परन्तु लिस्ट “पिछड़ों” की बढ़ रही है। यह प्रगति का लक्षण है या अगति का या दुर्गति का? 1989 में “कमण्डल” (राम मंदिर आंदोलन को प्रभावहीन करने के लिए) की लड़ाई के विरुद्ध तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने अपना “मण्डल” का दांव खेला। उनका किया हुआ यह कृत्य पूरी तरह से राजनैतिक था और उनकी चाल थी कि मण्डल आयोग की सिफारिशें लागू करके वह तथाकथित “पिछड़ा वर्ग” का वोट हासिल कर लम्बे समय तक प्रधानमंत्री रह सकेंगे। परंतु ऐसा कुछ नहीं हो पाया। वह इतिहास में भी हाशिए पर ही रहे। दुर्भावना से किया कार्य कभी सद्परिणाम नहीं लाता।

2006 में यूपीए सरकार में मानव संसाधन मंत्री  अर्जुन सिंह ने तथाकथित पिछड़े वर्ग को (नौकरी के अतिरिक्त) सभी शिक्षण संस्थाओं में भी 27% आरक्षण दे दिया। आज कई राज्य सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित 50% की सीमा का उल्लंघन करके छत्तीसगढ़ जैसे राज्य 82% (अजा 13%, अजजा 32%, अन्य पिछड़ा 27% आर्थिक पिछड़े 10%) तक आरक्षण कर दे रहे है। पाखंड इतना कि स्वतंत्रता के पूर्व तक राजा महाराजा रहे (बघेल राजपूत जो पूरे मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के सैकड़ों साल से शासक थे) भी अब “पिछड़ों” में सम्मिलित हैं। यानि अंधों में बांटे सिन्नी और फिर-फिर खुद ही ले”।

इन सब में एक बहुत महत्वपूर्ण बात यह है कि उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय के लगभग 90% निर्णय आरक्षण के विस्तार के विरुद्ध रहे हैं। इसका प्रमुख कारण यह है कि आरक्षण स्वयं संविधान की “समानता के अधिकार” की आत्मा के विरुद्ध है। सकारात्मक भेदभाव (यानी positive discrimination) के नाम पर यह अत्याचार अब सवर्ण जातियों पर किया जा रहा है। सर्वोच्च न्यायालय के संविधान में वर्णित दो कार्य हैं: संविधान का संरक्षण और व्याख्या करना। यानि जहां पर कानून उपलब्ध नहीं है वहां पर दिशा निर्देश या निर्णय देकर के कानून की अनुपस्थिति के निर्वात को समाप्त करना। लेकिन सरकार उनके हर दूसरे निर्णय को बदल रही है। जब सरकार को सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय मानना ही नहीं है तो न्यायालय की आवश्यकता क्या है?

अभी-अभी मराठों (मराठे कब से पिछड़े हो गये पता नहीं?) को जो आरक्षण दिया गया था उसे सर्वोच्च न्यायालय संविधान के विरुद्ध घोषित कर दिया। सर्वोच्च न्यायालय का कहना है कि ऐसे विषय में केंद्र सरकार को ही अधिकार है कि वह निर्धारित करें कि पिछड़ी जाति कौन है।ऐसा करने से निर्णय एक संपूर्णता में होता। लेकिन केंद्र सरकार ने स्वयं इस निर्णय को बदलने के लिए संसद में विधेयक लाकर और उसे पारित कर सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को बदल दिया। सबसे बड़े आश्चर्य का विषय है कि लोक सभा में उपस्थित 386 में से एक भी सदस्य ने इसका विरोध नहीं किया। यह उन तमाम सवर्ण जातिवादी तत्वों के ऊपर बहुत बड़ा तमाचा है जो अपनी जाति के सांसदों और विधायकों की गणना करके प्रसन्न होते हैं। क्योंकि किसी भी सांसद ने इसका विरोध नहीं किया। स्पष्ट है सत्ता लोलुपता ने उनके बुद्धि, विवेक और सामाजिक न्याय समझ की समझ ही नहीं बल्कि नैतिकता का भी चीरहरण कर लिया है। ये मानसिक गुलाम और सुविधा भोगी हैं।

इस सामाजिक अन्याय को उचित ठहराने के लिए तर्क यह दिया गया है कि जिसकी जितनी जनसंख्या है उसी हिसाब से उसका प्रतिनिधित्व होना चाहिए। इससे अधिक विध्वंशकारी कोई तर्क नहीं हो सकता। साम्यवाद और समाजवाद इसी कारण पूरी दुनिया में असफल रहा और विध्वंश और विनाश का कारण बना। सोवियत संघ का विघटन हुआ। इसका सीधा परिणाम यह है कि अगर आज शिक्षा के लिए सीटें और सरकारी नौकरियां समानुपात के अनुसार बांटी जा रही है (बिना मेरिट या गुणवत्ता को ध्यान में रखते हुए) तो कल फिर सारे संसाधनों पर इसी तरह के बंटवारे का दावा होगा मतलब यह होगा कि फिर जमीन और आकाश भी समानुपात में बांट लिया जाए। जिसका मतलब है देश का विभाजन।

याद रखने योग्य बात यह है कि देश के विभाजन में कम्युनल अवार्ड का बहुत बड़ा योगदान रहा था। जब अंग्रेजों ने मुसलमानों को अलग से निर्वाचन दे दिया और निर्वाचन का बंटवारा कर दिया, उसके बाद से देश के विभाजन की गतिविधियां बहुत तेजी से आगे बढ़ी। उसे ही आधार मानकर के मुस्लिम लीग ने अपने लिए अलग देश की मांग करना प्रारंभ कर दिया और कहा कि मुसलमान इस देश में रहते हुए भी एक अलग राष्ट्र हैं जिसे विभाजित करना होगा। उनका भी तर्क यही था कि “हिन्दुओं” के नेतृत्व में हमारे हित सुरक्षित नहीं है। आज यही तर्क सवर्णों, मुख्यत: ब्राह्मणों, के विरुद्ध दिया जा रहा है।

यह कितनी मूर्खतापूर्ण सोच है कि कोई भी व्यक्ति सिर्फ जन्म के कारण अगड़ा या पिछड़ा हो जाता है। एक विशेष जाति में जन्म लेते ही व्यक्ति विद्वान, ज्ञानी, धनवान, गुणवान, कुशल और आजीविका का अलौकिक स्रोत प्राप्त कर लेता है। न उसे शिक्षा की आवश्यकता होती है न धन की और ना ही उसे कोई कौशल विकसित करने की जरूरत होती है। उसके पास सब कुछ जन्मजात आ जाता है। उसे न आजीविका चाहिए न शिक्षा। दूसरी तरफ इस मत को “संवैधानिक” कर देना कि कुछ विशेष जाति में पैदा होने वाले लोग बिल्कुल ही बुद्धिहीन होते हैं और उनको हमेशा सहायता और सपोर्ट की आवश्यकता होती है। उन्हें शिक्षा में भी आरक्षण चाहिए, नौकरी में भी और प्रोन्नति में भी। वे अपने प्रतिभा से कुछ नहीं कर सकते। यह कैसी मूर्खतापूर्ण मान्यताएं हैं और यह कितनी अन्याय पूर्ण है? सबसे बड़े आश्चर्य की बात है कि सत्ता में बैठे हुए लोगों को साधारण सी बात न दिखाई देती है ना समझ में आती है कि तथाकथित सवर्ण वर्ग यानी सामान्य वर्ग में कितने लोग गरीबी की रेखा के नीचे रह रहे हैं, कितने अशिक्षित लोग हैं जिनके पास कोई भी संसाधन नहीं है। लेकिन फिर भी उनके उत्थान के लिए कुछ नहीं किया जा रहा है सारी की सारी व्यवस्था जातिपरक हो गई है। ऐसे में संविधान में दिए गए समानता के अधिकार का कोई मतलब नहीं रह गया है। यह एक पाखंड है। इसमें सभी सरकारें सम्मिलित रही हैं, लेकिन भाजपा इस प्रतियोगिता का मैराथन जीत रही है- एक के बाद एक।

एससी एंड एसटी (प्रीवेंशन आफ अट्रोसिटीज) एक्ट इस अन्याय का सबसे सटीक उदाहरण है। इस कानून ने तो सवर्णों से समानता ही नहीं नागरिक सम्मान भी छीन लिया। एक व्यक्ति जो शेड्यूल कास्ट या शेड्यूल ट्राइब का है अगर वह बोलता है कि उसे जातिसूचक शब्द से संबोधित किया गया तो उसकी बात तुरंत सच मान ली जाएगी भले ही 100000 लोग दूसरी तरफ बोलते रहे हों कि ऐसा कुछ नहीं बोला गया। यह कौन सी समानता है? यह तालिबानों के जंगलराज से भी बदतर है। दूसरी तरफ इस कानून के अंतर्गत सवर्णों के लिए देश को पुलिस राज्य में तब्दील कर दिया गया है। यानी कि एक एसएचओ को यह अधिकार है कि वह किसी भी व्यक्ति को जिसके विरुद्ध एस सी या एस टी ने शिकायत की है, तत्काल गिरफ्तार कर ले। इसमें न्यायालयों का कोई मतलब नहीं है। एंटीसिपेटरी बेल का कोई प्रावधान नहीं है। आप इस कानून के विरुद्ध बेल नहीं ले सकते आपको सिर्फ जेल ही जाना होगा। आपका जीवन, मान-सम्मान, सम्पदा सब किसी दलित की कृपा पर है। क्या हमारे संविधान निर्माताओं ने यही कल्पना की थी? यदि और पीछे जाएं तो लगभग 200 साल तक हमारे पूर्वजों ने जो खून बहाया क्या यही दिन देखने के लिए उन्होंने यह सब कुछ किया था? क्या चंद्रशेखर आजाद ने इसीलिए गोलियां खाई थी की “तिवारी” होने के कारण उनकी संततियों को शिक्षा से भी वंचित किया जाय। चापेकर बंधु, पंडित रामप्रसाद बिस्मिल, रोशन सिंह इसलिए फांसी पर चढ़े थे, या सावरकर ने इतनी यातनाएं इसीलिए सही थी कि जाति के नाम पर लोगों के अधिकार छीन लिए जाएं, उन्हें शिक्षा और रोजगार दोनों से वंचित कर दिया जाए? 4,000 की मेरिट वाले को एम डी में (शिक्षा के लिए) प्रवेश न मिले और 40,000 पोजिशन वाला एम डी करके चिकित्सक विशेषज्ञ बने-यही सामाजिक न्याय है? जो दूसरी पोजिशन पर है वह प्रवक्ता न बन सके और 1000वीं पोजिशन वाला प्रवक्ता बन कर शिक्षा दे- यह सिर्फ विनाश की ओर बढ़ते राष्ट्र की पहचान है।

ऐसा लगता है वोट के लालच में सरकार न्याय और अन्याय की सीमा रेखा पहचान नहीं पा रही है। इनमें सामाजिक न्याय के प्रति कोई सम्मान नहीं है और सामाजिक न्याय के नाम पर यह सामाजिक अन्याय, एक अन्याय के बाद दूसरा अन्याय करती जा रही हैं। देखते हैं कि मंगल पांडे, चन्द्रशेखर आजाद, राम प्रसाद बिस्मिल, ऊधम सिंह, रोशन सिंह, सावरकर और चाफेकर की संतानें कब तक धैर्य रख सकती हैं।

हृदय की पीड़ा इस कविता लिख रहा हूं:

पौधा जिन्होंने एक भी रोपा नहीं,

अधिकार वे दिखा रहे पूरी बहार पर।

डूबे न मेरा देश यही सोच सोच हम,

खिसकते आ गये हैं इक ढहती कगार पर।।

 

(रिटा.मेजर सरस त्रिपाठी स्वतंत्र लेखक हैं)

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