“तुम्हारा स्थान” (कविता)

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अक्षय नेमा//

तुम जान सकती हो

मेरे अन्दर की ज्वाला को,

देख सकती हो

भड़कते हुए अंगारे,

और छू सकती हो

मेरे अन्दर के तूफानों को।

मगर दूसरा वो किनारा,

जहाँ खिल रहे है

प्रेम के छोटे-छोटे फूल,

लिपट रही है

वृक्षों से लताएँ,

जिसकी विशालता पर

जन्म सकती है

नई सृष्टि,

रच सकती है जहाँ

कृष्ण की वे रास-लीलाएं।

क्या कभी देखा है

मेरे ह्रदय के उस स्थान को,

जिसकी तुम राधा हो

और मैं तुम्हारा कृष्ण।

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सदियों से इंसान बेहतरी की तलाश में आगे बढ़ता जा रहा है, तमाम तंत्रों का निर्माण इस बेहतरी के लिए किया गया है। लेकिन कभी-कभी इंसान के हाथों में केंद्रित तंत्र या तो साध्य बन जाता है या व्यक्तिगत मनोइच्छा की पूर्ति का साधन। आकाशीय लोक और इसके इर्द गिर्द बुनी गई अवधाराणाओं का क्रमश: विकास का उदेश्य इंसान के कारवां को आगे बढ़ाना है। हम ज्ञान और विज्ञान की सभी शाखाओं का इस्तेमाल करते हुये उन कांटों को देखने और चुनने का प्रयास करने जा रहे हैं, जो किसी न किसी रूप में इंसानियत के पग में चुभती रही है...यकीनन कुछ कांटे तो हम निकाल ही लेंगे।

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