भडका रहे हैं आग लब-ए-नग़्मगर से हम, ख़ामोश क्यों रहेंगे ज़माने के डर से हम — साहिर

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मेरे सरकश तराने सुन के दरिया ये समझती है कि शायद मेरे दिल को इश्क के नगमों से नफरत है साहिर एक बेमिशाल अल्फाजों का जादूगर, तरक्की पसन्द इंकलाबी शायर जिनके दिलो — दिमाग में गूंजता रहता कि ये दुनिया कैसे खुबसूरत बने। एक फनकार सिर्फ अदब और अदीब की दुनिया में रहते हुए वो अपने हर हर्फो में जिन्दगी के मायने तलाशते हुए वर्तमान के साथ सवाल खड़ा करता है कि जीवन को कैसे जिया जाए वह आने वाले कल के महरलो से अवगत कराता है। ऐसी ही इस दुनिया में एक अजीम हस्ती थे साहिर लुधियानवी उस बेनजीर शक्सियत का असली नाम अब्दुल हयी साहिर था। 8 मार्च 1921 को लुधियाना के एक जागीरदार घराने में उनकी पैदाइश हुई थी। साहिर का बचपन बहुत ही कड़े संघर्षो से भरा पड़ा था कारण कि उनके पिता ने दूसरी शादी कर ली थी जिसके चलते साहिर की माँ ने घर छोड़ दिया और अपनी जिन्दगी जीने के लिए रेलवे लाइन के किनारे झोपड़ पट्टी में रहकर अपने सहारे को मजबूत इरादे वाला बनाने के लिए मेहनत – मजदूरी करने लगी। साहिर का बचपन इन्हीं रेलवे लाइनों के किनारे गुजर रहा था जहां पर वो देखते कि लाइनों के बीच औरतें और बच्चे कोयला और कचरा बिनते रहते साहिर ने पूरा बचपन जीवन के संघर्ष को बड़े नजदीक से देखा, तभी वो बोल पड़े कसम उन तंग गलियों की वह मजदूर रहते हैं इन्हीं झंझावतों के बीच लुधियाना के खालसा स्कूल में साहिर ने अपनी शिक्षा की शुरुआत की और माध्यमिक की शिक्षा पूरी करते हुए अपनी शेरो — शायरी को परवान चढाते रहे। उन हालातों से लड़ते हुए साहिर लिखते है, आज से मैं अपने गीतों में आतिश – पारे भर दूंगा माध्यम लचीली तानों में सारे जेवर भर दूंगा जीवन के अंधियारे पथ पर मशाल ले के निकलू धरती के फैले आँचल में सुर्ख सितारे भर दूंगा ऐसी सुलगती आग से उस इंकलाबी शायर का एक नया चेहरा सामने आता है। 1939 में साहिर ने गवर्मेंट कालेज में स्नातक की शिक्षा के लिए दाखिला लिया। तब तक साहिर के नज्मों और शायरी की चर्चा पूरे भारत में फ़ैल चुकी थी। उसी कालेज में उस दरमियान अमृता प्रीतम भी अपनी पढ़ाई पूरी कर रही थी और वो साहिर के शेरो — शायरी की बहुत बड़ी प्रशंसक थी और अमृता के दिल की धरती पर साहिर के प्यार भरे नज्म अंकित हो चले थे। अमृता छात्र जीवन में ही साहिर से प्यार करने लगी थी और साहिर का भी झुकाव उनकी तरफ हो चुका था। अमृता के दिल पर साहिर के नज्म अपना नाम लिखने लगे और अमृता ने अपना दिल साहिर के हवाले कर दिया। पर साहिर से प्यार करना अमृता के घर वालों को रास नहीं आया कारण था धन और वैभव जो साहिर के पास नहीं था अगर था कुछ तो अदब और अदीब का खजाना उसको कौन देखता है इसके साथ ही इन दोनों तरक्की पसंद प्रेमियों के आड़े आया धर्म की दीवार जिसको ये लोग तोड़ नहीं पाए जिसके चलते अमृता को उनका प्यार नसीब नहीं हुआ। जिसके हर पन्नों पर अमृता ने पूरी इबारत लिख दी। उसी वक्त वो इंकलाबी शायर अपने दिल के जज्बात को लिखते हुए कहता है मैंने जो गीत तेरे प्यार की खातिर लिखे, आज उन गीतों को बाजार में ले आया हूँ आज दूकान में नीलाम उठेगा उनका हमने जिन गीतों पर रक्खी थी मुहब्बत की अशार आज चाँदी के तराजू पे तुलेगी हर चीज मेरे अशरार, मेरी शायरी, मेरा एह्साह साहिर के शायरी में जहां आम आदमी के संघर्षो के लिए निकले शब्दों की अभिव्यक्ति धधकती ज्वाला नजर आती है वहीं पर एक प्यार भरा मासूम दिल भी नजर आता है जहां प्यार के रूमानियत से भरे अलफ़ाज़ यह एह्साह दिलाते हैं कि भोर में पड़ी फूलों और पत्तों पर गिरी ओस की बूँदे सूरज के रौशनी पड़ते ही शबनम की मोतिया बनी बिखरी होती हैं जिसके एक — एक कण से प्यार के नये एह्साह के साथ ही विद्रोह का स्वर फूट पड़ा हो। जो एक नई दुनिया को नया प्रकाश दे रहा हो। लुधियाने में साहिर ने घर चलाने के लिए छोटे — मोटे काम किये उसके बाद वो 1943 में लाहौर आ गये। उसी वर्ष उनके नज्मों का संग्रह तल्खिया छपी इसके छपते ही साहिर की ख्याति बड़े शायरों में होने लगी। तल्खिया में वो लिखते है कि

ताज तेरे लिये इक मज़हर-ए-उल्फ़तही सही तुझको इस वादी-ए-रंगी से अक़ीदत ही सही

मेरी महबूब कहीं और मिला कर मुझ से!

बज़्म-ए-शाही में ग़रीबों का गुज़र क्या मानी

सब्त जिस राह में हों सतवत-ए-शाही के निशाँ

उस पे उल्फ़त भरी रूहों का सफ़र क्या मानी

मेरी महबूब! पस-ए-पर्दा-ए-तशहीर-ए-वफ़ा

तो दूसरी तरफ

चलो इक बार फिर से अज़नबी बन जाएँ हम दोनों

न मैं तुमसे कोई उम्मीद रखुं दिलनवाज़ी का,

न तुम मेरी तरफ देखो गलत अंदाज़ नज़रों से

न मेरे दिल की धड़कन लडखडाये मेरी बातों से

न ज़ाहिर हो हमारी कशमकश का राज़ नज़रों से

तुम्हें भी कोई उलझन रोकती है पेशकदमी से

मुझे भी लोग कहते हैं कि ये जलवे पराये हैं

मेरे हमराह भी रुसवाइयां हैं मेरे मांझी की

तुम्हारे साथ में गुजारी हुई रातों के साये हैं

1945 में प्रसिद्ध उर्दू पत्र अदब–एतारिकऔर शाहकार (लाहौर) के सम्पादक बने। उन्होंने अपने सम्पादन काल में इन दोनों पत्रों को बुलन्दियों पर पहुचाया। वो वक्त तरक्की पसन्द और जंगे आजादी के दौर से गुजर रहा था, भला साहिर का इंकलाबी शायर चुप कैसे रहता और उन्होंने कहा कि ——–

ख़ून अपना हो या पराया हो नस्ले-आदम का ख़ून है आख़िर

जंग मग़रिब में हो कि मशरिक में अमने आलम का ख़ून है आख़िर

बम घरों पर गिरे कि सरहद पर रूहे-तामीर ज़ख़्म खाती है

खेत अपने जले या औरों के ज़ीस्त फ़ाक़ों से तिलमिलाती है।

साहिर के इन गहरी अभिव्यक्ति से आम समाज की पीड़ा झलकती है। साहिर के इन जज्बातों पे महान साहित्यकार और फिल्मकार ख्वाजा अहमद अब्बास की कलम कुछ युं बयां करती है, साहिर के पिछले कल को एक मौके पर सर सैयद अहमद खा ने कहा था कि अगर खुदा ने मुझसे पूछा कि दुनिया तुमने क्या काम किया, तो मैं जबाब दूंगा कि मैंने ख्वाजा अल्ताफ हुसैन हाली से ” “मुस्द्द्से हाली लिखवाई। इसी तरह जो ऐतिहासिक तौर से उपयोगी साबित हुई, तो वह एक खुली चिठ्ठी थी, जो मैंने 1948 में साहिर लुधियानवी के नाम लिखी थी। साहिर उस वक्त पाकिस्तान चले गये थे। यह खुला ख़त साहिर लुधियानवी के नाम था, मगर उसके जरिये मैं उन सब तरक्की — पसंदों को आवाज दे रहा था जो फसादों के दौरान यहाँ से हिजरत कर गये थे। तीन महीने बाद मैं हैरान रह गया, जब मैंने साहिर लुधियानवी को मुंबई में देखा। उस वक्त तक मैं साहिर से निजी तौर पर ज्यादा वाकिफ न था, लेकिन उनकी नज्मों खासतौर पर‘ “ताजमहल का मैं कायल था, और इसी लिए मैंने वह खुली चिठ्ठी साहिर के नाम लिखी थी। जब साहिर को मैंने मुंबई में देखा, तो मैंने कहा, आप तो पाकिस्तान चले गये थे ?’ “उन्होंने विस्तार पूर्वक बताया कि जब मेरा ख़त उन्होंने अख़बार में पढ़ा, तो वह दुविधा में थे। पचास प्रतिशत हिन्दुस्तान आने के हक़ में और पचास प्रतिशत पाकिस्तान में रहने के हक़ में थे। मगर मेरी खुली चिठ्ठी ने हिन्दुस्तान का पलड़ा भारी कर दिया और वह हिन्दुस्तान वापस आ गये और ऐसे आये कि फिर कभी पाकिस्तान न गये। हालांकि वहां भी उनके चाहने वालों और उनकी शायरी को चाहने वालों की कमी न थी। उस वक्त से एक तरह की जिम्मेदारी साहिर को हिन्दुस्तान बुलाने के बाद मेरे कंधो पर आ पड़ी। फ़िल्मी दुनिया में इंद्रराज आनन्द ने उन्हें अपनी कहानी नौजवान के गाने लिखने के लिए कारदार साहब और निदेशक महेश कॉल से मिलवाया और पहली फिल्म में ही साहिर ने अदबी शायरी के झंडे गाड दिए | फिल्म नौजवान के गीत ने साहिर को हिन्दी सिनेमा में स्थापित कर दिया और उन्होंने हिन्दी सिनेमा को ऐसे गीतों की माला से सजाया जो आज की तवारीख में इतिहास बन के खड़ा है।

रात भी है कुछ भीगी-भीगी, चांद भी है कुछ मद्धम-मद्धम

तुम आओ तो आँखें खोले, सोई हुई पायल की छम-छम

किसको बताएँ, कैसे बताएँ, आज अजब है दिल का आलम

चैन भी है कुछ हलका-हलका, दर्द भी है कुछ मद्धम-मद्धम

तुम न जाने किस जहाँ में खो गए हम भरी दुनिया में तनहा हो गए

मौत भी आती नहींआस भी जाती नहीं

दिल को यह क्या हो गया, कोई शय भाती नहीं

लूट कर मेरा जहाँ, छुप गए हो तुम कहाँ...

साहिर ने फिल्मों में भी अपनी अदबी शायरी को बनाये रखा और यह कहा कि

न मुँह छुपा के जियो और न सर झुका के जियो

ग़मों का दौर भी आये तो मुस्कुरा के जियो

न मुँह छुपा के जियो और न सर झुका के जियो

घटा में छुपके सितारे फ़ना नहीं होते, अँधेरी रात में दिये जला के चलो

न मुँह छुपा के जियो और न सर झुका के जियो…”

उस दिन जब साहिर अपनी आखरी सांसे ले रहे थे तब भी उन्होंने अपनी रविश न छोड़ी। जो भी लिखा, वह एक शायर के जज्बात और एहसासों की नुमाइंदगी करता था। कभी उन्होंने अपना कलात्मक मियर न गिरने दिया। बला की लोकप्रियता नसीब हुई साहिर को। उसमें उर्दू जुबान की लताफत, मिठास, हसन और जोर का भी दखल था, और उस जुबान के सबब से हस्सास और नाजुक – मुजाज और रंगीले शायर की सृजन का भी दखल था, जो उस जुबान का एक ही वक्त में आशिक भी था और माशूक भी।

आशिके — सादिक इस लिहाज से कि वह उस वक्त उस जुबान पर मोहित थे। साहिर ने उर्दू के लिए बहुत सी परेशानियों का सामना किया और उसके अस्तित्व के लिए लड़ते भी रहे, माशूक इन मायनों में कि उस जुबान ने जितनी छूट साहिर को दे राखी थी उतनी किसी और शायर को नहीं दी थी। साहिर ने जितने तजुर्बात शायरी की वह किसी ने कम किये होंगे। उन्होंने सियासी शायरी भी की है, रोमानी शायरी भी की। किसानों और मजदूरों की बगावत का ऐलान भी किया ऐसी शायरी भी की जो त्ख्लिकी तौर से पैगम्बरी की सरहदों को छू गयी और ऐसी शायरी भी की जिसमें रंगीन मिजाजी और शोखी झलकती दिख जायेगी। फ़िल्मी शायरों को एक अदबी मियार सबसे पहले साहिर ने ही दिया, उन्होंने फिल्म देखने वालो के जोक को न सिर्फ ऊंचा उठाया, बल्कि एक सच्चे शायर की तरह कभी आवामी मजाक को घटिया न समझा, वरन

मैं पल दो पल का शायर हूँऔर

कि जैसे तुझको बनाया गया है मेरे लिएजैसे गीत लिखकर दूसरों को रास्ता दिया।

उस अजीम हस्ती शायर साहिर को मेरा नमन।

सुनील दत्ता — स्वतंत्र पत्रकार व समीक्षक

(इसके कुछ अंश ख्वाजा अहमद अब्बास के संस्मरण से लिए गये है।)

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सदियों से इंसान बेहतरी की तलाश में आगे बढ़ता जा रहा है, तमाम तंत्रों का निर्माण इस बेहतरी के लिए किया गया है। लेकिन कभी-कभी इंसान के हाथों में केंद्रित तंत्र या तो साध्य बन जाता है या व्यक्तिगत मनोइच्छा की पूर्ति का साधन। आकाशीय लोक और इसके इर्द गिर्द बुनी गई अवधाराणाओं का क्रमश: विकास का उदेश्य इंसान के कारवां को आगे बढ़ाना है। हम ज्ञान और विज्ञान की सभी शाखाओं का इस्तेमाल करते हुये उन कांटों को देखने और चुनने का प्रयास करने जा रहे हैं, जो किसी न किसी रूप में इंसानियत के पग में चुभती रही है...यकीनन कुछ कांटे तो हम निकाल ही लेंगे।

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