लिखने की जरूरत वैसे ही है जैसे मातृत्व की है : ममता मेहरोत्रा

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ममता मेहरोत्रा
ममता मेहरोत्रा

आलोक नंदन

समाज में महिलाओं को लेकर कई मिथक टूट चुके हैं और कई टूटने के कगार पर हैं। यह सच है कि आज भी समाज में महिलाओं को लेकर पारंपरिक सामंतवादी अवधारणाएं हावी हैं, महिलाओं को आज भी अपने वजूद के लिए एक साथ कई मापदंडों पर खरा उतरने का दबाव रहता है। उन्हें छोटी-छोटी बातों के लिए दूसरों पर निर्भर रहना पड़ता है। लेकिन साथ ही यह भी सच है कि वे अपना आकाश भी खुद रच रही हैं और अपनी उड़ान भी खुद तय कर रही हैं। ममता मेहरोत्रा इसकी बेहतरीन मिशाल हैं।

एक ओर पटना के आईजीएमएस स्थित डीएवी स्कूल में बातौर प्रिंसिपल अपने प्रबंधकीय क्षमता को स्थापित करते हुये बच्चों के भविष्य को संवार रही हैं तो दूसरी ओर लेखन के क्षेत्र में बड़ी कुशलता से अपनी कलम चला रही हैं। विभिन्न विषयों पर अब तक इनकी कई पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं और कई पाईप लाइन में हैं। इतना ही नहीं प्रकृति के साथ खुद को अभिव्यक्त करने के लिए रंगों का भी जमकर सहारा ले रही हैं। इन्होंने पेंटिग को भी अपनी वजूद का अहम हिस्सा बना लिया है। या यूं कहा जा सकता है कि अपने वजूद को ममता मेहरोत्रा पेंटिग के माध्यम से भी सशक्त तरीके से अभिव्यक्त कर रही हैं।

यह पूछने पर कि एक साथ आप इतने सारे कार्यों को कैसे अंजाम देती हैं, उनकी आंखों में आत्मविश्वास की चमक थोड़ी और तेज हो जाती है और वो कहती हैं, ‘अनुशासन से, हर काम को मैं वक्त पर करना पसंद करती हूं। मेरे लिए सबकुछ निर्धारित है। यदि आपकी जिंदगी अनुशासन से चलती है तो आपके सामने कोई भी मुश्किल ठहर नहीं सकती। ’

वर्ष 2002 में बिहार में महिलाओं के लिए पहला हेल्पलाइन की शुरुआत करने में ममता मेहरोत्रा ने अहम भूमिका निभाई थी। हेल्पलाईन की कॉआर्डिनेटर थी। बिहार में महिलाओं के खिलाफ घरेलु हिंसा को रोकने के लिए इन्होंने हेल्पलाईन के माध्यम से चौतरफा काम किया था। कहा जाता है कि एक रचनाकार अपने अगल-बगल के परिवेश से ही किरदारों का चयन करता है। शायद इसी दौरान उन्हें बिहार में महिलाओं को कई स्तर पर गहराई से समझने का मौका मिला। शायद यही वजह है कि इनकी रचनाओं में महिलाओं को कई सतहों पर कभी खुद से तो कभी सामाजिक मान्यताओं और विडंबनाओं से जूझते हुये देखा जा सकता है। स्कूली प्रबंधन को जहां वो पेशेवर अंदाज में लेती हैं वहीं लेखन में वो खुद को पूरी तरह से डूबो कर सुकून की तलाश करती हैं।प्रबंधकीय कार्य उन्हें आर्थिकतौर पर आत्मनिर्भर बनाता है तो लेखन उन्हें रूहानी सुकून देता है, उनके विचारों और भावनाओं को पंख देता है। तभी तो एक आत्मविश्वास भरी मुस्कान के साथ वो कहती हैं, ‘स्कूल संचालन एक पेशा है, प्रबंधन से जुड़ा हुआ काम है। लेकिन लेखन ! यह तो अभिव्यक्ति का एक सशक्त माध्यम है। मैं लंबे समय से लिख रही हूं, और लिखने में मुझे सुकून मिलता है।’

हालांकि कई किताबें लिखने के बावजूद अभी उन्हें लगता है कि उनके जेहन में कुछ ऐसी बातें हैं जिसे खुलकर लेखनी से अभिव्यक्त करने से हिचक रही हैं। इस संबंध में जब उन्हें टटोलने की कोशिश की गई तो थोड़ी देर तक खामोशी अख्तियार करने के बाद उन्होंने कहा, ‘मेरे अंदर कुछ ऐसी बातें हैं जिन्हें मैं कह नहीं पा रही हूं। शायद मैं डर रही हूं। समाज का डर नहीं है। जब कुछ लिखेंगे तो प्रतिक्रिया तो होगी ही। और यदि आप स्थापित सामाजिक नार्म्स को चुनौती देती हैं तो प्रतिक्रिया और तीखी होगी। मुझे लगता है कि एक लेखक हमेशा उथल पुथल की मानसिकता में रहता है। इस दौर से मैं भी गुजरती हूं और मुझे जरूरत होती है अड़े रहने की। मैं स्वीकार करती हूं कि मेरे अंदर कई विरोधाभाष है। इसे लेकर मेरे पति मेरी आलोचना करते हैं। मसलन खुलापन तो मुझे स्वीकार है, लेकिन एक मर्यादा में। खुलेपन का यह मतलब नहीं है कि आप घर से बाहर निकल जाये और सिगरेट, शराब और अय्याशी में डूब जाये। मैं इसे गलत मानती हूं। जीवन में मूल्यों का महत्व तो होना ही चाहिए।  ’

एक लेखक के तौर पर सामाजिक विषमता ममता मेहरोत्रा को गहराई से प्रभावित करता है। शोषकों के खिलाफ वो खुद को शोषितों के पक्ष में खड़ा पाती हैं। लेकिन सर्वहार के ध्येय को प्राप्त करने के हिंसक तौर तरीकों को वो न्यायसंगत नहीं समझती हैं। बेबाक अंदाज में वो कहती हैं, ‘समाज में कई समस्या आर्थिक विषमता की वजह से है। आर्थिक विषमता की व्याख्या और पड़ताल में मैं खुद को एमसीसी के करीब पाती हूं। लेकिन मुझे लगता है कि इसका समाधान रॉबिन हुड टाईप स्टाईल में नहीं हो सकता। लूटमार समाधान नहीं है। जो कुछ भी हो संवैधानिक तरीके से हो। बिल गेट से हम सबक ले सकते हैं जो अर्न भी कर रहे हैं और सामाजिक जिम्मेवारियों से भी रूबरू हो रहे हैं।’

‘बुनकर की बेटी’ और  ‘हॉर्न ’ जैसी सशक्त कहानियों की रचना करने वाली ममता मेहरोत्रा प्रेमचंद से काफी प्रभावित हैं। इनकी कहानियों में भी ग्रामीण पृष्ठभूमि वाले किरदारों की प्रधानता है। वैसे शहरी और खासकर प्रशासनिक हलकों के किरदार भी उनकी कहानियों में अपनी तमाम खूबियों और खामियों के साथ अपने लक्षित उद्देश्यों को हासिल करने के लिए किसी भी सीमा तक जाने की अपनी जिद के साथ मजबूती से नजर आते हैं। उनकी अप्रकाशित कहानी ‘खेल’  इसका बेहतरीन उदाहरण है जिसमें एक डीएम सूबे की राजधानी में बने रहने के लिए सत्ता के शिखर पर बैठे शख्स को चढ़ावा चढ़ाता है।

‘अलकेमी ’ और ‘ गॉन विद विंड’ उनकी प्रिय पुस्तकों में शुमार हैं। इसके अलावा वो शेक्सपीयर को भी बड़े चाव से पढ़ती हैं। ममता मेहरोत्रा फिलहाल ‘माधवी’ नाटक की रचना करने में व्यस्त हैं। माधवी एक पौराणिक चरित्र है, जिसे पुत्र उत्पन्न करने के लिए एक के बाद एक कई राजाओं को सौंपा जाता है। यह पूछने पर कि लिखने की जरूरत क्यों, वो कहती हैं- लिखने की जरूरत वैसे ही जैसै मातृत्व की है।

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