पटना को मैंने करीब से देखा है (पार्ट-2)

(दिल्ली, जम्मू, पंजाब और मुंबई जैसे शहरों में  लंबे समय तक भटकने के दौरान पटना की बहुत याद आती रही। जिंदगी और खुली आंखों से देखे गये सपनों ने कहीं ठहरने की फुर्सत नहीं दी…जिधर खिंचा, चल दिया..अब पटना में कुछ सुकून से हूं…तो क्यों न इस शहर के बारे में ही लिखा जाये?……यह मेरा शहर है, मेरा, इतना तो मैं कह ही सकता हूं…दशकों से इस शहर से दूर रहने के बाद मैं यह जान गया हूं..कि मैं इसे दिवानगी के हद तक प्यार करता हूं… )

 थाइमन चौक की तरह हड़ताली मोड़ भी रक्त में डूबा रहा 

इतिहास को लोगों के जेहन में जिंदा रखने के लिए स्मारकों, प्रतीक चिन्हों, प्रतिमाएं, महलों, भवनों आदि को व्यापाकतौर पर बनाने का रिवाज रहा है। शायद वर्तमान पीढ़ी इस खौफ से इन कार्यों को अंजाम देती है ताकि आनेवाली पीढ़ी उन्हें भी उचित सम्मान के साथ सभ्यता के धरोहर के रूप में स्थापित करने की राह पर चलती रहे। लेकिन सभ्यता के पटल पर घटने वाली घटनाएं किसी नियम की मुहताज नहीं होती, भले ही वैज्ञानिक समाजवाद के प्रतिवादक (कार्ल मार्क्स और एंजिल्स) और उनके शिष्यगण इसके पक्ष में तथ्यों और तर्कों की अंबार क्यों न लगा दें। किसी काल खंड में सामूहिक रूप से कदमताल करते हुये लोग कभी-कभी अदृश्य शक्तियों से संचालित होते हुये सभ्यता के सीने पर ही घाव कर जाते हैं, और यह घाव तमाम स्मारकों से इतर प्रकृति द्वारा अंकित मुहर की तरह होता है, जो सुखद होने के साथ-साथ अति घिनौना भी हो सकता है, और जिसे दुनिया के किसी भी वाद की कसौटी पर नहीं आंका जा सकता। पुनाईचक मुहल्ले में जला हुआ विशालकाय दानव कम से कम पटना के इतिहास के सीने पर प्रकृति द्वारा अंकित एक बदनुमा मुहर ही था।

मुंबई की फिल्मी दुनिया में जोर आजमाइश के दौरान फिल्म पत्रकार मोस्यू अजय ब्रह्मात्मज से मुलाकात हुई थी। अपने चवन्नी छाप ब्लाग के लिए उन्होंने मुझसे अपने शहर के फिल्म से संबंधित अनुभवों को लिखने का आग्रह किया था। उनकी योजना अपने ब्लाग चवन्नी छाप पर करीब 100 लोगों के उनके शहर से जुड़े फिल्मी अनुभवों को प्रकाशित करने की थी। उनकी बातों को सुनकर पटना के तमाम सिनेमाघर- अशोक, वीणा, पर्ल, रिजेंट, एलिफिस्टन, रुपक,अप्सरा, वैशाली, मोना आदि –  मेरे जेहन में एक बार फिर से जिंदा हो उठे थे, लेकिन मुंबई की आपाधापी की वजह से उन्हें सिलसिलेवार तरीके से शब्दों में नहीं ढाल सका था, और अंतत: मोस्यू  अजय ब्रह्मात्मज को मेरी ओर से निराश होना पड़ा था। लेकिन इतना मैं जरूर कहूंगा कि उन्होंने मेरे दिमाग को मेरे खुद के शहर की तरफ जरूर धकेल दिया था। उस समय भी यदि मैं पटना के सिनेमाघरों के बारे में लिखता तो निसंदेह शुरुआत उसी जले हुये विशालकाय दावन से ही करता, जिसकी वजह से मैंने अपने जीवन की पहली फिल्म शोले देखी थी, और उसके बाद फिल्मों के प्रति मेरी दीवानगी सभी सीमाओं के परे थी।     

उस जले हुये दानव के अंदर पड़े लोहे-लक्कड़, पीतल और तांबे की कीमती सामानों को पुनाईचक मुहल्ले और उसके आसपास के इलाके के बड़े चोरों ने पहले ही उड़ा दिया था। बड़े चोरों की कई टोलियां बहुत दिनों तक वहां हाथ साफ करती रहीं। बोरे में भर-भर कर वे लोग सामान को बाउंड्री से बाहर निकालते थे, और औने पौने दाम में मिठाई लाल नाम के एक कबाड़ी वाले को बेच खाते थे। मिठाई लाल की कबाड़ी की दुकान पीडब्ल्यूडी आफिस के ठीक पीछे वाली सड़क पर थी। इस सड़क पर आफिस के दीवार से सटे बहुत बड़ी संख्या में गाय-भैंस बांधे रहते थे जिसके कारण बरसात के दिन में पूरी सड़क गोबरमय हो जाती थी, और लोग बड़ी मुश्किल से उस पर चल पाते थे। कींचड़ और गोबर एक साथ मिलकर दम घोटने वाला बदबू उत्पन्न करता था।

बड़े शातिर चोरों के बाद पुनाईचक मुहल्ले के नीचले तबके के छोटे-छोटे बच्चे अपनी चोरी के हुनर को चमकाने में लगे हुये थे। इनमें ज्यादातर कहार, दुसाध, नाई, मुसहर आदि जाति के थे, और पुनाईचक के सामाजिक परिदृश्य पर इनका स्थान काफी नीचे थे और अन्य तबकों के लोग इन्हें इनकी जाति से बुलाते या गलियाते थे- “अरे चमरा वाला, अरे दुसधा वाला, अरे मुसहरवा के जना आदि   

 समूह में मिलकर बड़े-बड़े लोहे को काटकर पूरी सतर्कता के साथ वे बाउंड्री के पार करके उसे मिठाईलाल की कबाड़ी की दुकान तक पहुंचाते थे और उससे मिले पैसों से पनामा सिगरेट पीते थे और सिनेमाघरों में फिल्म देखने जाते थे। चोरी के सामान को मिठाईलाल की दुकान तक पहुंचाने के दौरान उन्हें एक साथ दो मोर्चों पर सतर्कता बरतनी पड़ती थी- एक मोर्चा पुलिस का था और दूसरा मजे हुये शातिर चोरों का, जो गउंवावाला थे। पुलिस के हाथ पड़ने पर चोरी का सामान जाने के साथ उनकी धुनाई की पूरी संभावना बनी रहती थी, जबकि मचे हुये चोर सामान पर कब्जा करने के बाद उनके गाल पर एक दो तमाजा रसीद करके उन्हें चलता कर देते थे।

जले हुये विशालकाय दानव को काटने से लेकर उसके टुकड़ों को मिठाईलाल की दुकान तक पहुंचाने के लिए नन्हें चोरों की टोली को एक स्पष्ट रणनीति के तहत काम करना पड़ता था, इसके लिए वे पूरी तरह से अपनी सहज बुद्धि का इस्तेमाल करते थे। नन्हें चोरों का गिरोह कई टोलियों में बंट जाता था। एक टोली के लड़के, जो लोहे काटने में दक्ष थे, बड़ी सफाई से अपना काम करते थे। लोहे काटने के दौरान इस बात का खासा ध्यान रखा जाता था कि इसकी आवाज बाहर सड़क तक न जाये।    इस बीच दूसरी टोली के लड़के बाहर चारों ओर फैलकर अगल-बगल के लोगों पर ध्यान रखते थे। किसी के जले हुये दानव की ओर आने की स्थिति में वे भागकर वहां लोहे काट रहे लड़कों को सूचित कर देते थे और फिर कुछ समय के लिए काम बंद कर दिया जाता था। तीसरी टोली पुलिस और घाघ चोरों की टोह लेती रहती थी, ताकि उनकी ओर से किसी तरह का बखेड़ा खड़ा न हो। सामान तैयार हो जाने की स्थिति में तीसरी टोली के लड़के जले हुये दानव से लेकर मिठाईलाल की दुकान तक के रास्ते को अच्छी तरह से खंगाल लेते थे, ताकि पुलिस और घाघ चोरों की नजरों से सामान को बचाकर  इसके बदले रकम हासिल की जा सके। मिठाईलाल की दुकान तक सामान पहुंचने के दो रास्ते थे, एक मुख्य सड़क से होकर और दूसरा बाउंड्री के अंदर-अंदर ही मिठाई लाल की दुकान के ठीक सामने। दूसरे मार्ग पर खतरा कम था, नन्हें चोरों का गिरोह अधिकतर इसी रास्ते का इस्तेमाल करता था। जब डोम कुटुंब का कोई सदस्य इन्हें चोरी का सामान ले जाते हुये देखता था हो हल्ला मचाते हुये इन्हें डांटता था, लेकिन उसकी परवाह किये बिना ही ये लोग अपने काम को अंजाम तक पहुंचान में लगे रहते थे। ज्यादा हो हल्ला करने की स्थिति में उस व्यक्ति को भी एक हिस्सा देने की बात कह कर उसे चुप करा देते थे।  

मिठाईलाल सिर झटककर पहले उनके सामान को यह कह कर खरीदने से इन्कार कर देता था कि ये सरकारी माल है, पकड़ने की जाने की स्थिति में उसे भी लेने के देने पड़ सकते हैं। इसके बाद बिना तौले ही उन्हें कुछ रुपये पकड़ा देता था। उसकी दुकान में हमेशा ट्रेन की तरह बीड़ी धूंकती कुछ औरतें और कबाड़ी के सामनों को इधर-उधर करते छोटे-छोटे बच्चे बैठे रहते थे। सभी के बाल आपस में मकड़ी के जाल की तरह उलझे रहते थे, उनकी मटमैली जिंदगी की तरह। मिठाईलाल अपनी बालों में खुश्बूदार तेल लगाता था, जो उसकी कनपटी से नीचे सरकते हुये उसके दोनों गालों पर पसर जाता था। दुकान के सामने कबाड़ी का टाल लग जाने के बाद वह उन्हें मोटे-मोटे धूसरों की सहायता से लकड़ी के बने बड़े-बड़े चौखोर बक्से में भरवाता था और फिर लोहे की तारों की सहायता से उन्हें जकड़ कर बक्सों को निकाल लेता था। बाद में बड़े-बड़े ट्रक आते थे और उन सामानों को लाद कर ले जाते थे। कबाड़ चुनने वालों की एक बहुत बड़ी फौज, जिसमें महिलाओं और बच्चों की अधिकता थी, शहर भर से कबाड़ चुनचुन कर मिठाईलाल की दुकान में लाकर बेचते थे। चोरी का माल सामने आते ही मिठाईलाल की नजरे उसे ताड़ जाती थी, और कम से कम कीमत देकर माल को हस्तगत करने की कला में वह पूरी तरह से दक्ष था।

एक बार लड़कों के गिरोह ने मोटे माल पर हाथ साफ किया और मिठाईलाल से अच्छी खासी सौदेबाजी करने के बाद सिनेमा देखने का प्लान बनाने लगे। एक-दो लड़कों के साथ मेरी दोस्ती हो गई थी, उन्होंने मुझे भी अपने साथ चलने को कहा, और मैं भी बिना सोचे समझे उनके साथ हो लिया। उस समय बेली रोड पर मिनी बसें चला करती थी, और सड़क पर टैफिक का दबाव कम था। सभी लड़के सचिवालय के पास स्थिति बस स्टैंड पर आये और बस का इंतजार करने लगे। बस आकर अपने स्थान पर लगी लेकिन कोई भी बस के अंदर दाखिल नहीं हुआ। सभी लोग बस के पीछे कुछ दूरी पर खड़े हो गये। जैसे ही बस खुली सभी दौड़-दौड़ कर बस के पीछे लटकने लगे। जब बस ने रफ्तार पकड़ी तो मैंने भी अपने आप को बस के पिछले हिस्से में उन लड़कों के साथ लटकता हुआ पाया। मेरी दसों उंगलियां बस के पीछे शीशे की ओर लगी हुई एक बड़ी सी जाली में कस के उलझी हुई थी, जबकि अन्य लड़के एक हाथ से जाली को पकड़कर सड़क की तरफ मुड़कर आने जाने वाले राहगीरों को देखकर बड़ी सहजता से तरह-तरह की मस्तीभरी आवाजें निकाल रहे थे। थोड़ी ही देर बाद बस रेलवे लाइन को क्रास करते हुये हड़ताली मोड़ के पास आकर रुकी।

दुनिया के प्रत्येक शहर में एक न एक ऐसा स्थान जरूर होता है, जिसका इस्तेमाल शहर के लोग राजनीतिक प्रदर्शनों व सामूहिक हंगामों के लिए करते हैं। डेमोक्रेटिक सेटअप को चलायमान करने के लिए इस तरह के स्थान को होना आवश्यक है। शहर की भौगोलिक स्थिति को देखते हुये इस तरह के स्थान का निर्धारण शहरवासी सहज व स्वस्फूर्त रूप से कर लेते हैं। हड़ताली मोड़ पटना के राजनीतिक धड़कन का प्रतिनिधित्व करता था। उन दिनों शहर में जितने भी राजनीतिक जत्थे निकलते थे सभी को हड़ताली मोड़ से होकर ही गुजरना पड़ता था और सभी को उसी के पास ही रोक दिया जाता था, शायद यही वजह है कि उस मोड़ का नाम हड़ताली मोड़ पड़ गया। विछुब्ध लोग अपनी मांगो को लेकर महीनों उस मोड़ के इर्दगिर्द तंबू डालकर धरने पर बैठे रहते थे। राजभवन जाने का रास्ता इसी मोड़ से ही होकर गुजरता था। सत्ता में बैठे हुक्मरान किसी भी तरह के प्रदर्शनकारी जत्थे को इसी मोड़ पर रोक देते थे, और जरूरत पड़ने पर लाठी-डंडों के साथ-साथ आंसू गैस और गोलियों का भी सहारा लेते थे।

जेपी मूवमेंट के समय हड़ताली मोड़ पर एक के बाद प्रदर्शनों का तांता लग गया था। यह हड़ताली मोड़ बिहार में मोस्यू लालू यादव के उदय का भी गवाह है। इसी मोड़ पर खड़े होकर वह कांग्रेस को मजाकिया लहजे में परिवारवाद के कारण जमकर कोसते हुये लोगों को गुदगुदाते थे। बाद में आरक्षण मूवमेंट के समय भी इसी हड़ताली मोड़ पर पुलिस और आरक्षण विरोधी छात्रों के बीच जमकर संघर्ष हुआ था। चीन के थाइमन चौक की तरह इस हड़ताली मोड़ पर विभिन्न अवसरों पर हर तबके के लोगों के खून बहते ही रहते थे, लेकिन अलग-अलग प्रदर्शनों को कलेक्टिविटी में देखने का रिवाज नहीं है। इन्हें हमेशा वाद और दलीय नजरिये से ही देखने की संस्कृति विकसित की गई है। यही कारण है कि इतिहास हमेशा हमारे सामने खंडित रूपों में एक पक्षीय नजरिये से प्रस्तुत किया जाता है, कभी राजकीय पाठ्यपुस्तकों द्वारा, तो कभी राज्य आश्रित इतिहास लेखकों द्वारा।       

बस जैसे ही हड़ताली मोड़ के पास रुकने के क्रम में थोड़ी धीमी हुई सभी लड़के धड़ाधड़ कूदकर एक ओर खड़े हो गये। उनका अनुकरण करते हुये मैं भी बस से नीचे कूद पड़ा। थोड़ी देर बाद जब बस चली तो सभी लड़के फिर उसके पीछे लटक लिये। लगभग हर स्टाप पर यही क्रम चलता रहा। दो तीन स्टाप क्रास करने के बाद मैं भी बस के पीछे लटकने और कूदने में पूरी तरह से ट्रेन्ड हो चुका था। बचपने की खासियत होती है कि उसे जिसे सांचे में डाल दें, अपने आप को वह उसी सांचे के अनुरुप वह ढाल लेता है। देखते ही देखते मेरी उंगलियां बसों में लटकने के लिए एक निश्चित तरीके से हरकत करने लगी थी। बस की गति के साथ उस पर छलांग मारकर जाली को सही टाइमिंग से पकड़ने की कला में मैं दक्ष हो चुका था। यदि चार्ल्स डारविन के विकासवादी सिद्धांत को माने तो इनसान का बंदर से मानव की ओर विकास यात्रा इसी तरह की चेष्टाओं का नतीजा है। दसों उंगलियों को फ्री होने में हजारों वर्ष लगे होंगे, और अब तो ये इतना फ्री हो चुके हैं कि की-बोर्ड पर एक साथ विधुत की गति से दसों उंगलियों का इस्तेमाल करने की काबिलियत इंसान  हासिल कर चुका है। बहरहाल बस के पटना जंक्शन पहुंचने तक शहरी जीवन का एक नया अंदाज मैं सीख चुका था, जिसमें आगे के दिनों में और भी निखार आता गया।        

आलोक नंदन      

जारी……( अगला अंक अगले शनिवार को)

This entry was posted in अंदाजे बयां. Bookmark the permalink.

3 Responses to पटना को मैंने करीब से देखा है (पार्ट-2)

  1. Chikku says:

    If u write like this then someone(bihari) working in other part of country will surely return to patna after leaving his work

  2. RAJ SINH says:

    प्रिय आलोक नंदन जी,

    आपके इस साईट का एड्रेस बहुत पहले आपके द्वारा भेज दिया गया था और कई बार मैंने यह प्रयास भी किया पर सफलता न मिली .अब यहाँ पहुँच परम आनंद पा रहा हूँ . इसके कंटेंट ,कलेवर के क्या कहने .

    और तेवर ?

    यही तेवर बना रहे और ऐसी ही उच्चस्तरीय सामग्री मिलती रहे यही कामना प्रार्थना करूंगा और मेरे शुभआषीस के तो आप बहुत पहले से हक़दार हो चुका हूँ . व्यक्तिगत शोकों से तो आप अवगत हैं ही . अब माँ की आशीष साथ रख फिर से काम में जुट गया हूँ .

    परिवार के सभी सदस्यों को मेरा यथायोग्य प्रणाम स्नेह पहुंचाएं . उम्मीद है पटना पहुँच बच्चे मुंबई की सीमितता से मुक्त , आनंदित होंगे .

    सस्नेह
    राज सिंह

  3. Pink Friday says:

    Thanks for some good points there. I am kind of new to the internet , so I printed this off to put in my file, any better way to go about keeping track of it then printing?

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

You may use these HTML tags and attributes: <a href="" title=""> <abbr title=""> <acronym title=""> <b> <blockquote cite=""> <cite> <code> <del datetime=""> <em> <i> <q cite=""> <strike> <strong>