पारंपरिक गीतों से दूर हो रही होली…!

“धन्य-धन्य भाग तोहर हउ रे नउनियां….मड़वा में राम जी के छू अले चरणियां…”

ढोल मंजीरे की थाप पर होली गीतों के गायन की शुरूआत में गाया जाने वाला यह गीत अब गांव की चौपालों से भी सुनने को नहीं मिलता। यह होली मिलन में गाया जाने वाला पहला गीत है जो अपने आप में गूढ़ अर्थ रखता है। इस गीत विशेष में राम के अयोध्या आगमन पर जहां सभी मूक दर्शक बने हुए हैं वहीं उनके पैरों के नाखून काटने और उनमें महावर भरने  के बहाने नाइन को राम जी के चरण छूने का अवसर मिलता है, इस पर सभी उसे धन्य मानते हैं।

“सदा आनन्द रहे यही द्वारे  … मोहन खेले होली हो…” यह गीत होली मिलन की समाप्ति पर हर उस दरवाजे की समृद्धि और आशीर्वाद के रूप में गाया जाता है जिसमें लोग जमा होकर गांव की चौपाल पर अपने सुर देते। रंग, भंग, पूरी, पकवान और हंसी खुशी के बीच इस गीत को सुन कर ऐसा लगता मानों सुख और समृद्धि इस होली गीत के बहाने दरवाजे पर दस्तक दे रही है। इन गीतों को सुनकर अनायास मन झूम जाता है। इसी तरह और भी कई कर्ण प्रिय होली गीत जैसे “वीर कुवर सिंह टेकवा बहादुर … बंगला में उड़े रे गुलाल, “बम भोले बाबा कहां रंगलव पागड़िया …”, “होरी खेले रघुवीरा अबध में …होरी खेले रघुवीरा….”, तथा सर्वाधिक चर्चित जोड़ी राधा और श्याम की होली गीतों की धूम आज इस फिल्मी धुन में गुम हो रही है। इसके अलावे भी कितने पारंपरिक होली गीत तो अत्यंत कर्णप्रिय हैं जिन्हें गाने और समझाने वाला कोई नहीं। आज के इस व्यवसायिकरण ने होली गीतों के इन ऐतिहासिक धरोहर को आम आदमी से दूर कर दिया है। इन पारंपरिक गीतों की जगह आज फिल्मीं गीतों ने ले ली है। होली गीतों के नाम पर गाये जाने वाले यह गीत पूरी तरह से फिल्मी धुनों पर आधारित होते या फिर होली के बहाने अश्लीलता ही परोसते हैं। ऐसा नहीं कि फागुन की बयार से हमारी फिल्म इंडस्ट्री अछूती है। कभी हिन्दी फिल्मों में भी होली गीतों की अपनी खास पहचान हुआ करती थी।

मदर इंडिया का होली गीत … “होली आई रे कन्हाई रंग छलके सुना दे जरा बांसूरी…” आज भी लोगों की जुबान पर एक दम ताजा हैं।  सिलसिला  का ‘रंग बरसे …’, शोले का , ‘होली में दिल खिल जाते हैं रंगों में रंग मिल जाते है…’ गीत और भी कई फिल्मों के होली गीत लोगों में काफी पसंद किये गये। पर आज इस तरह के होली गीतों की जगह फिल्मों में भी कम या यों कहें खतम हो गई है। इनकी जगह ले ली है अश्लील और द्विअर्थी अइटम गीतों ने। हैरानी तो इस बात की है कि इन आइटम सौंग को भी इंडस्ट्री की चर्चित हीरोइनें ही अपने उपर फिल्मा रही हैं और फिल्म के व्यवसाय में मुनाफा के नाम पर समाज में फैली बुराइयों को सह दे रही हैं। होली, दीवाली या फिर किसी तरह के ऐतिहासिक पर्वों के सौहार्द को फैलाने की बजाय इनमें  आइटम सौंग के नाम पर भी व्यवसायिकता को ही बढ़ावा दिया जा रहा है। इसे कुछ गीतों के बोल से आसानी से समझा जा सकता है मसलन – गीतों में ‘झंडू बाम’, ‘फेविकोल’ आदि जैसे शब्दों का प्रयोग।

बहरहाल संगीत, रंग और बसंत का संदेश वाहक यह होली का पर्व कहीं व्यवसायिकता के इस दौर में अपना वजूद ही न खो दे। ऐसा माना जाता है कि फाल्गुन मास की पूर्णिमा के दिन होली के रंगों में पेड़- पौधे, पक्षी, फूल पत्तियां और फल के मंजर सभी इकक्ट्ठे होकर अपना संगीत देते हैं, जिससे होली का गीत बनता है। पर कहीं ये गीत इतिहास की बात न हो जायें।

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One Response to पारंपरिक गीतों से दूर हो रही होली…!

  1. Manoj Upadhyay says:

    परंपराओं के क्षरण में छिछली आधुनिकता क़ा बड़ा हाथ है. होली की परंपरा भी इसका अपवाद नहीं. आपका यह आलेख इस क्षरण को रोकने की दिशा में एक बड़ा प्रयास है अनिता जी. इस प्रयास के लिए आपको साधुवाद !

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