आवाम को क्या लाभ हुआ अयोध्या पचड़े से ???

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इलाहाबाद हाईकोर्ट लखनऊ पीठ ने अयोध्या मसले पर अपना निर्णय दिया है। पिछले 6 दशक से यह मामला चल रहा था। इसके कई रंग और रुप देखने को मिले। कोर्ट की तकनीकी उलझन से बाहर निकलकर इस मसले पर राष्ट्रव्यापी राजनीति की गई। राजनीतिक दल के मैनिफेस्टों में भी इसे शामिल किया गया और सत्ता के लालच में पड़कर गठबंधन की राजनीति करते हुये इस मसले को का

मन एजेंडा से बाहर भी किया गया। इस मसले को ढोते-ढोते एक पूरी पीढ़ी के दाढ़ी और बाल सफेद हो गये और गालों पर झुर्रियां तक पड़ गई। अब कोर्ट ने ठंडे दिमाग से इस पर फैसला दिया है।

प्रारंभिक रिपोर्ट के मुताबिक इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद की जमीन को तीन भागों में बांटा गया है। रामलला की मूर्ति वाले स्थान को भगवान राम को समर्पित किया गया है,

सीता रसोई और राम चबुतरा को निर्मोही अखाड़ा के लिए चिन्हित किया गया है, और शेष जमीन को सु्न्नी वक्फ बोर्ड को सौंपा गया है। साथ ही यह भी कहा गया है कि तीन महीने तक यथास्थिति बरकरार रखा जाएगा ताकि असंतुष्ट होने की स्थिति में कोई पक्ष सुप्रीम अदालत में गुहार लगा सके। बहरहाल फैसले को लेकर विभिन्न घटकों से सकारात्मक प्रतिक्रियाएं आ रही हैं। सु्न्नी वक्फ बोर्ड के वकील ने भी लोगों से शांति बनाये रखने की अपील करते हुये इस मसले को सुप्रीम अदालत में ले जाने की बात कही है।

 दुनियाभर में धार्मिक उन्माद का इतिहास बहुत पुराना है। यूरोपीय देशों में तो क्रूसेड और जेहाद लगातार होते रहे हैं, जिसमें लाखों लोग कुर्बान हुये। कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट के विवाद में भी खूब खून बहे हैं। एशिया में भी धर्म के नाम पर इतिहास के पन्नों में फसाद के कई अध्याय दर्ज हैं। विगत दो दशकों में भारत में धार्मिक उन्माद का प्याला कुछ ज्यादा ही छलका है। अयोध्या में  तथाकथित विवादास्पद ढांचा का ध्वंस 6 दिसंबर 1992 को हुआ था, जिसके बाद ताबड़तोड़ लाश गिरी थीं। हिन्दुस्तान से बाहर अन्य मुस्लिम बाहुल्य मुल्कों में कई मंदिर और देवालयों पर प्रहार किये गये  थे।  इस घटना से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की थूका-फजीहत भी हुई थी, देश में एक खास विचारधारा के वाहकों को चुनावी लाभ भी मिला था। अब इतने साल बाद हाईकोर्ट का यह फैसला आया है तो थोड़ी देर विराम देकर इस बात का मूल्यांकन करना बेहतर होगा कि इस तमाम पचड़े में देश की व्यापक आबादी को क्या लाभ हुआ। थोड़ी देर के लिए आस्था के घेरे से बाहर निकलकर इस पर विचार करने का अर्थ होगा समय के प्रवाह को समझते हुये उसे नई दिशा में मोड़ने का सामर्थ्य प्राप्त करना।                          

अयोध्या में कुछेक एकड़ जमीन को लेकर भारत के दोनों शक्तिशाली समुदाय वर्षों से एक दूसरे के सामने खड़े हैं, जबकि चीन भारत का हजारों एकड़ जमीन दबाये हुये है और भारत के पूर्वी राज्यों पर आंख भी गड़ाये हुये है। यदि चीन द्वारा दबाई गई जमीन को प्राप्त करने में दोनों समुदाय के लोग इतनी उर्जां झोंकते तो अब तक न जाने उन जमीनों पर कितने मंदिर और मस्जिद बन जाते। उत्पादन के लिहाज से भी अयोध्या पचड़े को राष्ट्रहित की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता है। साधु-संतों और मुल्ला-मौलवियों की भले ही इससे पूछ बढ़ी हो, लेकिन देश के आम आदमी को कुछ भी फायदा नहीं हुआ है। इस पूरे पचड़े में बहुत सारे परिवारों को तो अपने सदस्य भी गंवाने पड़े। दोनों खेमों के लोग भले ही उन्हें अपने-अपने तरीके से शहीद और वीर की उपाधि दें, लेकिन उन परिवारों को लगने वाले चोट की भरपाई नहीं कर सकते।

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सदियों से इंसान बेहतरी की तलाश में आगे बढ़ता जा रहा है, तमाम तंत्रों का निर्माण इस बेहतरी के लिए किया गया है। लेकिन कभी-कभी इंसान के हाथों में केंद्रित तंत्र या तो साध्य बन जाता है या व्यक्तिगत मनोइच्छा की पूर्ति का साधन। आकाशीय लोक और इसके इर्द गिर्द बुनी गई अवधाराणाओं का क्रमश: विकास का उदेश्य इंसान के कारवां को आगे बढ़ाना है। हम ज्ञान और विज्ञान की सभी शाखाओं का इस्तेमाल करते हुये उन कांटों को देखने और चुनने का प्रयास करने जा रहे हैं, जो किसी न किसी रूप में इंसानियत के पग में चुभती रही है...यकीनन कुछ कांटे तो हम निकाल ही लेंगे।

1 COMMENT

  1. ayodhya verdict ne bharat vibhajan ki yaad taji kar di. neharu,jinnah aur patel ki bhumika me dikhe hamare tino judges. Fark tha to sirf faisle ke bad hone wale dange ka.Is bar ek warg ka dil to tuta par aawaj nahi aayi.Do tukra hinduo ka to ek musalmano ka.kab band hogi yah tustikaran ki niti.Ya to puri rakhte ya puri de dete.

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