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भारतीय शिक्षण पद्धति में धर्म का अर्थ संप्रदाय नहीं, बल्कि सत्य, कर्तव्य और चरित्र निर्माण है: विजय प्रकाश

पटना, 26 जुलाई। बिहार विद्यापीठ, सदाकत आश्रम स्थित देशरत्न राजेन्द्र प्रसाद शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय का 10वाँ स्थापना दिवस रविवार को देशरत्न सभागार में गरिमामय वातावरण में मनाया गया। इस अवसर पर “भारतीय शिक्षण पद्धति में धर्म की भूमिका” विषय पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में शिक्षा, इतिहास, दर्शन और अध्यात्म से जुड़े विद्वानों ने भारतीय शिक्षा-दर्शन के मूल स्वरूप पर विस्तार से विचार रखे।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए बिहार विद्यापीठ के अध्यक्ष एवं सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी विजय प्रकाश ने कहा कि भारतीय शिक्षण पद्धति में धर्म का अर्थ किसी संप्रदाय विशेष से नहीं, बल्कि सत्य, अहिंसा, कर्तव्यपरायणता, आत्मानुशासन, करुणा, सेवा, सहिष्णुता और लोकमंगल जैसे सार्वभौमिक मानवीय मूल्यों से है। उन्होंने कहा कि ब्रिटिश शासन से पहले भारत की शिक्षा व्यवस्था समाज आधारित, समृद्ध और समावेशी थी। गुरुकुल, पाठशालाएँ और मदरसे स्थानीय सहयोग से संचालित होते थे तथा शिक्षा समाज के विभिन्न वर्गों तक पहुँचती थी।
उन्होंने कहा कि भारतीय शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा का समग्र विकास करना है। ध्यान, चिंतन, अवलोकन, स्मृति, भावनात्मक प्रबंधन और संवाद जैसे व्यक्तित्व निर्माण के महत्वपूर्ण आयाम आधुनिक शिक्षा में कमजोर पड़ गए हैं, जिन्हें पुनर्स्थापित करने की आवश्यकता है। उन्होंने राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 को भारतीय ज्ञान परंपरा और मूल्यपरक शिक्षा को पुनः स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल बताया।
बिहार विद्यापीठ के सचिव एवं सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी डॉ. राणा अवधेश ने स्वागत भाषण में कहा कि महर्षि पतंजलि के अष्टांग योग में वर्णित यम, नियम और आत्मानुशासन भारतीय शिक्षा की आधारशिला हैं। गुरुकुल परंपरा का उद्देश्य केवल विद्वान तैयार करना नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र के प्रति उत्तरदायी नागरिकों का निर्माण करना था।
महाविद्यालय की प्राचार्या डॉ. पूनम वर्मा ने वार्षिक प्रतिवेदन प्रस्तुत करते हुए वर्ष 2025-26 की शैक्षणिक उपलब्धियों, शिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रमों, शोध गतिविधियों और भावी योजनाओं की जानकारी दी।
मुख्य वक्ता वरिष्ठ पत्रकार एवं चिंतक पुरुषोत्तम ने कहा कि धर्म एक गतिशील अवधारणा है, जो मानव सभ्यता के विकास के साथ निरंतर विकसित हुई है। उन्होंने कहा कि भारतीय दर्शन में धर्म का वास्तविक स्वरूप आत्मबोध, कर्तव्य, न्याय और लोककल्याण है तथा शिक्षा का उद्देश्य मनुष्य में विवेक, नैतिक चेतना और सामाजिक उत्तरदायित्व का विकास करना है।
विशिष्ट वक्ता स्वामी भावात्मानन्द, सचिव, रामकृष्ण मिशन सेवाश्रम, मुजफ्फरपुर ने कहा कि धर्म व्यक्ति को आत्मसंयम, सेवा, प्रेम और करुणा का मार्ग दिखाता है। उन्होंने स्वामी विवेकानन्द के विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य मनुष्य के भीतर निहित दिव्यता का प्रकटीकरण है।
संगोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय के पूर्व इतिहास विभागाध्यक्ष डॉ. रत्नेश्वर मिश्र ने कहा कि भारतीय शिक्षण पद्धति विश्व की सबसे प्राचीन और समन्वयकारी शिक्षा परंपराओं में से एक है। उन्होंने कहा कि भारतीय शिक्षा में धर्म का तात्पर्य मनुष्य को सत्यनिष्ठ, न्यायप्रिय, धैर्यवान और लोकहितैषी बनाना है। उन्होंने मूल्यपरक शिक्षा की पुनर्स्थापना पर बल देते हुए वैज्ञानिक दृष्टिकोण और नैतिक चेतना के समन्वय की आवश्यकता बताई।
प्रश्नोत्तर सत्र में शिक्षक-प्रशिक्षुओं ने भारतीय शिक्षा, धर्म, नैतिक मूल्यों और राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 से जुड़े प्रश्न पूछे, जिनका विशेषज्ञों ने विस्तार से उत्तर दिया।
कार्यक्रम के अंत में निदेशक (शिक्षा, संस्कृति एवं संग्रहालय) डॉ. मृदुला प्रकाश ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत करते हुए बिहार विद्यापीठ गीत के भावार्थ की व्याख्या की और सभी से अपने नैतिक एवं सामाजिक दायित्वों के प्रति निष्ठावान रहने का आह्वान किया।
समारोह का शुभारंभ दीप प्रज्ज्वलन, स्वागत गीत और बिहार विद्यापीठ गीत के सामूहिक गायन से हुआ। अतिथियों को स्मृति-चिह्न देकर सम्मानित किया गया तथा राष्ट्रगान के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ।

संगोष्ठी का सर्वसम्मत निष्कर्ष रहा कि भारतीय शिक्षण पद्धति में धर्म का अर्थ किसी संप्रदाय विशेष का प्रचार नहीं, बल्कि सत्य, करुणा, कर्तव्य, आत्मानुशासन, न्याय और लोकमंगल जैसे सार्वभौमिक मानवीय मूल्यों की स्थापना है। वक्ताओं ने कहा कि शिक्षा तभी सार्थक है जब वह ज्ञान के साथ चरित्र, विज्ञान के साथ विवेक तथा व्यक्ति के साथ समाज और राष्ट्र के प्रति उत्तरदायित्व का विकास करे। यही भारतीय ज्ञान परंपरा का शाश्वत संदेश और राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 की मूल प्रेरणा है।

editor

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