क्या चुनावी लड़ाई के लिए नीतीश ‘बी प्लान’ पर काम कर रहे हैं ?

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जदयू सलाकारों से रू-बरू होते नीतीश कुमार

आलोक नंदन

दिन के ढाई बज रहे थे। कुछ युवा कार्यकर्ता पटना स्थित जदयू कार्यालय के सामने खड़े होकर ‘नीतीश कुमार जिंदाबाद’ के नारे लगा रहे थे। उमस भरी गर्मी थी। काले बादलों का एक टुकड़ा आसमान में लटका हुआ था। सूरज की किरण पृथ्वी के इस हिस्से पर तिरछी पड़ रही थी। फोटोग्राफरों का झूंड नारे लगाते कार्यकर्ताओं को कवर कर रहा था। कैमरे की फ्लैश से उत्साहित होकर नारों की गूंज थोड़ी तेज हो गई थी। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि पटना स्थित जदयू के मुख्यालय पर गहमा- गहमी का माहौल था। सड़कों पर तीन रो में कारों का काफिला दूर तक फैला हुआ था। पूछने पर किसी ने बताया-जदयू सलाहकारों की बैठक चल रही है। जिला स्तर से 186 प्रतिनिधि आये हैं और नीतीश कुमार भी इस बैठक में हिस्सा लेने आ रहे हैं। ’ नीतीश कुमार का नाम सुनते ही मैंने सोचा, चलो देख लिया जाये, क्या पोलिटिकल एक्टिविटी चल रही है जदयू के अंदर।

सुशासन के दौरान लगातार यह सुनने में आ रहा था कि बिहार में खबरों को अघोषित रूप से ‘किल’ किया जा रहा है। यहां तक कि सोशल मीडिया पर चलने वाले कार्टून यहां तक दिखाया जा रहा था कि बिहार के संपादक अपने खबर की हेडलाइन नीतीश कुमार से ही पूछ रहे हैं।  देश के संवेदनशील लोगों के बीच सुशासन के दौरान नीतीश कुमार की ‘मीडिया मैनेजमेंट’ की खासी चर्चा रही। अब वही लोग कह रहे हैं कि राष्ट्रीय स्तर पर नरेंद्र मोदी और उनकी मंडली कमोबेश मीडिया मैनेजमेंट के क्षेत्र में सुशासन के दौरान नीतीश मॉडल को ही अपना रही है। लोकसभा चुनाव में मोदी लहर हावी रही। बिहार में जीतन राम मांझी को सूबे की कमान सौंपने के बाद अब नीतीश कुमार 2015 में अपनी साख की लड़ाई लड़ रहे हैं। जब यह सुना कि बैठक जदयू सलाहकारों की है तो इसके नताइज में खासी दिलचस्पी जाग उठी।

कार्यालय कैंपस में दाखिल होते ही मेरी नजर एक टेंट की तरफ गई, जहां पर कई लोग कुर्सियों पर डटे हुये थे। उनके ठीक सामने वाले हॉल में बैठक चल रही थी। वहीं पर मालूम हुआ कि अंदर जदयू प्रदेश अध्यक्ष वशिष्ठ नारायण सिंह भी बैठे हुये हैं और पूरा हॉल जदयू सलाहकारों से भरा हुआ है। इसी दौरान बूंदाबादीं भी शुरु हो गई। कैंपस में इधर-उधर घूम रहे लोग बारिश से बचने के लिए ओट की तलाश में इधर-उधर भागने लगे। मैं हॉल के सामने बने छज्जे के नीचे हो लिया। इस दौरान कई बार हॉल का दरवाजा खुला और मुझे उसके अंदर झांकने का मौका भी मिला, वशिष्ठ नारायण सिंह स्टेज पर बैठे हुये थे और उनके सामने की सारी कुर्सियां जदयू सलाहकारों से भरी हुई थी। जैसे-जैसे बारिश की रफ्तार बढ़ती गई वैसे छज्जे के नीचे लोगों की आमद भी बढ़ती गई, लेकिन उमस में कोई कमी नहीं आई थी। पिछले एक सप्ताह से पटना उमस और बारिश की चपेट में है। यहां का मौसम पूरी तरह से कॉस्टल एरिया जैसा हो गया है, तेज धूप, गर्मी और बारिश।

तकरीबन पौन घंटे बाद बारिश के थमने और हवाओं के चलने पर कुछ ठंडेपन का अहसास हुआ और साथ ही यह सुनने को भी मिला कि नीतीश कुमार बस आने ही वाले हैं। बारिश की वजह से इधर-उधर छिटक गये कार्यकर्ता एक-एक कर जुटने लगे। वहां पर मौजूद एक पुलिस अधिकारी कार्यकर्ताओं का हांक-हांककर बुला रहा था। फोटोग्राफरों की टोली ने भी अपनी जगह संभाल ली थी। कुछ देर बाद ही नीतीश कुमार बीआर 01 नंबर की एंबेस्डर कार पर सवार होकर पहुंचे। ‘नीतीश कुमार जिंदाबाद’ के नारों की गूंज तेज हो गई। नीतीश कुमार अपनी कार से उतरकर सीधे हॉल में दाखिल होने के बजाय दूसरी तरफ मुड़ गये। इस बीच हॉल का दरवाजा खुला और हाथ में कैमरा लिये फोटोग्राफरों की एक छोटी सी टोली के साथ मैं भी हॉल के अंदर दाखिल हो गया। थोड़ी देर बाद नीतीश कुमार भी हॉल के अंदर दाखिल हो गये। छोटे से फोटो सेशन से बाद फोटोग्राफरों से बाहर निकलने का अनुरोध किया जाने लगा, मजबूरन मुझे भी बाहर निकलना पड़ा। बाहर बारिश तेज चुकी थी।

बाहर खड़े एक नेता ने मेरी तरफ मुस्करा कर देखते हुये कहा, ‘अपना कैमरा बचाइये, बारिश तेज है।’

‘किस बात को लेकर यह बैठक हो रही है ?,’ मैंने पूछा। नीतीश कुमार की सेक्यूलर छवि बिहार के बाहर काफी मजबूत है। दिल्ली में पोलिटिकल गलियारे की एक मंडली यहां तक मानती है कि यदि भविष्य में राष्ट्रीय स्तर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ कोई मजबूत सेक्यूलर खेमा बनता है तो निशिच्त तौर पर नीतीश कुमार उस खेमे में अहम भूमिका में होंगे। लेकिन इसके पहले नीतीश कुमार को 2015 में बिहार में अपनी साख को बचाना ही होगा। नीतीश कुमार की इस छवि की हकीकत को समझने की ललक से मैं इस बैठक के निहितार्थ थोड़ा और टटोलने लगा। मेरे मन में एक साथ कई सवाल दौड़ रहे थे, मसलन, क्या नीतीश कुमार के नेतृत्व में जदयू कार्यकर्ता बिहार में ‘लव जेहाद’ जैसे किसी धार्मिक उन्माद फैलाने वाली प्रोपगेंडा को मात देने की स्थिति में है ?  क्या तकनीकी क्रांति के तमाम आयामों से खेलते हुये लोगों के बीच गहरी पैठ लगाने की काबिलियत इन सलाहकारों में है ? या फिर ये प्रचार के ‘मोदी मैकेनिज्म’  के सामने लोकसभा चुनाव की तरह धराशायी होते नजर आएंगे ? नीतीश कुमार किस फार्मूले के तहत इन्हें लामबंद करेंगे या फिर इन लोगों की ओर से कलेक्टिव तौर पर कोई ऐसा फार्मूला इजाद किया जाएगा जिससे बिहार के कमान इन्हीं के हाथ में रहे ? क्या इस तरह के किसी फार्मूले की चर्चा इस बैठक में हो रही है ? या फिर पूरी तरह से व्यवहारवादी राजनीति के मापदंड पर हर चीज को कसते हुये छोटे-छोटे रंग-बिरंगे गुटीय हितों को साधते हुये विजयी फार्मूला हासिल करने के लिए सलाहकारों को जुटाया गया है ?  इन प्रश्नों के साथ मैं जूझ ही रहा था कि एक सज्जन ने आकर मुझसे कैंपस के बाहर जाने का अनुरोध किया। मेरे यह पूछने पर कि इस बैठक को लेकर मुझे और जानकारी हासिल करनी है, क्या आपके नेता प्रेस से भी बात करेंगे उन्होंने कहा, कोई प्रेस कांफ्रेस नहीं होगा, ये हमलोगों की अंदरूनी बैठक है और इस बारे में ज्यादा जानकारी देना हमलोग मुनासिब नहीं समझते। मेरे लाख समझाने के बावजूद वे टस से मस नहीं हुये बार-बार मुझसे कैंपस छोड़ने का अनुरोध करते रहे। मेरे लिए सूचनाओं के सारे पट बंद हो चुके थे। देर रात तक वशिष्ठ नारायण सिंह से भी संपर्क साधने की मैंने की पूरी कोशिश की। रात आठ बजे के करीब जब मैं उनके चिड़ियाखाना के पास स्थित आवास पर पहुंचा तो वह दीवाने आम से उठ कर जा चुके थे। काफी तकरीर करने के बाद दीवाने खास से जुड़े एक शख्स ने बताया, जैसा कि वशिष्ठ नारायण सिंह बता रहे थे, यह सलाहकारों के साथ संवाद स्थापित करने की पहली प्रक्रिया थी। इसे आगे भी जारी रखा जाएगा। इसके नतीजे पर अभी कुछ भी बोलना जल्दबाजी है। अभी तो उन्होंने अपनी बात रखी है। वैसे भी पहले संवाद का कोई निष्कर्ष नहीं निकलता। बिहार की जनता को नीतीश कुमार में यकीन है। उन्होंने बिहार को बेहतर नेतृत्व दिया है और आगे भी देते रहेंगे।

सुबह अखबारों में पढ़ने को मिला, नीतीश कुमार जिंद रवाना चुका है, लोकदल की रैली में भाग लेने। मतलब साफ है नीतीश कुमार देश के सेक्लूयलर खेमे में अपनी जगह को लेकर जबरदस्त मशक्तत कर रहे हैं। लेकिन साथ ही एक बात समझ में नहीं आ रही है, बिहार में सलाहकारों की बैठक के बाद पत्रकारों के साथ संवादहीनता की स्थिति क्यों बनी हुई है, क्या बंद कमरों में पोलिटिकल लड़ाई का कोई बी प्लान तैयार किया जा रहा है , जिससे प्रेस को दूर रखा जा रहा है।  कहा जा रहा है कि राजद अभी भले ही नीतीश के साथ है, लेकिन मौका मिलते ही मिलते ही नीतीश को पटकनी देने से भी बाज नहीं आएगा। ऐसे में सभी समीकरण को जीताऊ पोलिटिकल मैकेनिज्म पर कसना जरूरी है। नीतीश कुमार को आधुनिक बिहार का चाणक्य भी कहा जाने लगा है। चाणक्य कहा करता था, वह योजना ही क्या जिसके पूरा होने से पहले ही उसका भेद खुल जाये।

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