…जब आस्था के नाम पर अदालत को मानने से किया था इंकार

0
38

डॉक्टर सी.पी. राय, वरिष्ठ पत्रकार

1990 -25 सितम्बर को गुजरात के सोमनाथ से लालकृष्ण अडवाणी ने रथयात्रा शुरू कर दिया था । अडवाणी देश के लोकतंत्र की एक राष्ट्रीय पार्टी के दो बड़े नेताओं में से एक और उसके अध्यक्ष थे जिसकी जिम्मेदारी देश के भविष्य के लिए लड़ने और शैडो गवर्नमेंट बना कर वैकल्पिक विकास का एजेंडा शिक्षा स्वास्थ्य कृषि सुरक्षा इत्यादि होना चाहिये था वो इन मुद्दो के लिए नही बल्कि मंदिर बनाने के लिए माहौल बनाने निकला थे। उनको 30 अक्तूबर को अयोध्या पहुंचना था पर 23 अक्तूबर को उनको लालू यादव ने समस्तीपुर में गिरफ्तार कर लिया और फिर उनका रथ वहीं थाने में ही सड़ गया। किसी को उसकी याद नहीं आयी।

काश अडवाणी देश की समस्याओं के लिए रथ लेकर निकले होते, गरीबी और बेरोजगारी के खिलाफ निकले होते, गांव की बदहाली के खिलाफ निकले होते, अशिक्षा और अभाव में मौत के खिलाफ निकले होते तो शायद हम जैसे लोग भी साथ हो लेते !

पर कहानी के विस्तार में नहीं जाकर मुद्दे पर आता हूँ जिसके लिए आज लिख रहा हूँ।

राम लला हम आयेंगे, मंदिर वही बनायेंगे

बच्चा बच्चा राम का जन्मभूमि के काम

इत्यादि नारे लगवाये जा रहे थे

आरएसएस और भाजपा तथा विश्व हिन्दू परिषद ने कारसेवा का ऐलान किया। 21 अक्तूबर से ही देश भर से ये सब संगठन मिल कर लोगों को विभिन्न रास्तों से अयोध्या के 100 किलोमीटर के दायरे में चारो तरफ लाने लगे। और अन्ततः 30 अक्तूबर और फिर 2 नवम्बर को इस तरह कूच किया जैसे किसी दूसरे देश में विजय प्राप्त करने जा रहे हो।

अयोध्या में पूजा और दर्शन होता था उस समय भी पर विवाद अदालत में था। मैं उस वक्त पार्टी का प्रदेश महामंत्री और प्रवक्ता था हम लोगों ने दो प्रस्ताव किया यह कहते हुये कि दर्शन और पूजा सबका अधिकार है पर संविधान और कानून से खिलवाड़ सरकार में बैठा हुआ और उसकी शपथ लिया कोई भी व्यक्ति नहीं करने देगा और हम भी नहीं।

पर हमारे दो प्रस्ताव है–

1.   हम मध्यस्थता करने को तैयार है दोनों पक्ष साथ बैठ जाये और सहमति से तय कर ले क्या होना चाहिये,सरकार उसी को मानेगी

2.  यदि सहमति नहीं बनती है तो फिर एक ही तरीका है की अदालत जो तय करे वो माना जाये ।

कोई तीसरे तरीके को संविधान और कानून से चलने वाले देश में किसी भी हालत में नहीं स्वीकार किया जा सकता है और न किसी हालत में स्वीकार किया जायेगा। तब इन लोगों ने जवाब दिया था जो आज पूरे देश को जानना चाहिये-

कि “यह अदालत और कानून नहीं बल्कि हमारी आस्था का सवाल है और इसे हम खुद हल करेंगे।”

बड़े नेताओ ने आफ द रिकार्ड यह कहा था कि सिर्फ साफ सफाई करेंगे और घोषणा हो चुकी है तो दर्शन कर लौट जायेंगे । लाखों की भीड़ खेतों में होकर अयोध्या पहुंची और रोकने पर पुलिस तथा प्रशासनिक अधिकारियों पर हमलावर हो गई। अधिकारियों ने बहुत समझाने का प्रयास किया की शांति से दर्शन करे और वापस चले जाये पर भीड़ उग्र हो गई जिसके लिए पीछे से सिखा पढा कर लाया गया था। भीड़ गुम्बद पर चढ़ गई और तोड़फोड़ करने लगी। मजबूरन पुलिस को बल प्रयोग करना पड़ा और उसमे 16 लोगों की जाने गई जो बहुत अफसोसजनक है क्योकि वो सब इसी देश के नागरिक थे और अपने परिवारों के प्रिय थे। किसी भी हालत में कभी भी अपने ही नागरिकों पर पुलिस की लाठी और गोली चले यह लोकतंत्र के बिल्कुल खिलाफ है और जिम्मेदार राज्य की अवधारणा के भी खिलाफ है। मरने वाले अधिकतर पिछड़े वर्गो के जवान थे। ये भी सच है की उन मृतकों के परिवारों का इन संगठनों और इनकी सरकारों ने फिर कभी हालचाल भी नहीं पूछा।

आरएसएस के झूठ तंत्र ने फैला दिया कि हजारों जाने चली गई और सरयू का पानी लाल हो गया और एक खून खौला देने वाला वीडियो भी बना दिया इन लोगों ने 24 घंटे में और देश भर मे बांट भी दिया जैसे अन्ना के आन्दोलन में मिनटो में झंडे और मशाले बंट जाती थी। बस आप दोनों को एक साथ रख कर देखते जाइए। मैंने दिल्ली में किसी संघी के घर वो वीडियो देखा,पूरी पिक्चर थी सारे इफेक्ट डाल कर बनायी गई जिसमें लाशे ही लाशे दिखाई गई, नाली में खून बहता दिखाया गया, पहले सोमनाथ से लेकर बाबर तक पता नहीं क्या क्या बताया गया और उसमें एक हेलीकोप्टर उड़ता दिखाया गया था जिसमें बैठे मुलायम सिह यादव को मशीन गन से लोगों पर गोली चलते दिखाया गया था ।

हमने चुनौती दिया की आप मृतकों के नाम बताओ। ये लोग जो भी नाम बताते हम पूरा सिस्टम लगा कर उनको ढूंढ लाते और मीडिया के सामने पेश कर देते। इनकी सारी लिस्ट और बात फर्जी निकलती गई और अंत में वो 16 लोग बचे जो सचमुच मरे थे और उनकी मौत पर हम सबको अफसोस तब भी था और आज भी है। पर यह भी उल्लेखनीय है की कल्याण सिंह की भाजपायी सरकार में जब सरकारी तौर पर फिर लाखों की भीड़ आई और विवादित ढांचा तोड़ गयी तो उस पर चढे तमाम लोग उसी के नीचे दब गये थे पर सत्ता का नशा और इस विश्व विजय के जोश में वो बेचारे समाचार की सुर्खिया नहीं बने।

उसके बाद अयोध्या से ही मार काट लूट शुरू हो गई और यहां तक की खुद भाजपा का अल्पसंख्यक सेल का अध्यक्ष चीखता ही रह गया कि मैं तो आप की पार्टी के इस पद पर हूँ, पर? (इसका ब्योरा उस दिन के हिन्दू के मौके पर मौजूद रिपोर्टर की रिपोर्ट में मिल जायेगा ।

कैसे लोग आये थे ये धार्मिक काम करने इसी से समझ लीजिये की रुचिरा गुप्ता इनकी भीड़ में ही थी तो उसके शरीर से कपडे गायब हो गए और ये देख कर बीबीसी के रिपोर्टर मार्क टूली ने उसे अपना कोट पहनाया और पिटता रहा पर किसी तरह रुचिरा को भीड से निकालने में कामयाब रहा ।

दंगों में 2000 से ज्यादा जाने गई, हजारों करोड़ की संपत्ति नष्ट हुई और उठान लिए हुये विकास का पहिया बैठ गया और सालो पीछे चला गया। दंगो में इन लोगों ने क्या किया था आतंक फैलाने को सिर्फ इस बात से जान लीजिये की एक टेप बनाया था जो किसी छत पर अचानक काफी तेज आवाज में चीखता –बचाओ,भागो ओ ओ ,आ गए हजारों मुसलमान , अरे मार दिया अरे एक और मार दिया भागो। और हम लोग जो आगरा के कालेज कैंपस में रहते थे उसके लोग भी अपने हथियार लेकर निकल आये और छुपने की जगह ढूढ़ने लगे ,मैने कहा की यहा कहा कोई मुस्लमान है आसपास पर कोई सुनने को तैयार नहीं था।  आगरा का लाजपत कुन्ज और ऐसी तमाम कालोनी जो मुस्लिम इलाको से 8 से 10 किलोमीटर दूर है लोग रात रात भर पहरा देने लगे, रास्तों पर बड़े बड़े पत्थर और पुराने टायर रख दिये।

मुसलमान अपने मुह्ल्लो में दुबका था कि निकले नहीं कि पीएसी आयेगी और फिर सिर्फ गोलियों की आवाज होगी ।

दंगों में क्या क्या हुआ और कौन लोग मरे, किनके साथ क्या-क्या हुआ और क्या-क्या कर्म करते हुये महान लोग जय श्रीराम के नारे लगाते थे और राम का नाम कर बडा कर रहे थे और कौन सी संपत्तियाँ नष्ट हुई इत्यादि तमाम आयोग और जांच कमेटी की रिपोर्ट अब सार्वजनिक है और जो सचमुच देश के वफादार और जिम्मेदार लोग है उनको सब पढ़ना चाहिये और सब जानना चाहिये।हर दंगे के बाद भाजपा की सीटे बढती गई।

इसी बीच विश्वनाथ प्रताप सिंह ने अडवाणी के अभियान के मुकाबले मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू कर दिया। उनकी सरकार से भाजपा ने समर्थन वापस ले लिया और चंद्रशेखर प्रधान मंत्री बन गए ।

बीच में ये भी जान लीजिये की विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार को भाजपा का समर्थन था और भाजपा के प्रिय जगमोहन कश्मीर के राज्यपाल थे जब कश्मीरी पंडित कश्मीर छोड कर गए,पर उस वक्त भाजपा ने न उसे मुड़दा बनाया और न कश्मीरी पंडितों के सवाल पर उस सरकार से समर्थन ही वापस लिया।

हां तो चंद्रशेखर के अटल बिहारी वाजपेयी श्रीमती सिंधिया, भैरोंसिंह शेखावत सहित काफी भाजपा नेताओं से अच्छे सम्बंध थे और उनकी सरकार में हम लोगों के युवा राजनीति के मित्र सुबोधकांत सहाय गृह मंत्री थे ।

अंत में चंद्रशेखर ने विवाद का एक सर्वसम्मत हल निकाल ही लिया अपनी दृढता और दूरदर्शिता से जिसपर अंदर सब सहमत थे और वो फौसला करीब ऐसा ही था जो उसके बाद इतनी बर्बादी और दंगो तथा नफरत की खेती के बाद अंतत: अदालत ने भी दिया। फिर याद रखिये की हमने कहा था की या तो बातचीत से हल कर लो या अदालत को करने दो और तब आस्था के नाम पर अदालत को मानने से इंकार कर दिया था इस जमात ने।

और अपनी सरकार बन जाने पर उसी अदालत को माना भी और दिन रात देश से भी कहते रहे की अदालत को सभी माने मिलजुल कर और पूरे देश ने माना मुसलमान ने भी। पूरा देश शान्त रहा पर यदि अदालत का फौसला इसका उल्टा होता तो क्या होता, कल्पना से रूह काँप जाती है। प्रधान-मंत्री चंद्रशेखर के निवास से विश्व हिन्दू परिसद वाले यह कह कर निकले की थोडी देर में आपस मे राय कर के आते है और फिर आये ही नहीं। अब पाठक ध्यान से पढे और समझे इस जमात के इरादे को, आदत को, रणनीति को, इच्छा को, इनके हथकण्डे को, देश के प्रति जिम्मेदारी को, देश के भविष्य को लेकर चिंतन को, चिंता को और इनके देश के लिए सपने, सिद्धांत और संकल्प को।

लखनऊ से दिल्ली तक की सत्ता के करीब रह कर, निस्पक्ष रूप से जागृत रह कर जो देखा, जो जाना, जो समझा सब लिख दिया क्योंकि जो अब 45 साल के है तब स्कूल मे पढ रहे होंगे और 1990 मे पैदा लोग अब 30 साल के हुये होगे । देश की 65% आबादी 35 साल के नीचे की है। इसका मतलब ये है की उनको जो बताया गया होगा शाखा में वो उसी को सच मानते है। इसलिए सभी जागरूक और सच्चे देशभक्तों की जिम्मेदारी है की पूरे देश को सच की तस्वीर दिखाए बड़े पैमाने पर और देश को फासीवाद की तरफ जाने से बचाए।

आज इसलिए मैंने एक पोस्ट मे लिखा था की देश दो पाटो के बीच फंस गया है-एक जो सच है और दूसरा आरएसएस का सच। देखे ईश्वर कैसे बचाता है मेरे देश को। जो सच्चे हिन्दू है और सचमुच में राम-कृष्ण और शिव को मानते है और चाहते है की समाज इन तीनों के नाम पर घृणा और दंगे में न फंसे बल्कि इनके जो गुण और ज्ञान आज को और भविष्य को अच्छा बनाते हो और भारत को तथा भारतवासियों को अच्छा बनाते हो उनका प्रसार हो उनकी भी जिम्मेदारी है की देश और समाज को सही धर्म का ज्ञान कराये, स्वामी विवेकानन्द से लेकर गांधी जी और डॉ. लोहिया तक के धर्म और इन लोगो के बारे मे लिखे का ज्ञान कराने का अभियान चलाये। अदालत का फौसला आया, मन्दिर बनेगा, देश में सब उसके पक्ष में है पर उसे धार्मिक आयोजन ही रखा जाता और उसमें राजनीति नही की जाती तो भारत बनता  लेकिन इन लोगों को भारत बनाना ही कब था या है इन्हें तो बस वोट और सरकार बनाना है सब बेच देने के लिए ।