डिजिटल हथियारों से लड़ा जाएगा बिहार चुनाव

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  • वर्चुअल जलसे की तैयारी में अमित शाह
  • गिरीराज सिंह ताल ठोक रहे हैं नये अवतार में
  • तेजस्वी यादव भी झोंके हुये हैं दम

आलोक नंदन शर्मा

बिहार के लोगों को अब कारोना के साये तले ही चुनाव में झोंकने की तैयारी शुरु हो गयी है। इतना तो तय है कि  इस बार चुनाव पारंपरिक तौर-तरीके से नहीं लड़ा जाएगा।  कारोना ने बहुत कुछ बदल दिया है। डिजिटल हथियारों का इस चुनावी समर में जबरदस्त इस्तेमाल होगा। इसकी बानगी अभी से देखने को मिल रही है। तमाम डिजिटल प्लेटफार्म पर अभी से यहां के सियासी दलों द्वारा अपने नेताओं को आगे करके उनके हक में बयार बनाने का सिलसिला शुरु हो चुका है। राजनेताओं को असहज करने वाली कारोना की खबरों को पीछे धकेल कर अब कौन होगा बिहार का अगला मुख्यमंत्री वाले डिजिटल पोस्टर और बैनर अलग-अलग अंदाज में धड़ाधड़ निकाले जा रहे हैं। नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव के अलावा बिहार की कई नई नवेली पार्टियों के नेताओं के चेहरे भी डिजिटल प्लेफार्म पर खूब चमकने लगे हैं। लेकिन कारोना माहामारी से पस्त और त्रस्त बिहार के लोगों के चेहरों को टटोलने की कोशिश कोई नहीं कर रहा है। बिहारियों की आंखो में कारोना माहामारी के खौफ से ज्यादा इस महामारी को लेकर केंद्र और राज्य सरकार द्वारा फैलायी  गई अव्यवस्था से गुस्सा दिख रहा है। यह गुस्सा कैसे फूटेगा अभी कह पाना मुश्किल है।

खबर आ रही है कि कारोना माहमारी के दौरान लगातार लापता रहने और विभिन्न सूबों से बड़ी संख्या में कामगार बिहारी मजदूरों के बेतरतीब पलायन और मौत पर चुपी साधने वाले गृहमंत्री अमित शाह अब बिहारियों के बीच डिजिटल प्लेटफार्म पर मजमा लगाने की तैयारी रहे हैं। 9 जून को वर्चूअल रैली करेंगे। पिछली बार नीतीश और लालू की जोड़ी से करारी मात खाने के बाद अपनी खास राजनीतिक कौशल का इस्तेमाल करते हुये उन्होंने नीतीश कुमार को लालू यादव से जुदा कराके तलाकशुदा सुशील कुमार मोदी के साथ बिना हलाला किये उनकी सगाई कराके उन्हें उप मुख्यमंत्री के ओहदे पर बिठाते हुये कई भाजपाई नेताओं को भी मंत्रिमंडल में मलाई खाने का भरपूर मौका मुहैया करा दिया था। जो कारोना संकट में किसी काम के साबित नहीं हुये। उस समय पिता लालू यादव से मिली विशाल सियासी विरासत के बावजूद राजनीति में नौसिखुआ तेजस्वी यादव गला फाड़फाड़कर जदयू और भाजपा के गठबंधन अनैतिक करार देते रहे   और नीतीश कुमार को पलटूराम कहते रहे लेकिन नीतीश कुमार को एक बार भी अपना वह बयान याद नहीं आया जिसमें उन्होंने कहा था “चाहे मिट्टी में मिल जाएंगे लेकिन भाजपा के साथ नहीं जाएंगे।”

यदि सियासी समीकरण यही रहा तो इस बार बिहार विधानसभा चुनाव के पहले से ही अमित शाह बिहार की अपनी पूरी टीम के साथ नीतीश कुमार के पीछे खड़े होकर “जोर लगाकर हइसा” करते हुये नजर आएंगे। अब यह दूसरी बात है कि बात-बात पर मोदी विरोधियों को पाकिस्तान भेजने वाले भाजपा के बड़बोले नेता गिरीराज सिंह को बिहार का मुख्यमंत्री बनाने के लिए डिजिटल प्लेटफार्म पर भाजपा के अंदर ही एक जातीय राजनीतिक गिरोह द्वारा जबरदस्त मुहिम चलाई जा रही है। इस जातीय राजनीतिक गिरोह द्वारा हर रोज डिजिटल प्लेटफार्म पर 10-15 पोस्टर जारी किये जाते हैं, जिनमें गिरीराज सिंह अपने भीमकाय शरीर के साथ सीना फुलाये हुये पूरी रवानगी के साथ चंदन टिका लगाये हुये दिखते हैं। इन डिजिटल पोस्टरों में अलग-अलग अंदाज में आक्रामक तरीके से लोगों को यही समझाया जाता है कि इस वक्त भाजपा में एक मात्र गिरीराज सिंह ही बिहार के मुख्यमंत्री बनने के काबिल हैं और उनके मुख्यमंत्री बनते ही बिहार एक बार फिर प्राचीन मगध साम्राज्य के गौरव को प्राप्त हो जाएगा और बिहार की तमाम समस्याएं चुटकी बजाते हुये हल हो जाएगी। यह और बात है कि देशभर में कारोना से जूझ रहे बिहारी मजदूरों के साथ वह कहीं भी खड़े नजर नहीं आये।

गिरीराज सिंह के ये डिजिटल पोस्टर नीतीश कुमार और उनके खेमे को तो असहज करता ही है साथ ही सुशील कुमार मोदी के माथे पर भी बल पैदा करता है। सब को पता है कि गिरीराज सिंह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ-साथ अमित शाह के भी दुलरुआ हैं। इनके इशारों के बिना अंदर खाते इस तरह की किसी भी मुहिम को वह हवा नहीं दे सकते हैं। साथ ही यह भी सच है कि सुशील कुमार मोदी के साथ उनकी पुरानी अदावत है। ऐसे में भाजपा के अंदर पेचिदगियों में इजाफा मुमकिन है। भाजपा में एक खेमा है जो नीतीश कुमार को पीछे धकेल कर अगली सीट पर आने के लिए उतावला है। गिरीराज सिंह इस खेमे का स्वाभाविक नेता होने के लिए एड़ीचोटी का जोर लगाते हुये दिख रहे हैं। कम से कम डिजिटल प्लेटफार्म को उनको लेकर जो मुहिम चलाया जा रहा है उससे तो यही आभास होता है। नीतीश कुमार की कियादत में चुनाव लड़ने को लेकर एनडीए के अंदर फिलहाल अभी तो कोई विवाद नहीं है लेकिन इस बात से भी इन्कार नहीं किया जा सकता कि गिरीराज सिंह के जरिये प्रेशर पोलिटिक्स का खेल खेला जा रहा है। और यह खेल डिजिटल प्लेटफार्म पर कुछ ज्यादा ही मुखर है।

जनता की नब्ज को पकड़कर लंबे समय तक बिहार सियासत की धड़कन तय करने वाले और तकनीकी विकास पर मुंह बिचकाने वाले लालू यादव के छोटे बेटे तेजस्वी यादव बदलते दौर में डिजिटल प्लेटफार्म की ताकत को अच्छी तरह से समझ रहे हैं। देर से ही सही लेकिन राजद के लिए एक अलग से डिजिटल मीडिया सेल स्थापित करके खुद को बिहार के भावी मुख्यमंत्री के तौर पर पेश करने की मुहिम को परवान चढ़ाने पूरी ताकत लगा दी है। हर उन्हें मुख्यमंत्री के तौर पर पेश करनी वाली 10-12 पोस्टें की जा रही हैं और उन पोस्टों पर उनके समर्थन नारे लगने के साथ-साथ उनकी शैक्षणिक योग्यता पर सवाल उठाने वाली टिप्पणियां भी खूब की जा रही है। यहां तक कि उनके पिता लालू यादव के खिलाफ भी प्रतिकूल टिप्णियां की जा रही हैं। तेजस्वी यादव को चारा चोर और पब्लिक फंड का लूटेरा भी कहा जा रहा है।

नई नवेली राजनीतिक पार्टियां भी इस बार के चुनाव में  डिजिटल प्लेटफार्म के अहमियत को समझते हुये इस पर सान चढ़ाने में लगी हुई है। भारतीय सबलोग पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. अरुण कुमार जिन्होंने कभी नीतीश कुमार के निर्माण में अहम किरादर अदा किया भी डिजिटल प्लेटफार्म पर अपनी और अपनी पार्टी की मजबूत मौजूदगी दर्ज कराने की कामयाब कोशिश कर रहे हैं। पार्टी और पार्टी के नेता की हर गतिविधि को डिजिटल प्लेटफार्म पर शेयर किया जा रहा है ओर लोग आकर्षित भी हो रहे हैं और उन पर तीखी प्रतिक्रियाएं भी कर रहे हैं। वैसे रालोसपा और हम जैसी पार्टियां डिजिटल प्लेटफार्म पर थोड़ी पिछड़ी हुई दिख रही है, जबकि पार्टी से इतर हटकर पप्पू यादव की मौजूदगी थोड़ी दमदार है।

डिजिटल प्लेटफार्म की यह खासियत है कि इस पर मल्टीवे कम्युनिकेशन होता है। एक बात निकलती तो दूर तक जाती है। और प्रतिक्रियाओं की बाढ़ सी आ जाती है। ऐसा नहीं है कि डिजिटल प्लेटफार्म पर कोई नेता भाषण देकर निकल जाये। देखते ही देखते लोग मधुमख्खी की तरह उस पर टूट पड़ते हैं और तरह तरह से डंक मारने लगते हैं। डिजिटल प्लेटफार्म की यह सबसे बड़ी खासियत है। यहां शहद भी है और डंक भी। कारोना युग में डिजिटल प्लेटफार्म की उपयोगिता को देखते हुये तमाम सियासी दलों को नेताओं को मधु के साथ डंक के लिए जेहनीतौर पर तैयार रहना होगा।