तितली या कठपुतली मत बनिये – महादेवी वर्मा

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सुनील दत्ता//

हमारे यहा लड़की जन्म लेते ही पराई हो जाती है। सब कहते हैं, अरे! लड़की हो गई, जो सुनता है, आह कर के रह जाता है और जब वह बड़ी होती है तो सब कहते है, पराए घर का धन है,  याने वह धन है, सम्पत्ति है, जीवित व्यक्ति नही है, सामान है, और अगर किसी ने दहेज कम दिया तो उसे जला देते है, सो हमारे यहा लड़की को बहुत सहना होता है।
खंडवा ( मध्य प्रदेश ) के शासकीय कन्या महाविद्यालय में दिया गया प्रखर चिंतक — कवियत्री महादेवी वर्मा का यह व्याख्यान आप को साझा कर रहा हूँ।

मुझे पता नही था कि आप के बीच आना है दिन भर घूमती रही अन्त में यहीं आई हूँ तो बहुत थकी हूँ। आप से बहुत बात करना चाहती थी लेकिन बंधुओं ने मौका नही दिया। अब आप से इतना कहना चाहती हूँ कि भारत का भविष्य आपके हाथ में है, लडकों के हाथ में नहीं है हमारे यहा लड़की जन्म लेते ही पराई हो जाती है। सब कहते हैं,  अरे! लड़की हो गई, जो सुनता है, आह कर के रह जाता है और जब वह बड़ी होती है तो सब कहते हैं पराए घर का धन है, याने वह धन है, सम्पत्ति है , जीवित व्यक्ति नही है, सामान है, और अगर किसी ने दहेज कम दिया तो उसे जला देते है, सो हमारे यहां लड़की को बहुत सहना होता है।
लेकिन हमारी संस्कृति ने हमें बहुत शक्ति दी है। देखिये, ब्रह्मा के चार मुँह हैं,  सो कोई नहीं जानता उनको क्यों बनाया क्योंकि चार मुँह से हो सकता है, चार तरह की बात करते रहे होंगे। बनाया तो सरस्वती को है। सरस्वती एक बात करती है। हमारे ज्ञान की अधिष्ठात्री है। हाथ में वीणा लिए हुए है, पुस्तक लिए हुए है, अक्ष माला लिए हुए है। समय, हर क्षण का प्रतीक है वो। और समय के लिए सृजन का प्रतीक है।
आप देखिये, ऐश्वर्य मिलता है घर मिलता है, लेकिन अगर घर में पत्नी न हो,  बहन न हो, माँ न हो तो कैसा घर है। वास्तव में वह लक्ष्मी है। शिव उस के मस्तक पर है। श्वेताबरा है, सब को मंगलमय रखती है और जब आसुरी शक्तिया ध्वस्त करने लगती है तो वह आसुरी शक्तियों पर आरूढ़ होती है, तब वह सिंहवाहिनी होती है, दुर्गा होती है। बड़ी शक्ति है उसमें।  प्रारम्भ में संस्कृति ने हमें महत्व दिया,  लेकिन समाज ने धीरे — धीरे हमारा महत्व छीन लिया, कब छीन लिया ? जब आप कमजोर बनी,  सिर्फ लक्ष्मी रह गई, सम्पत्ति बन गई।
आप जो नए युग की नारी हैं, आप को बड़ा काम करना है। अपनी शक्ति को पहचानना है। सम्पत्ति होना अस्वीकार कर दो। सामान हैं क्या आप? सब आप को सामान मानते है और अगर पति न रहे, तो जैसे खिलौना फेंक देता है बच्चा, ऐसे स्त्री को फेंक देते है। कानून ने हमें बहुत अधिकार दिए है। लेकिन कानून पात्रता नहीं देगा। पात्रता आप से आएगी। हमारा युग बड़ा कठिन था। हमें लड़ाई लड़नी पड़ी। पुलिस की लाठियों के सामने, गोलियों के सामने खड़े रहें और फिर पढ़ने के लिए चारों ओर भटकते रहे। आप को सब सुविधाए हैं। इस लिए आप देश को बनाइए जैसा आप बनाएंगी,  वैसा देश बनेगा। तो आप इस भारत की धरती की तरह, जैसे सीता को भूमिजा कहते है, वैसे भूमिजा हैं आप आप सीता बनिये। मान लिया कि राम रक्षा करने गये थे। वन में चले गये थे कि रक्षा करंगे, लेकिन रावण के यहां रक्षा कौन करता था सीता की ? वहां तो राम लक्ष्मण नहीं थे। उन्हें पता नही था। ढूढ़ रहे थे। सीता ने अपने वर्चस्व से, अपनी शक्ति से अपनी रक्षा की। रावण उसको अपने प्रासाद में भवन में नहीं ले जा सका। अशोक वाटिका में रखा।
और उसकी शक्ति देखिये। अग्नि परीक्षा दी उसने। और उसका तेजस्वी रूप देखिये। जब राम ने कहा, लव — कुश बड़े हो और राम, लव — कुश से हार गये तो उन्होंने सीता से कहा कि अब अयोध्या की महारानी होइए और अयोध्या चलिए। सीता ने इनकार कर दिया। राम ने कहा प्रजा के सामने सिर्फ परीक्षा दे दीजिये। अस्वीकार कर दिया उसने।
कोई माता अपने पुत्रों के सामने परीक्षा देती है ? अपने सतीत्व के लिए ? नही देती है। तो सीता ने अस्वीकार कर दिया और राम ने जब बहुत कहा तो सीता ने धरती में प्रवेश कर लिया।
अब उस की शक्ति देखिये। वो चाहती तो राम के हाथ पाँव जोड़ती, अयोध्या की रानी हो जाती, लेकिन उसने नहीं होना चाहा। ऐसा पति जो किसी के कहने से, पति का कर्तव्य भूल जाए, उसके साथ क्यों जायेगी ? नही गई वह। सो मैं बार — बार कहती हूँ। सीता बनो, तुम्हारा उत्तर होना चाहिए, हम तो सीता है ही हम तो धरती की पुत्री हैं। स्वंय शक्ति रखती है। वह आप का घर बनाती है। आपको सुख देती है। आपको मंगलमय बनाती है। कितने रूपों में पुरुष को सहयोग देती है। वह पति को कितना आत्मत्याग सिखाती है। पुत्र को कितना तेजस्वी बनाती है। वह तो मानव जीवन की निर्मात्री है। जीवन की श्रुति है वह। बड़े से बड़ा व्यक्ति भी उसकी गोद में आएगा, चाहे राम हो कृष्ण हो बुद्ध हो,  किसी माता की गोद में किसी माता के आंचल की छाया में बड़ा होगा। उसकी आँखों के सपने अपने आप को देखेगा। वह उसे अंगुली पकड़ कर चलना सिखाएगी। आप अपने को छोटा मत समझिये।
आपके भी कुछ कर्तव्य हैं। हमने देखा, आधुनिका बनने के लिए   लडकिया घंटे भर घुंघराले बाल बनाएंगी। आँखों में काजल लगाएंगी, होठ रंगेगी, चेहरा रंगेगी। एक जगह हम गये तो रंगे चेहरे वाली लड़किया सामने बैठी थीं। हमने कहा, पहले मुँह धोकर आओ, हम तो पहचान नहीं पाती आप को।
आदमी तो आदमी है न। वह आपको कठपुतली बना देता है। आप लड़के को कोई खिलौना दे दीजिये तोडकर देखेगा। लेकिन लड़की घर बसाएगी, गृहस्थी बसाएगी, घरौंदा बनाएगी, उसमें गुड्डे — गुड्डी बैठाएगी। उनका व्याह रचाएगी, यानी यह सब कुछ जानती है। छोटी लड़की भी। और लड़के को देखिये तो उसकी टांग तोड़ देगा, सर फोड़ देगा। पुरुष का स्वभाव ही आक्रामक है। अगर स्त्री उसे संयम नहीं सिखाएगी तो फिर वह संयम से नहीं रहता। हमारे युग के एक बड़े व्यक्ति ने कहा कि राष्ट्र स्वतंत्र नहीं होगा, यदि उसकी नारी जो शक्ति है वो स्वतंत्र नहीं होगी। जितनी कला है वह आप के पास है। जितनी विद्या है, वह आप के पास है। आप तितली या कठपुतली मत बनिये। साक्षात शक्ति स्वरूपा हैं आप। आप शक्ति को पहचानिए और देश को बनाइए। मेरी मंगलकामना आपके साथ है |
– सुनील दत्ता
आभार-लोक गंगा पत्रिका

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सदियों से इंसान बेहतरी की तलाश में आगे बढ़ता जा रहा है, तमाम तंत्रों का निर्माण इस बेहतरी के लिए किया गया है। लेकिन कभी-कभी इंसान के हाथों में केंद्रित तंत्र या तो साध्य बन जाता है या व्यक्तिगत मनोइच्छा की पूर्ति का साधन। आकाशीय लोक और इसके इर्द गिर्द बुनी गई अवधाराणाओं का क्रमश: विकास का उदेश्य इंसान के कारवां को आगे बढ़ाना है। हम ज्ञान और विज्ञान की सभी शाखाओं का इस्तेमाल करते हुये उन कांटों को देखने और चुनने का प्रयास करने जा रहे हैं, जो किसी न किसी रूप में इंसानियत के पग में चुभती रही है...यकीनन कुछ कांटे तो हम निकाल ही लेंगे।

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