दिल्ली के पाकेटमार (कहानी)

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दिल्ली में ब्लू लाइन की चलती बस में अचानक से मैंने अपने इर्दगिर्द धक्का मुक्की महसूस किया, हालांकि लोग बहुत कम थे। यह धक्का मुक्की पूरी तरह से अप्रत्याशित थी। मुझे आभास हुआ कि मेरे साथ कुछ अनहोनी हो रहा है। मेरा ध्यान अपने मोबाइल फोन की तरफ गया जो मेरी कमीज के बायीं जेब में पड़ा था। जेब पर हाथ रखते ही मेरा दिल धक से रह गया, मोबाइल फोन वहां से गायब था।

सफर के दौरान चोर उच्चकों से फोन की हिफाजत के लिए मैं उसे अक्सर एक पतले से बेल्ट के सहारे गले में लटका कर अपनी कमीज के ऊपर वाली जेब में रखता था। बस या ट्रेन में सफर करते या फिर भीड़वाले इलाके से गुजरते हुए हर दो या तीन मिनट पर मैं अपनी दायीं हाथ से बायी तरफ स्थित कमीज के ऊपर वाली जेब को टटोल लिया करता था। अब गले में बेल्ट तो थी लेकिन फोन नहीं। मुझे समझते देर नहीं लगी कि किसी ने मेरे पाकेट पर हाथ साफ कर दिया है।

देश में संचार क्रांति की शुरुआत हुई थी। मोबाइल फोन रखना लग्जरी माना जाता था। इन कमिंग को चार्ज मुक्त किए जाने के बाद ही मैंने बड़ी मुश्किल से एक एक पैसे जोड़कर छह हजार रुपये में एक नया मोबाइल फोन खरीदा था।

पहली बार जब उसकी घंटी बजी थी तब दिल उछल कर हाथ में आ गया था। अदभुत खुशी मिली थी उस वक्त! और अब चलती बस में अचनाक से फोन के नदारद हो जाने के बाद मुझे ऐसा लग रहा था मानो किसी ने सर्दी के दिनों में मेरे पूरे शरीर को बर्फ में घुसेड़ दिया हो। मैं बस में इधर उधर खड़े लोगों के चेहरों को देखकर चिल्लाये जा रहा था,“किसी ने मेरा फोन मार लिया, किसी ने मेरा फोन मार लिया। इस बस में हमारे बीच कोई पाकेटमार है।”

बौखलाहट में कहे जा रहे मेरे शब्दों को सुनकर बस में सवार कुछ यात्री अपनी जेबों को टटोलने लगे, जबकि मेरी निगाहें मेरे आसपास मौजूद चेहरों की पड़ताल करने में लगी हुई थी। अचानक मैंने अपनी नाक में शराब की तेज बदबू को महसूस किया। मेरी निगाह सामने वाले इंसान पर अटक गई। उसके बाल बिखरे हुए थे और चौड़े चेहरे पर उभरी हुई गालों की हड्डियां व धंसी हुई आंखें के नीचे बने काले गहरे धब्बों से साफ पता चल रहा था कि वह नशेबाज है। बिना सोचे समझे मैंने लपक कर दोनों हाथों से उसका गिरेबान पकड़ लिया और जोर से चिल्लाते हुए कहा, “मेरा फोन निकालो, कहां है मेरा फोन ?”

मेरे इस अप्रत्याशित कदम से पहले तो वह बुरी तरह से बौखला गया फिर संभलने की कोशिश करते हुए मेरी गिरफ्त से खुद को छुड़ाने की कोशिश करने लगा। इस बीच बगल में खड़े एक और ठिगने कद के लड़के के मुंह से मुझे शराब की दुर्गन्ध महसूस हुई। उसकी उम्र कम थी और बाल खड़े-खड़े से थे। वह बुरी तरह से घबड़ाया हुआ था।

मैंने लपककर बायें हाथ से उसका भी गिरेबान पकड़ लिया और जोर से चिल्लाते हुए ड्राइवर से बोला, “मैंने दो बदमाशों को पकड़ लिया है। मेरा फोन इन्हीं के पास है। बस अगली पुलिस चेकपोस्ट के पास रोको।”

“बस नहीं रुकेगी, सिर्फ स्टाप पर ही रुकेगी”, अपनी जगह पर बैठे हुए ड्राइवर ने चिल्लाकर कहा।

“यदि बस नहीं रुकेगी तो मैं मान लूंगा कि तुमलोग इन बदमाशों के साथ मिले हुए हो। तुमलोगों के खिलाफ भी कार्रवाई होगी”, दोनों बदमाशों को पकड़े हुए मैं एक बार फिर जोर से चिल्लाया। अचानक फोन गायब हो जाने की वजह से मेरा गुस्सा सातवें आसमान पर था। मेरे चिल्लाने का असर ड्राइवर पर साफतौर पर दिखा। वह खामोश हो गया और कुछ दूर आगे चल कर बस को सड़क के किनारे बने एक पुलिस चेकपोस्ट के पास लगाने लगा। बस की गति जैसे ही कुछ धीमी हुई पीछे वाले दरवाजे से एक लड़का कूदकर तेजी से एक ओर भागा। उसे भागता देखकर बस में बैठे सवारी चिल्लाने लगे, “एक भाग रहा है, एक भाग रहा है।” हालांकि किसी ने भी उसके पीछे कूदने की हिम्मत नहीं की।

जैसे ही बस रूकी चेकपोस्ट पर तैनात दिल्ली पुलिस का एक युवा सिपाही दौड़ते हुए बस के पास आया। उसे देखते हुए मैंने पकड़े हुए दोनों लोगों को खींचते हुए बस से नीचे उतरा और सिपाही से कहा, “इन लोगों ने मेरी मोबाइल मार ली है। एक शायद पीछे वाले दरवाजे से कूद कर भाग है।” गोल चेहरे और बड़ी बड़ी आंखों वाले युवा पुलिसकर्मी को माजरा समझते देर नहीं लगी। उसके कंधे पर लटक रहे बैच पर लिखा था, महेंद्र प्रताप।

“इनको अंदर बंद करते हैं”, महेंद्र प्रताप ने चेकपोस्ट के करीब सड़क के किनारे बने हुए एक छोटे से कमरे की तरफ इशारा करते हुए कहा और दोनों बदमाशों को बालों से खींचते हुए उस ओर बढ़ चला। अपने गंतव्य पर पहुंचने में हो रही देरी को देखते हुए बस के तमाम सवारी भी बस को खोलने के लिए जोर जोर से चिल्ला रहे थे। मौका पाकर ड्राइवर ने बस को गति दे दी।

महेंद्र प्रताप ने दोनों बदमाशों को कमरे के एक कोने में बैठा दिया। मैं उनको वहीं छोड़कर उस ओर बढ़ चला जिधर बस के पिछले दरवाजे से कूदकर इन बदमाशों का एक साथी भागा था। मुख्य सड़क से नीचे उतर कर कुछ दूर जंगल की झाड़ियों में चलने के बाद मुझे जमीन पर  वह तस्वीर मिली जिसे मैंने मोबाइल फोन के कवर के नीचे लगा रखा था। उसे उठाकर मैं उलट पलट कर देखने लगा। इतना स्पष्ट हो गया था कि जिन दो लोगों को मैंने पकड़ रखा था वो निश्चितौर पर पाकेटमार ही थे और उनका जो साथी बच निकला था मेरा मोबाइल  फोन उसी के पास था। झाड़ियों में इधर उधर देखने के बाद मैं वापस चेकपोस्ट के पास लौट आया।

मैंने महेंद्र प्रताप को बताया कि मैं एक पत्रकार हूं और रोज इसी वक्त लक्ष्मीनगर से नोएडा अपने आफिस जाने के लिए बस पकड़ता हूं। आज इन बदमाशों ने मेरा मोबाइल फोन उड़ा लिया। पत्रकार सुनकर महेंद्र प्रताप हर तरह से मेरी मदद करने के लिए तैयार हो गया। मैं उनके तीसरे साथी के बारे में पूछते हुए कमरे में बंद दोनों बदमाशों को तब तक पिटता रहा जब तक मेरे दोनों हाथ बुरी तरह से लाल नहीं हो गए। वे दोनों बस एक ही रट लगाए हुए थे, “हमे कुछ नहीं पता, हमारा कोई साथी नहीं है।”मेरे कहने पर महेंद्र प्रताप ने भी उनकी जमकर धुनाई की, लेकिन वे टस से मस नहीं हुए। उन दोनों को पिटते पिटते थक चुके महेंद्र प्रताप ने कहा, “इनको मयूर विहार थाना ले चलते हैं। वहां की खातिरदारी से ये सबकुछ उगलेंगे। वैसे भी इन्हें थाना तो ले ही जाना पड़ेगा।”

कुछ देर बाद दोनों बदमाशों को आटो रिक्शा में बिठाकर हमलोग मयूर विहार थाना पहुंच गए। मयूर विहार थाने में उनकी धुनाई का सिलसिला फिर चल पड़ा। एक के बाद एक सिपाही आते थे और पहले उसकी पिटाई करते थे फिर पूछताछ करते थे। लेकिन उनलोगों ने भी पूरी तरह से लबकशी कर रखी थी। मुझे भी अब इस बात का अहसास हो गया था कि इन्हें चाहे कितना भी मारो मुंह खोलने वाले नहीं है। और यदि एक बार ये अपने साथी का नाम ले लेंगे तो फिर इनका यहां से बच निकलना मुश्किल होगा। इनको पिटते-पिटवाते मैं भी थक चुका था। मौके मिलते ही उन्हें समझाने वाले अंदाज में बोला, “अगर मेरा मोबाइल नहीं मिलता है तो तुम लोगों का जेल जाना तय है। तुम किसी भी तरीके से मेरा मोबाइल दिलवा दो मैं तुमलोगों पर केस नहीं करूंगा। जेल जाने से बच जाओगे।” बार बार मैं यही दोहराता रहा और महेंद्र प्रताप से भी उन्हें यही कहने को कहता रहा। इसका सुखद परिणाम जल्द ही सामने आया। उन्होंने इस शर्त पर कि उन्हें जेल नहीं भेजा जाएगा अपने साथी का नाम बताते हुए कहा, “हमलोग ठेलुए है, मशीन इरफान है।”

“ठेलुए और मशीन का क्या मतलब है?”, मैंने पूछा।

“हमलोग भीड़भाड़ वाले जगहों पर शिकार के साथ धक्का मुक्की करते हैं, और मशीन जेब काटता है। एक शिकार पर हमलोगों को पांच पांच सौ रुपये मिलते हैं जबकि बाकी का सारा पैसा मशीन ले जाता है। साथ में हमलोगों को मुफ्त में दारू पीने को मिल जाता है। सुबह काम पर निकलने के पहले पीते हैं और काम हो जाने के बाद। इरफान को सभी पुलिस वाले जानते हैं, उस तक खबर पहुंचा दें, वह मोबाइल लौटा देगा।”

“जिस इलाके में इरफान रहता है वह त्रिलोकपुरी का सबसे खतरनाक इलाका है, अकेले उधर जाना उचित नहीं होगा”,  एक पुलिसवाले ने थोड़ा सोचते हुए कहा।

“यदि आपलोग नहीं जाओगे तो मैं जाऊंगा और कोशिश करूंगा किसी भी तरह इरफान से मिलूं। उसके दो लोग यहां बंद है। उम्मीद है अपनी ओर से अब वह कोई गलती नहीं करेगा,” मैंने दृढ़ता के साथ कहा।

“आप चिंता न करें। यह इलाका मेरा है। आप यहीं रहें, मैं इरफान से बात करने की कोशिश करता हूं”, महेंद्र प्रताप ने कहा। “लेकिन वहां जाने के लिए यह जरूरी है कि मैं ड्रेस बदल लूं। वैसे भी अब मेरी ड्यूटी खत्म हो चुकी है। आप मेरा इंतजार करें । मैं थोड़ी देर में आता हूं।” यह कहते हुए वह एक ओर चल दिया।

तकरीबन पंद्रह मिनट बाद वह सादे लिबास में लौटा। उसके पास एक मोटरसाइकिल भी थी। अब वह लग ही नहीं रहा था कि कोई पुलिसवाला है। जींस और टीर्शट में वह काफी आकर्षक लग रहा था। उसने मुझे मोटरसाइकिल की पिछली सीट पर बैठने का इशारा किया और तेजी से वहां से निकल पड़ा। कुछ देर बाद उसकी मोटरसाइकिल त्रिलोकपुरी की पेचीदी गलियों में चक्कर काटते हुए एक उबड़ खाबड़ मकान के सामने रुकी। मकान के सामने चार-पांच बच्चे खेल रहे थे। वहीं पर एक महिला भी एक छोटे से बच्चे को गोद में लेकर बैठी हुई थी।

“इरफान कहां है ?”, मोटरसाइकिल को महिला के पास रोकते हुए महेंद्र प्रताप ने पूछा।

“सुबह से घर नहीं लौटा है। हूं तो उसकी मां लेकिन मुझे खुद पता नहीं कि वह क्या करता फिरता है। अब क्या किया उसने ? ”, महिला ने महेंद्र प्रताप से पूछा।

“चलती बस में एक पत्रकार का मोबाइल काटा है। उसके दो लोग पकड़े जा चुके हैं। बचेगा नहीं। उसे बोलो कि मोबाइल लौटा दे। केस नहीं होगा। और अन्य दो लोगों को भी छोड़ देंगे”, सिपाही ने कहा।

“यदि आएगा तो मैं बोल दूंगी। कुछ पैसे दो, खाने के लिए कुछ नहीं है”, महिला ने कहा।

सिपाही ने जेब से बीस-बीस के दो नोट निकाले और उसके हाथ पर रख दिए, फिर मेरी ओर देखते हुए बोला, “देना पड़ता है।”

उसने मोटरसाइकिल आगे बढ़ा दी। और कुछ दूर चलने के बाद एक पतली सी गली में घुसा दी। गली में सामने आते हुए लड़के को उसने इशारे से अपने पास बुलाया और धीरे से पूछा, “इरफान को पिछली बार कब देखा था।”

“आधे घंटे पहले, अपने घर में ही था। टेंशन में था। उसके दो लोग पकड़े गए हैं, आपने ही पकड़ा है क्या?”

“पत्रकार का मोबाइल काटा है। उसकी मां को समझाकर आया हूं वापस कर दे। तू भी कोशिश कर उससे बात करने की। यदि वह खुद सामने आना नहीं चाहता तो किसी के जरिये मोबाइल भिजवा दे।”

“कोशिश करता हूं”, यह कहते हुए वह लड़का एक ओर चल दिया।

महेंद्र प्रताप की मोटरसाइकल एक चाय के दुकान पर आकर रुकी। कुछ लोग पहले से ही वहां चाय की चुस्कियां ले रहे थे। हमलोग भी चाय पीने लगे। इस दौरान वहां मौजूद लोगों से महेंद्र प्रताप बातें करता रहा। कुछ देर बाद वह लड़का उस चाय की दुकान में आया और महेंद्र प्रताप के कान में कुछ बोला। महेंद्र प्रताप मेरी तरफ देखकर मुस्कराया और बाहर निकलने का इशारा किया। एक बार फिर उसकी मोटरसाइकिल त्रिलोकपुरी की पेचीदी गलियों में भड़भड़ाते हुए बढ़ रही थी।

“मोबाइल मिल जाएगा। इरफान ने उसे एक दुकान पर रख दिया है”,मेरी ओर देखे बिना ही मोटरसाइकिल चलाते हुए महेंद्र प्रताप ने कहा।

तकरीबन आधे घंटे बाद एक दुकान से मोबाइल हासिल करके मैं महेंद्र प्रताप के मोटरसाइकिल की पिछली सीट पर सवार होकर मयूर विहार थाने के प्रांगण में दाखिल हुआ। मोबाइल तो सही सलामत था। मैं अपनी मोबाइल को वापस पाकर वाकई में काफी खुश था।

“यदि तुम चाहो तो इन दोनों चोरों के खिलाफ मामला दर्ज करके इन्हें जेल भिजवा सकते हो”,महेंद्र प्रताप ने कहा।

“उसकी जरूरत नहीं है, मेरी मोबाइल मिल गई, मेरे लिए इतना ही काफी है”, मैंने कहा और उस कमरे की तरफ बढ़ चला जहां पर दोनों बदमाश बंद थे।

“मोबाइल तो मुझे मिल चुका है। तुम दोनों के खिलाफ मैं कोई कंप्लेन नहीं कर रहा हूं”, कमरे में दाखिल होते हुए मैंने कहा।

“हमलोगों को यहां से निकाल कर बाहर तक पहुंचा दीजिए। आपके जाने के बाद शायद ये लोग हमें नहीं छोड़े”, चौड़े शक्ल वाले बदमाश ने इल्तिजा की। लगातार हो रही बुरी तरह से पिटाई की वजह से उसका चेहरा सूजा हुआ था। मैंने पुलिसवाले से अनुरोध किया कि दोनों बदमाशों को मेरे साथ ही बाहर जाने दिया जाये।

कुछ देर बाद उन दोनों बदमाशों के साथ मैं मयूर विहार थाने के बाहर सड़क पर पैदल चल रहा था।

“यदि तुमलोग पहले सबकुछ बता देते तो इतनी पिटाई तो नहीं होती !”, चौड़े शक्ल वाले बदमाश की तरफ देखते हुए मैंने कहा।

“आज का धंधा बेकार चला गया। लेकिन दिन अच्छा था कि जेल नहीं गए”, उसने कहा।

“सिगरेट पिओगे?” मैंने पूछा।

“इतनी पिटाई के बाद सिगरेट की तलब तो हो ही रही है।”

कुछ देर बाद हम तीनों एक सिगरेट की दुकान पर खड़ा होकर माचिस की एक ही तिल्ली से बारी बारी से सिगरेट सुलगा रहे थे। वे दोनों इस बात का गम मना रहे थे कि अब शाम को उन्हें पीने के लिए शराब नहीं मिलेगी और और मैं पाकेटमारी की आज की पूरी घटना पर अपने अखबार के लिए एक बेहतरीन हेडलाइन सोच रहा था।

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