दि लास्ट ब्लो (उपन्यास, चैप्टर 5)

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आलोक नंदन शर्मा

5.

एक साथ तीन बैच पाकर प्रो. एस पी यादव गदगद था। अपने एक घंटे के क्लास में वह दस मिनट पढ़ाता था और पचास मिनट दुनियाभर की कहानियां सुनाता था, जिसे पढ़ने वाले लड़के बकवास करार देते थे। उसकी कहानियों के नायक मेहनतकश लोग होते थे। दुनिया के मजदूरों एक हो का नारा बुलंद करते हुये वह ब्राह्मणवाद और जाति व्यवस्था को जमीनदोज करने की बात करता था। अक्सर अगड़ी जाति के छात्रों से उसकी जोरदार झड़प हो जाती थी। नौबत मारपीट तक की आ जाती थी। वह धर्म और पूजा पाठ की खिल्ली उड़ाता था। जब कोई लड़का उसका विरोध करता था तो वह बेखौफ होकर कहता था, “यहां के लोगो के दिमागों को जंजीरों में कस दिया गया है और उनको इसकी ऐसी आदत पड़ चुकी है कि यदि कोई इसे तोड़ने की कोशिश करता है तो वे पागल कुत्तों की तरह उसे काट खाने को दौड़ते हैं। लेकिन इनकी पैनी दातों और गुर्राहट से मुझे जरा भी डरा नहीं लगता। इनके दिमाग पर कसे हुये जंजीरों को तोड़ने का काम मैंने खुद अपने लिए आगे बढ़ कर चुना है। यह काम मैं तब तक करता रहूंगा जबतक कि मेरा दम नहीं निकल जाये। अगर इन्हीं के धार्मिक फसलफे पर यकीन करे तो मैं मर ही नहीं सकता। ये लोग मेरे शरीर को मार सकते हैं मुझे नहीं है। न तो मेरा जन्म हुआ है और न ही मैं मर सकता हूं। आत्मा अमर है।”

कभी वह कहता, “शिक्षा का असल मकसद व्यक्ति को एक बेहतर इंसान बनाना है। उनके अंदर यह काबिलियत पैदा करना है कि वह स्वतंत्र हो कर सोच सके। धर्म ईंट तैयार करने वाला एक सांचा है। जन्म के पहले से ही व्यक्ति को उस सांचे विशेष में डाल दिया जाता है और फिर वह उसी सांचे के अनुरूप ढलता चला जाता है। हकीकत तो यह है कि खुद व्यक्ति को नहीं पता कि उसके अंदर कितनी संभावनाएं छुपी हुई है। असल चीज है व्यक्ति के सोच को मजबूत पंखों से लैस करना। एक बार उनके पंख मजबूत हो जाएंगे तो उड़ान की दिशा वे खुद तय कर लेंगे।”

प्रो. एस पी यादव की बातें दिवाकर को अपने सिर पर हथौड़े की तरह चलती हुई महसूस होती थी, जबकि बाकी के लड़कों को वह एक पागल और सरफिरा प्रोफेसर नजर आता था जो अपनी जिंदगी में पूरी तरह से नाकामयाब हो चुका था।

वह प्रो. एस पी यादव की बातों पर घंटों विचार करता था और हर तरह से उसकी बातों को तौलने की कोशिश करता था। शुरुआती दौर में उसके दिमाग में चलने वाली फिल्मी किरदारों की जगह अब प्रो. एस. पी. यादव की बातों ने ली थी। दिवाकर जेहनी तौर पर बदलने लगा था और इसका असर उसके व्यवहार पर भी पड़ने लगे था। मंदिरों और देवी-देवताओं से वह दूर होता चला गया। कभी मंदिरों में जिस बजरंग बली के सामने दोनों हाथ जोड़कर वह बुद्धि और बल के लिए प्रार्थना करता था वही बजरंग बली अब उसे महज पत्थर की बेजान मूर्ति नजर आने लगे थे। कभी वह जिस दुर्गा पूजा में एक पंडाल से दूसरे पंडाल में घूम-घूमकर मां दुर्गा की प्रतिमा के सामने सिर झुकाते हुये खुशी महसूस करता था उसे अब मां दुर्गा की पंडाल की तरफ भीड़ की शक्ल में जाते हुये लोग बेवकूफ नजर आते थे। इस पूजा अर्चना के औचित्य पर वह नये सिरे से विचार करने लगा था। उसके उम्र के लड़के अपने नये-नये शौक और लड़कियों के पीछे भाग रहे थे और वह धर्म के साथ साथ देवी-देवताओं की हकीकत को समझने के लिए जूझ रहा था। वह इन सब चीजों के बारे में जितना सोचता उसकी बेचैनी उतनी बढ़ती जा रही थी।

एक दिन प्रो. एस. पी. यादव ने रूसो के बारे में बताता हुये कहा, “रुसो जमीन पर व्यक्ति विशेष के अधिकार का सख्त विरोधी था। अपनी किताब सोशल कांट्रेक्ट में उसने लिखा है कि उस व्यक्ति ने गलती की कि जिसने पहली बार जमीन के एक टुकड़े को घेर कर यह घोषणा की कि यह मेरा है। बाकी लोगों ने उसकी गलती को सुधारने के बजाये उसका अनुसरण करते हुये अपने-अपने लिए जमीन की घेराबंदी शुरु कर दी। एक ने दासता की ओर कदम बढ़ाया तो सब उसके पीछे हो लिये। जबकि होना यह चाहिए था कि पहले व्यक्ति द्वारा की गई जमीन की घेराबंदी को तोड़कर यह घोषणा किया जाना चाहिए था कि प्रकृति के संसाधन पर किसी एक व्यक्ति का हक नहीं हो सकता। यह सबका है और सबके लिए रहेगा।”

नई आंखों से दिवाकर को अब अपने घर के लोगों का चेहरा भी बदला बदला सा नजर आने लगा था। अपने खेतों में मजदूरों से काम करा के पैदावार को अपने कब्जे में लेकर उसका मनचाहा इस्तेमाल करने वाले उसके अपने रिश्तेदार जल्लाद नजर आने लगे थे। कुछ रिश्तेदारों ने खेतिहर मजदूरों को उनकी मुसीबत की घड़ी में सूद पर पैसे दे रखे थे। इसके एवज में जब और जैसे चाहे उनसे बेगार कराते थे। अब दिवाकर को इसमें शोषन की बू आती थी।

इसी बात को लेकर एक दिन उसकी भिखारी चाचा से जोरदार बहस हो गई थी। झक सफेद धोती और कुर्ता में  भिखारी चाचा अक्सर उसके घर पर उसके पिता से  मिलने आते थे। उस दिन दिवाकर कमरे में अपने बेड पर लेटकर ‘लेनिन इन लंदन’ पढ़ रहा था, जिसमें लेनिन और क्रूप्सकाया के लंदन प्रवास के दौरान वहां रह रहे रूसी क्रांतिकारियों के साथ उनके संबंधों के बारे में बहुत सारी  रोचक जानकारियां दी गई थी। पुस्तक के ऊपर छपी लेनिन की तस्वीर पर नजर पड़ते ही भिखारी चाचा ने उसे घूर कर देखा और अपने बड़ी-बड़ी सफेद हो चुकी नुकीली मुछों पर हाथ फेरकर उसे और नुकीला करते हुये पूछा, “तू माले हो गेले हे का ? ”

“ माले क्या ?”, यह जानते हुये कि भिखारी चाचा मार्क्सवादी-लेनिनवादी पार्टी के बारे में पूछ रहे थे दिवाकर ने सवाल के बदले सवाल किया।

“ओही, पार्टी पऊआ वाला सब। लाल झंडा लहरावित चली थे सार सब। कहअ हे कि जमीन ओकर जे जोतअ हे”, भिखारी चाचा का लहजा थोड़ा तल्ख हो गया था। “का लिखल हई इ किताब में?  तनी हमहू त जानी। ”

“इसमें रूसी क्रांतिकारी लेनिन और उनकी पत्नी क्रूप्सकाया के लंदन प्रवास के दिनों के बारे में बताया गया है। 1905 की रूसी क्रांति के पहले दोनों लंदन में निर्वासित जिंदगी जी रहे थे। इसमें 1903-4 में वह किन हालात में लंदन में रह रहे थे और कैसे रुस के निर्वासित क्रांतिकारियों को संगठित करते हुये आगे की तैयारी कर रहे थे उसी के बारे में लिखा गया है,” दिवाकर ने संयत स्वार में जवाब दिया।

“ई वही नेता हे न जो अदमीजन के मलिकार के जमीन कब्जा करे ला सिखावे हे ?”, भिखारी चाचा ने फिर सवाल किया। उनके लहजे में थोड़ी और तल्खी आ गयी थी।

“जमीन कब्जा करने की नहीं, जमीन का सही बंटवारा करने की बात करता है लेनिन। जमींदारों के शोषण के खिलाफ बात करता है, मजदूरों को उनका हक देने की बात करता है, उन्हें और उनके बच्चों को शिक्षित करने की बात करता है, महिलाओं को उनका हक देने की बात करते हैं और बच्चों को मजदूरी से दूर रखने की बात करते हैं। चाचा, इसमें बुराई क्या है?”, दिवाकर भी थोड़े सख्त लहजे में बोल उठा। अचानक से उसके अंदर क्रांतिकारिता हिलोरे मारने लगी। अमूमन वह भिखारी चाचा के साथ नरमी और इज्जत से पेश आता था। यही वजह थी कि भिखारी चाचा उसे काफी पसंद भी करते थे। भिखारी चाचा उसके बदले हुये लहजे से परेशान नजर आने लगे। अपने को संयत करने की कोशिश करते हुये उन्होंने कहा, “बाबू! ई ठीक बात न हे। तू सही रस्ता पर न चलित ह।”

“सही रास्ता क्या है, आप जरा मुझे समझाएंगे ? जन मजदूरों से अपने खेतों में काम कराते रहे और उन्हें उनका वाजिब मेहनताना न दे, यह है सही रास्ता ? उनके बच्चों के विकास के सारे रास्ते बंद कर दे ताकि छुटपन से वे आपकी बेगारी में लगे रहे, यह है सही रास्ता ? उनकी औरतों का इस्तेमाल अपनी हवस के लिए करते जाये और उनके पेट में अपने बच्चे ठूंसते जाये, यह है सही रास्ता?”, दिवाकर एक सांस में बोलता चला गया। उसकी बातों को सुनकर भिखारी चाचा दंग थे। उन्हें सपने में भी उम्मीद नहीं थी कि कभी उसकी गोद में खेलने वाला दिवाकर एक दिन उसे इस तरह से जवाब देगा। दिवाकर की बातों को सुनकर वह अंदर से बुझ चुके थे। उनका चेहरा सपाट हो चुका था और गुस्सा, शर्मिंदगी व बेबसी की वजह से उनके होठ फड़फड़ा रहे थे। इतना विवश उन्होंने अपने आप को उन साम्यवादी नेताओं के सामने भी कभी महसूस नहीं किया था जो उन्हें तरह तरह से धमकाने की कोशिश करते थे और जिनके  खिलाफ वह अपनी पूरी ताकत से लोहा रहे थे। उनकी एक दहाड़ ही उन साम्यवादी नेताओं को खामोश करने के लिए काफी होता था। यहां तो हमला घर के अंदर से हुआ था। और इस हमले का उनके पास कोई जवाब नहीं था। उनकी स्थिति उस हारे हुये जुआरी की तरह थी जो अचानक से अपना सबसे कीमती चीज हार जाता है।

अपने आप को पूरी तरह से संयत करने की कोशिश करते हुये उन्होंने कहा, “बेटा, तोरा से हम उम्र में बहुत बड़ ही अउर तोरा से जादे दुनिया देखले ही। एकठो बात कही थी, गांठ बांध ल, बाभन के दुश्मन सब जात हे। सब मौका के ताक में रह हे, अइसन कोई काम न करी ह कि बाभन समाज के दिक्कत होये।” उनको इस हालत में देखकर दिवाकर को एक साथ दुख और खुशी दोनों का अहसास हो रहा था। दुखी वह इसलिए हो रहा था कि वह भिखारी चाचा की इज्जत करता था इसलिए सपने में भी उन्हें किसी तरह की तकलीफ पहुंचाने की बात नहीं सोच सकता था और खुशी इस बात की थी कि अपने धारदार तर्कों से उसने एक बूढ़े सामंत को जो अपने जन मजदूर का शोषण करने वाली सोच रखता हो को चुप कर दिया था।

कुछ देर बाद जब पिता जी आये तो भिखारी चाचा उनसे कह रहे थे, “ तू हू गांव में माले ला दू-दू मुठ्ठी अनाज जौर करअ हले। चुनाव में राड़ रेआन सब के वोट दिलवावे लाव हले। संउसे गांव के तू अपने खिलाफ कर ले ले हल। बड़ी दिक्कत से तो तोर नौकरी लगल हल। ऊ समय भी हम तोरा साथ देली हल। काहे कि हम न चाहअ ही कि बाभन के कुछ बुरा हो। नौकरी में जाये के बाद तोरा में ऊंच नीच के समझ तो आ गेल। लेकिन तोर बेटा गलत रास्ता पकड़ी थे। ऐकरा के रोक। ई अपने जात के दुश्मन होई थे। माले के नेता लेनिन के किताब पढ़ी थे। ”

………जारी

 

 

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