बिहार चुनाव को लेकर क्यों गुमराह हो रहे हैं अरविंद केजरीवाल ?

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क्या सड़कों पर संघर्ष  करके दिल्ली में लगातार तीन बार सरकार बनाने वाली आम आदमी पार्टी आम आदमी से कटती जा रही है ? क्या सत्ता में आने के बाद संजय सिंह जैसे नेता जो आम आम आदमी पार्टी के संगठन प्रभारी भी हैं पारंपरिक राजनीतिज्ञों के रंगढंग में ढलकर अपने समर्पित  कार्यकर्ताओं की उपेक्षा करने लगे हैं? क्या कभी अपनी तल्ख बोली से कांग्रेस और बीजेपी के कद्दावर नेताओं की नींद उड़ा देने वाले पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल भी  बिहार के चुनाव में दो-दो हाथ करने का जज्बा रखने वाले आप के बिहारी नेताओं को दूसरों के चश्में से देख रहे हैं ? या फिर बिहार चुनाव को लेकर आम आदमी पार्टी का शीर्ष नेतृत्व फिक्सड हो गया है? ये सारे सवाल इसलिए उठ रहे हैं कि पिछले चार दिन से आम आदमी पार्टी के दिल्ली दफ्तर में पार्टी की टिकट पर चुनाव लड़ने की इच्छा रखने रखने वाले तकरीबन सौ से भी ज्यादा बिहारी नेता धरना पर बैठे हुये हैं और इस मुद्दे पर बात करने के लिए संगठन का कोई भी नेता सामने नहीं आ रहा है।

अरविंद केजरीवाल की यह सोच थी कि बिहार में चुनाव लड़ने के लिए अभी आम आदमी पार्टी तैयार नहीं है। कई मौकों पर उन्होंने इस तरह की बातें कही भी थी। लेकिन संगठन प्रभारी के तौर पर सांसद संजय सिंह ने अरविंद केजरीवाल की सोच से इतर जाकर पार्टी के बिहारी नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच बार बार यह कहा है कि पार्टी बिहार में चुनाव लड़ेगी और पूरी मजबूती से लड़ेगी। इसका असर यह हुआ कि बिहार में सक्रिय आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ता और नेता और सक्रिय हो गये। संजय सिंह द्वारा उन्हें यह यकीन दिलाया गया था कि पार्टी 100 सीटों पर चुनाव लड़ सकती है। यदि 100 पर नहीं लड़ेगी तो 50 पर तो लड़ेगी ही। इसके बाद से कार्यकर्ताओं में और उत्साह आ गया था। सुशील कुमार सिंह को खासतौर से बिहार का प्रदेश अध्यक्ष बनाकर दिल्ली से बिहार भेजा गया था। बिहार में संगठन को खड़ा करने के लिए उन्होंने दिनरात एक कर दिया।

अब पटना की सभी चार सीटों समेत बिहार में तकरीबन 50 सीटों पर चुनाव लड़ने इरादे से लबरेज आम आदमी पार्टी के तमाम संभावित उम्मीदारों के मनसूबे पर पानी फिर गया है। आम आदमी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने बिहार विधानसभा चुनाव 2020 में उतरने से इंकार कर दिया है और इसके साथ ही बिहार से आप के तमाम संभावित उम्मीदावार पार्टी के शीर्ष नेतृत्व व दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पर बिहार में चुनाव लड़ने के लिए दबाव बनाने वास्ते दिल्ली में आम आदमी पार्टी के दफ्तर में पिछले तीन दिन से धरने पर बैठे हुये हैं। जिस तरह से आम आदमी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व द्वारा उनकी उपेक्षा की जा रही है उससे नाराज होकर कुछ लोगों ने तो अनशन करने का भी निर्णय ले लिया है।

पटना की बांकीपुर विधानसभा सीट पर आम आदमी पार्टी से शुरुआती दिनों से जुड़े डॉ. पंकज कुमार ने तो पूरी तैयारी कर ली थी। बांकीपुर विधानसभा सीट से चुनाव लड़ने के लिए वह पिछले दो साल से दिल्ली छोड़कर पटना में लोगों के बीच लगातार सक्रिय थे। इस आश्वासन के बावजूद कि बांकीपुर से उन्हें ही आम आदमी पार्टी का टिकट दिया जाएगा लोगों के साथ संपर्क स्थापित करने के साथ-साथ वह बड़ी मात्रा में चुनाव सामग्री का भी आर्डर दे चुके थे। बांकीपुर के कई मुहल्लों में तो उन्होंने अपने पोस्टर भी चिपकवा दिये थे। चुनाव नजदीक आने के साथ ही वह अपनी टीम को और मजबूत करने के लिए दिनरात एक किये हुये थे। अब आप के बिहार में चुनाव न लड़ने से उन्हें अपना सारा मेहनत बेकार जाता दिख रहा है।

इसी तरह पटना के कुम्हरार विधानसभा क्षेत्र से आम आदमी पार्टी की समर्पित कार्यकर्ता उमा दफ्तुआर भी अपने क्षेत्र में लगातार सक्रिय थी। अपनी सक्रियता की वजह से वह अपने क्षेत्र में वह अपने क्षेत्र में एक सुलझी हुई कर्मठ नेता के तौर पर तेजी से उभर रही थी। वह इस क्षेत्र से बेहतर फाइट देने के मूड में थी। लेकिन उन्हें भी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के इस निर्णय से निराश हाथ लगी है। इस वक्त वह भी दिल्ली में आम आदमी पार्टी के दफ्तर में बिहार में चुनाव लड़ने की मंशा रखने वाले आप के नेताओं और कार्यकर्ताओं के साथ धरने पर बैठी हैं। राजेश कुमार ने दीघा विधानसभा सीट से लड़ने की पूरी तैयारी कर ली थी। अब अचानक से सबके इरादों पर भी ब्रेक लगता दिख रहा है।

जानकारों का कहना है कि जब से सुशील कुमार सिंह ने बिहार में आप के प्रदेश अध्यक्ष का नेतृत्व संभाला है तभी से पार्टी के अंदर उनके खिलाफ साजिशे हो रही हैं। वह अरविंद केजरीवाल के करीबी माने जाते हैं और दिल्ली में आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता थे। अरविंद केजरीवाल ने खासतौर से बिहार भेजा था ताकि बिहार में वह संगठन को मजबूत करके चुनावी मैदान में पूरे दमखम के साथ उतरे। उनकी सक्रियता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि कारोना काल के दौरान वह लगातार सड़क मार्ग से बिहार के विभिन्न जिलों का दौरा करते रहे और लोगों को संगठन से जोड़ते रहे। उनकी यही सक्रियता पार्टी के अंदर सक्रिय एक गुट को रास नहीं आयी। चुंकि आम आदमी पार्टी के संगठन की जिम्मेदारी सांसद संजय सिंह के ऊपर है। इसलिए इस गुट द्वारा संजय सिंह को लगातार यह फीडबैक दिया गया कि पार्टी अभी बिहार में चुनाव लड़ने की स्थिति में नहीं है। कुछ महीने पहले जब संजय सिंह की मुलाकात बिहार दौरा के दौरान आम आदमी पार्टी के बिहार के नेताओं से हुई थी तो उन्होंने कहा था कि इस बार बिहार चुनाव में पार्टी अच्छी खासी संख्या में उम्मीदवार खड़ा करेगी। हालांकि उसके पहले दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल कह चुके थे कि उनकी पार्टी बिहार में चुनाव नहीं लड़ेगी। लेकिन संजय सिंह के बयान के बाद बिहार के नेताओं को लगा था कि पार्टी बिहार चुनाव में जरूर उतरेगी। अब दिल्ली के आप दफ्तर में बैठे हुये आप के बिहारी नेताओं को संजय सिंह मिलने तक भी समय नहीं दे रहे हैं। इतना ही नहीं बिहार में पार्टी की वास्तविक स्थिति को लेकर अरविंद केजरीवाल को भी गुमराह किया जा रहा है।

दिल्ली में धरना पर बैठे हुये बिहार से जुड़े पार्टी के नेताओं को इस बात का दुख है कि अब तक इस विषय में बात करने के लिए पार्टी की ओर से उनके पास कोई नहीं पहुंचा है। यदि यही स्थिति रही तो पार्टी का बिहार में उठ पाना संभव नहीं है।

वैसे आम आदमी पार्टी द्वारा बिहार में चुनाव नहीं लड़ने का इरादा व्यक्त करने से इस अफवाह को भी बल मिल रहा है कि अंतर खाते नीतीश कुमार और अरविंद केजरीवाल में सेटिंग हो गयी है। दोनों पुराने मित्र हैं। यदि आप बिहार में चुनाव लड़ती है तो इसका सीधा नुकसान नीतीश कुमार और बीजेपी को ही होगा। बहरहाल सचाई चाहे जो हो, जिस तरह से पार्टी दिल्ली में बैठे हुये आप के बिहारी नेताओं को छोड़ दिया है उससे उनका मनोबाल काफी टूटा हुआ है। संजय सिंह ने तो धरन पर बैठे बिहार के कार्यकर्ताओं से बात कर रहे हैं और न ही अपनी ओर से कोई कोई संदेश दे रहे हैं। कहा तो यहां तक जा रहा है कि वह अरविंद केजरीवाल को भी गुमराह कर रहे हैं। अरविंद केजरीवाल ने धरना पर बैठे लोगों के प्रतिनिधिमंडल से मिलने का समय दे दिया था लेकिन बाद में उन्होंने मिलने से इंकार कर दिया। उनका यह रवैया कहीं न कहीं उन्हें पार्टी के समर्पित नेताओं से दूर कर रहा है और शायद संजय सिंह की मंशा भी यही है। इस मामले संजय सिंह का पक्ष जानने के लिए उनसे फोन पर संपर्क करने की भी कोशिश की गयी, लेकिन कॉल उठाना मुनासिब नहीं समझा।

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