मिलते है मुश्किल से कहीं चार काँधे भी (कविता)

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शहर में मिलते है मुश्किल से कही चार काँधे भी उठाने के लिए
गाँव में गाँव का गाँव आत़ा है -साथ में श्मशान को जाने लिए
गाँव लौटा ना दुलारा माँ का करके के तालिब मुकमिल अपनी
खेत सब रख दिए गिरवी अपनी हमने ने जिसको पढ़ाने भेजा
ईट-पत्थर की इमारत का क्या कुछ ही दिन में है खड़ी हो जाती
उम्र लग जाती है लेकिन यारो घर को घर जैसा बनाने के लिए
शहर में अम्न बहाली के लिए आज टीवी पे है की जिसने अपील
कल उसी ने तो इशारा था किया आग बस्ती में लगाने के लिए
देखना वो भी ना लूट जाए कही चोर जो छोड़ गये है बाकी
ऐसे सदा सोच के जाना तू जरा रपट थाने में लिखाने के लिए
……………………………………………………………..कबीर

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सदियों से इंसान बेहतरी की तलाश में आगे बढ़ता जा रहा है, तमाम तंत्रों का निर्माण इस बेहतरी के लिए किया गया है। लेकिन कभी-कभी इंसान के हाथों में केंद्रित तंत्र या तो साध्य बन जाता है या व्यक्तिगत मनोइच्छा की पूर्ति का साधन। आकाशीय लोक और इसके इर्द गिर्द बुनी गई अवधाराणाओं का क्रमश: विकास का उदेश्य इंसान के कारवां को आगे बढ़ाना है। हम ज्ञान और विज्ञान की सभी शाखाओं का इस्तेमाल करते हुये उन कांटों को देखने और चुनने का प्रयास करने जा रहे हैं, जो किसी न किसी रूप में इंसानियत के पग में चुभती रही है...यकीनन कुछ कांटे तो हम निकाल ही लेंगे।

1 COMMENT

  1. ईट-पत्थर की इमारत का क्या कुछ ही दिन में है खड़ी हो जाती
    उम्र लग जाती है लेकिन यारो घर को घर जैसा बनाने के लिए…………बहत ही उम्दा ख़याल है सुनील भाई …..:)

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