ये प्यार तेरा मुझको पागल कर देगा(कविता)

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अरविंन्द सिंह मोनू’,

हर लम्हा गुजरता है अरसा बनबनकर

हर दिन गुजरता है साल बबनकर

इंतजार में जीना कितना मुश्किल होता है

आँखों की गुस्ताखी भुगतना दिल को होता है

इंतज़ार तेरा मुझको पागल कर देगा

दि से निकले जज्बात, जबतक देर हो जाती है

जुबा कह दे अपनी बात तबतक दूर चली जाती है

इज़हार मोहब्बत का एक गंभीर बिषय है

ये बात पक्की है नहीं कोई संसय है

इज़हार तेरा मुझको पागल कर देगा

सब रिश्ते टूटे है बस तेरी चाहत में

सब अपने छूटे है बस तेरी मोहब्बत में

इन्कार मै तेरा सह नहीं पाउँगा

होकर जुदा तुमसे मै रह नहीं पाउँगा

इन्कार तेरा मुझको पागल कर देगा

सांसो में तेरी सांसे बस ऐसे घुल जाये

बांहों में हो बांहे रांते ऐसे निकल जाये

प्यार जो तेरा मुझपर इतना ज्यादा है

आँखों का तेरा मुझपर कितना भरोसा है

ये प्यार तेरा मुझको पागल कर देगा

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सदियों से इंसान बेहतरी की तलाश में आगे बढ़ता जा रहा है, तमाम तंत्रों का निर्माण इस बेहतरी के लिए किया गया है। लेकिन कभी-कभी इंसान के हाथों में केंद्रित तंत्र या तो साध्य बन जाता है या व्यक्तिगत मनोइच्छा की पूर्ति का साधन। आकाशीय लोक और इसके इर्द गिर्द बुनी गई अवधाराणाओं का क्रमश: विकास का उदेश्य इंसान के कारवां को आगे बढ़ाना है। हम ज्ञान और विज्ञान की सभी शाखाओं का इस्तेमाल करते हुये उन कांटों को देखने और चुनने का प्रयास करने जा रहे हैं, जो किसी न किसी रूप में इंसानियत के पग में चुभती रही है...यकीनन कुछ कांटे तो हम निकाल ही लेंगे।

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