सरकार की कमियों-कमजोरियों से जनता का ध्यान बॅंटाने में फिलवक्त सफल हैं नीतीश

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डा. अनिल सुलभ

 बिहार के मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार, नित नयी नयी धोषणाओं, नयी योजनाओं की चर्चाओं तथा सूचना माध्यमों का इस्तेमाल कर, गावों में अपनी मजबूरी से जार-जार हो रहे लोगों से पटे राज्य और सरकार की कमजोरियों से जनता का ध्यान हटाने में फिलवक्त बहुत सफल दिखते हैं। इस सोची समझी योजना में, बिहार को ‘विशेष राज्य का दर्जा मिले’, का शिगुफा भी शामिल है। क्योंकि वे जानते हैं कि अंदर से चाहे जैसा भी हो, बाहर लोक-रंजक छवि दिखनी चाहिये। कूटनीति की इस कसौटी पर भी नीतीश खरे दिखते हैं।

       नीतीश जी इस बात से पूरी तरह वाकिफ हैं, कि प्रदेश की आंतरिक स्थिति अच्छी नहीं है। बिजली, पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य, उधोग, कृषि आदि अति प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में विगत दो दशकों में स्थितियां लगातार बिगड़ती रही है। श्री लालू प्रसाद एवं श्रीमती राबड़ी देवी की सरकार का कार्यकाल प्रदेश को रसातल में ले जाने का विपद-काल तो था हीं, पिछले 5 सालों में भी, कुछ दिखावटी रंग-रोगन के, राज्य को विकास की पटरी पर लाने के लिये जरूरी कोई भी आधारभूत संरचना विकसित नहीं हो पायी। ऐसे में नीतीश जी की यह राजनैतिक विवशता है कि वे एन-केन-प्रकारेण अपनी कमजोरियों की तरफ से जनता का ध्यान बंटाने के लिये प्रचार माध्यमों का सहारा लेकर प्रशंसा और स्तुति-गान का कार्य करायें, नित नयी लोक-लुभावन घोषणाएं करें तथा हर असफलता के पीछे केन्द्र के ‘असहयोग’ की बात कर केन्द्रीय सरकार की लानत-मलानत करें और उसमें जनता को भी भागीदार बनाये।

      दरअसल नीतीश जी स्वयं को छोड़कर किसी भी राजनेता या राजनैतिक कार्यकर्ता को इमानदार नहीं मानते। शासन में इनका हस्तक्षेप नहीं हो, इसलिये उन्होंने प्रदेश के सभी उच्चाधिकारियों को अपना कार्य ‘अपने ढंग से’ करने की पूरी छूट दे रखी है। नतीजे में लाल फिताशाही अपने चरम पर है। पदाधिकारीगण कार्यों को पूरी तरह अपने हिशाब से नाप-तौल करने के बाद जो मन बनाते हैं, वही काम प्रदेश में होता है। राजनीति वालों की हैसियत ऐसी है कि, कोई जरूरी और सही काम भी यदि नहीं हो रहा है, तो वे पदाधिकारियों से पूछ नहीं सकते। प्रशासनिक स्वेच्छाचारिता, ‘प्रसिडेंट रूल’ की याद दिलाती है। नीतीश जी को कौन बताये कि महोदय! जनता का काम हो न हो, उनसे इन पदाधिकारियों को क्या फर्क पड़ता है? कोई सरकार लोकप्रिय हो या अलोकप्रिय हो जाये, उससे उनका क्या मतलब?

       किन्तु राजनैतिक व्यक्तियों को तो फर्क पड़ता है। काम नहीं होने की स्थिति में जनता तो अपने प्रतिनिधियों को हीं घेरती है। बडे़ अफसरों से तो जनता को मिलने का अवसर भी कभी नही मिलता। भेंट भी उन अधिकारियों की इच्छा और कृपा से हीं संभव है। आज की स्थिति यह है कि आमजन की कौन कहे सत्तारूढ़ दल के विघायक भी अपनी इच्छा से डिप्यूटी कलक्टर स्तर के अधिकारी से भी नहीं मिल सकते। जमालपुर के जदयू विधायक श्री शैलेश कुमार इसके उदाहरण है, जिन्हें एक अधिकारी का जलवा देखने का खास अनुभव हुआ था। ‘माननीय विधायक’ को, विना अनुमति के कक्ष में प्रवेश कर जाने से नाराज अधिकारी ने, बाहर का रास्ता दिखा दिया और मिलने से साफ मना कर दिया। पदाधिकारी का निर्देश था कि समय लेकर आयें।

       इससे यह साफ है कि प्रदेश में पदाधिकारियों के अहं की स्थिति और राजनीतिवालों की हैसियत क्या है! मुमकिन है कि नीतीश जी प्रशासनिक कार्य में राजनैतिक हस्तक्षेप को उचित नहीं मानते हों। यह ठीक भी है। किन्तु स्थिति निरंकूशता की बन आये तो क्या वहां भी जनप्रतिनिधि मुकदर्शक और असहाय नजर आयेंगे?

  हालात यहां तक पहुंच गये हैं कि आज कोई राजनैतिक कार्यकर्ता तो क्या विधायक और मंत्री भी ब्लाक और थानों तक में कुछ नहीं बोल सकते। यदि एक सिपाही किसी निरपराध युवक को भी पकड़ कर थाने ले आये, तो भी वे थानेदार से यह नहीं कह सकते कि लड़का निरपराध है, भला है, उसे छोड़ दीजिये। वहां होगा वही जो पुलिसकर्मी चाहेंगे। यह दूसरी बात है कि वर्तमान स्थिति उन थोड़े से कुछ अच्छे और इमानदार अधिकारियों के लिये आदर्श स्थिति है, जो वास्तव में निष्ठा पूर्वक जनहित में कार्य कर रहे हैं। लेकिन ऐसे अधिकारियों की संख्या कितनी होगी यह कल्पना करने की बात है।

  विकास योजनाओं में हरतरफ मनमानी चल रही है। भ्रष्टाचार अपनी पूर्ववर्ती सभी सीमाएं तोड़ रही है। वह सभी गलत कार्य हो रहे हैं, जो पूर्ववती सरकार में हो रहे थे। फर्क इतना है कि उस दौरान कुछ राजनैतिक कार्यकर्ता और नेता भी लाभान्वित होते थे। अब इसका प्रतिशत न्यून हो गया है। लाभान्वित होने वालों की फेहरिस्त छोटी किन्तु आकार बड़ा हो गया है। परिणाम जनता में त्राहिमाम था त्राहिमाम है। यह अलग बात है कि वे लोग जिनका सरकार और सरकारी अमलों से सीधा साबका नहीं पड़ता, प्रचार माध्यमों के स्तुतिज्ञान से प्रभावित होकर, नीतीश जी के प्रति श्रद्धावान दिखते हैं। उन्हें क्या पता कि अंदर हीं अंदर शहर में हो क्या रहा है? वे तो अखबारों में छपी खबरों, शहरों में बन रहे पार्कों और कुछ महत्वपूर्ण सड़कों पर कोलतार की चमक को हीं विकास का पैमाना मानते हैं।

      नीतीश जी के भ्रष्टाचार मुक्त सुशासन के बीच, प्राथमिक शिक्षकों की नियुक्ति में हुई धांधली और हुये व्यापक भ्रष्टाचार को कोई क्यों नहीं रोक पाया? इसका उत्तर कोई नहीं दे पा रहा है। ऐसे-ऐसे शिक्षक बहाल हुये, जिन्हें ककहरे से भेंट भी है या नहीं, बताना मुशिकल है। वे कक्षा में अंग्रेजी के दिन और महीनों के नाम तक बोर्ड पर नही लिख सकते । एक इलेक्ट्रोनिक मिडिया ने एसे अनेक प्रमाण को प्रसारित कर, इन नियुक्तियों में हुई अभूतपूर्व भ्रष्टाचार का पर्दाफाश किया, जिसे लाखों दर्शकों ने अपनी आंखो से देखा । क्या नीतीश जी को इस बात की खबर नहीं थी? जो नीतीश अपने छोटे छोटे राजनैतिक विरोधियों की भी  गतिविधियों की खबर लेते रहते है, उन्हें पूरे प्रदेश भर में हो रहे इस संगठित भ्रष्टाचार की भनक नहीं लगी, यह कैसे माना जा सकता है? क्या इसे प्रदेश की प्राथमिक शिक्षा पर गंभीर कुठाराधात नहीं कहा जायेगा? जिस प्रदेश की प्राथमिक शिक्षा हीं ध्वस्त हो जायेगी उसकी उच्च और उच्चतर शिक्षा का क्या भविष्य होगा? क्या जनता नीतीश जी को इस ऐतिहासिक अपराध  के लिये माफ कर सकेगी?

       कानून और व्यवस्था की स्थिति निरंतर बिगड़ती जा रही है। गंभीर अपराधों की संख्या में भी लगातार वृद्धि हो रही है। अपहरण, बलात्कार, हत्या की घटनाओं में भी इजाफा हुआ है। एक दम से स्वतंत्र पुलिस तंत्र को अब क्या कहना है? किस बात का रोना है?

       नीतीश जी बराबर यह कहते रहे हैं कि केन्द्र सहयोग नहीं कर रहा है। राज्य का मिलने वाला हक नहीं मिल रहा । जब कांग्रेस ने इस आरोप का उत्तर दिया और बताया कि बिहार को मिलने वाला सभी हक मिल रहा है और यह पहले के मुकाबले अधिक है, तो नीतीश जी ने यह कहना शुरू किया कि भारत सरकार जो दे रही है, तो क्या कोई अहसान कर रही है? यह तो बिहार का हक है!

       यह तो अच्छी बात हुई, एक बार आप कहे कि हक मिल नही रहा, दूसरी बार आप यह कहें कि हक हीं तो मिला है, कोई अहसान तो नहीं। एक बात तो तय हुई कि जो आप यह कह रहे थे कि आपको हक नहीं मिल रहा, वह गलत सिद्ध हुआ। दरअसल केन्द्र-राज्य के बीच संबंधों के संवैधानिक दृष्टिकोण से जो राज्य की हिस्सेदारी बनती है वह मुख्यतः केन्द्रीय करों के अंतरण की राशि के रूप में है। इनके अतिरिक्त जो प्रदेश का बजट होता है, उसमें योजना और गैर योजना मद में केन्द्र सरकार की ओर से सहायता प्रदान की जाती है, जिसे केन्द्रीय सहायता कहते है। यदि विगत वितीय वर्षो में केन्द्र की ओर से दी गई सहायता राशि का ब्योरा पढ़ा जाये (जिसमें राजग गठबंधन वाली बाजपेयी सरकार भी शामिल है, और जिसमें नीतीश जी भी मंत्री थे) तो स्पष्ट होगा कि पूर्ववर्ती राजग सरकार के मुकाबले वर्तमान डा.मनमोहन सिंह की सरकार ने लगातार अपनी सहायता बढ़ा कर दी है। बिहार का ताजा बजट बढाकर 25 हजार करोड़ से अधिक कर दिया गया, उसे भी केन्द्र ने स्वीकृति प्रदान की। फिर भी नीतीश सरकार को शिकायत है कि केन्द्र सरकार अपेक्षित सहायता नहीं करती । उनको तब यह शकायत नही थी, जब वे केन्द्र में मंत्री थे।

   उपरोक्त हक की बात को छोड़ भी दे, तो इसके अतिरिक्त विगत 5 वर्षों में, विभिन्न लोक कल्याणकारी योजनाओं के माध्यम से, विभिन्न मंत्रालयों के अंतर्गत लगभग 36 शीर्षो में केन्द्र सरकार ने बिहार को 3 लाख 71 हजार 609 करोड़ रूपये की राशि प्रदान की, जो केन्द्रीय करों के अंतरण अैर बजट में केन्द्रीय सहायता की राशि के अतिरिक्त थी। उसका क्या हुआ या उसे क्या कहेंगे नीतीश जी?  इसका भी उत्तर देना शेष है। एक कड़वी सच्चाई यह है कि इस बड़ी राशि का सदुपयोग प्रदेश में हो न सका। लगभग प्रत्येक योजना राशि खुले बंदरवांट के वावजूद भी खर्च नहीं हो पायी। वापस लौटाई गई। खर्च की गई राशि का भी बड़ा हिस्सा भ्रष्टाचार की सुरसा के पेट में समा गया। यह तल्ख हकीकत है कि यदि इस बड़ी राशि का सदुपयोग हुआ होता तो आज बिहार की तस्वीर और अलग हो सकती थी और यह सबकुछ हुआ ‘सुशासन’ के नाम से बहु प्रचारित सरकार में।

       इन और ऐसी तमाम समस्याओं पर आम जनता और खास तौर से प्रबुद्धजनों का ध्यान नहीं जाये, राज्य सरकार ने प्रचार माध्यमों का तथा धन का खुलकर उपयोग (जिसे दुरूपयोग कहना अधिक मुनासिब होगा) किया है। राशि के आबंटन में भी भारी स्वेच्छाचारिता और अदूरदर्शिता का परिचय दिया जा रहा है। इसका एक ताजा उदाहरण उस आर्थिक प्रतिवेदन के खुलासे से प्राप्त हुआ है, जो स्वयं राज्य सरकार द्वारा कराया गया आर्थिक सर्वेक्षण है। ताजा सर्वेक्षण के मुताविक वित्तीय वर्ष 2009-10 में गैर योजना मद, केन्द्र प्रायोजित योजनाएं तथा राज्य योजनाओं के अंतर्गत खर्च की गई कुल राशि लगभग 4 खरब (3 खरब 99 अरब 66 कीरेड़) रू. में से लगभग आधी राशि ( 1 खरब 56 अरब 714 करोड़ रू.) केबल पटना जिले में खर्च कर दी गई। क्या प्रदेश का आधे हिस्से का अधिकारी केबल एक पटना जिला है?

       इस घटना ने फिर एक दूसरा भी प्रश्न खड़ा किया कि लगभग डेढ़ खरब रूपये एक वर्ष में खर्च कर पटना जिलों में क्या उपलब्धि हासिल हुई। क्या यह इतनी छोटी रकम थी, जो केवल पार्को के निर्माण में खर्च हो गई? आखिर कहां-कहां, क्या-क्या हुआ? पटना जिले का स्वरूप कितना बदल गया, जो इतनी बड़ी राशि से हो जाना चाहिये था?

       नीतीश जी चाहे जितना पर्दा डालने का यत्न करें, चाहे संचार माध्यमों में ‘जय बोल-हरि बोल’ का कीर्तन करायें, वह दिन दूर नहीं जब यह पाखण्ड जनता की नजरों में आयेगा। फिर क्या होगा? दुनिया देखेगी। जनता अब जाग रही है। लुभावनी बाते अब उन्हें नहीं बहला सकती । राजनीति के हल्केपन से सरकारों को उपर उठना होगा। राजनीति केबल सत्ता पाने और उसे बचाने के अर्थहीन कसरत में नहीं, जनता के हित में लगाने के संकल्प के साथ करनी होगी।

  (लेखक बिहार प्रदेश कांग्रेस कमिटि के बुद्धिजीवी प्रकोष्ठ के अध्यक्ष हैं)

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सदियों से इंसान बेहतरी की तलाश में आगे बढ़ता जा रहा है, तमाम तंत्रों का निर्माण इस बेहतरी के लिए किया गया है। लेकिन कभी-कभी इंसान के हाथों में केंद्रित तंत्र या तो साध्य बन जाता है या व्यक्तिगत मनोइच्छा की पूर्ति का साधन। आकाशीय लोक और इसके इर्द गिर्द बुनी गई अवधाराणाओं का क्रमश: विकास का उदेश्य इंसान के कारवां को आगे बढ़ाना है। हम ज्ञान और विज्ञान की सभी शाखाओं का इस्तेमाल करते हुये उन कांटों को देखने और चुनने का प्रयास करने जा रहे हैं, जो किसी न किसी रूप में इंसानियत के पग में चुभती रही है...यकीनन कुछ कांटे तो हम निकाल ही लेंगे।

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