सीमापार से नेपाली लड़कियों की तस्करी, खाड़ी देशों में भेजा जा रहा है

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बहुत बड़ी संख्या में नेपाली बालाओं को एक व्यवस्थित नेटवर्क के तहत सीमा पार करा कर खाड़ी के देशों में पहुंचाया जा रहा है, जहां उनकी ऊंची कीमत लगाई जा रही है और इसके साथ ही जारी है यौन शौषण का एक अनवरत सिलसिला। भारत नेपाल सीमा के पास स्थित रक्सौल रेलवे स्टेशन का सीधा कनेक्शन जिस्म के अंतरराष्ट्रीय सौदागरों से है। नेपाल से निकलने के बाद यही वह स्थान है जहां पर नेपाली बालाओं का पहला ठहराव होता है। नेपाल के अलग-अलग गांवों से लड़कियों को खरीदने के बाद यहीं पर एकत्र किया जाता है और फिर उन्हें अगले मुकाम तक पहुंचाने की तैयारी शुरु होती है।

भारत और नेपाल के बीच आवाजाही के लिए पासपोर्ट की आवश्यकता नहीं है। ऐसे में इनके पास से पासपोर्ट का बरामद होना स्पष्ट कर देता है कि इनकी मंशा कुछ और है। बाहर के मुल्कों में भेजने के लिए नेपाली बालाओं का पासपोर्ट थोक में बनाया जा रहा है और इसके पीछे उन्हीं लोगों का हाथ है, जो अंतरराष्ट्रीय मंडी में जिस्म की सप्लाई करने में लगे हैं।            

पिछले छह महीने में करीब तीन सौ नेपाली बालाओं को सीमा पार करने के बाद पकड़ा जा चुका है। पुलिस के हत्थे चढ़ी इन नेपाली बालाओं ने स्वीकार किया है कि उन्हें दिल्ली के रास्ते बाहर के मुल्कों में भेजने की तैयारी थी। कमसीन लड़कियों पर भी है जिस्म के सौदागरों की नजर। जिस्म के बाजार में इनकी ऊंची बोली लगती है। घरेलू काम करते हुये ये अपने मालिकों के घरों में बड़ी होती हैं और एक दिन इन्हें भी धंधे में उतार दिया जाता है। हैवानियत की हद को पार करते हुये जिस्म के मंडी के खिलाड़ी कमसीन लड़कियों को फंसाने पर खासा जोर देते हैं।

 सीमा पार स्थित नेपाल के गांव-गांव में सक्रिय है जिस्म के दलाल। अपने होने का अहसास दिलाकर नेपाली बालाओं को भेज रहे हैं उन वहशियों के पास, जो उन्हें लूटने खसोटने के लिए तैयार बैठे हैं।     गांव के ही कुछ लोग उन्हें बाहर के मुल्कों में भेजने के लिए लंबे समय से सक्रिय हैतथा एक साथ कई गांवों में अपनी पैठ बनाये हुये हैं। इन्हें तलाश होती है ऐसे परिवार की जो गरीबी और भुखमरी से जूझ रहे हैं। भारत की सीमा में पकड़ी गई इन लड़कियों और इनके परिवार वालों को समझाया जाता था कि बाहर के मुल्कों में उनके लिए एक बेहतर जिंदगी इंतजार कर रही है। खाड़ी देशों की कुबेर कथा उन्हें बढ़ चढ़ कर बताई गई। दलालों की टोली अलग-अलग तरीके से उनके और उनके परिवार वालों के सामने एक ही कहानी को बयां कर रहे थे। गरीबी और भूख से जूझ रहे इन लड़कियों के परिवार वालों को उनकी बातों पर यकीन होता गया।

गांवों में नेपाली बालाओं के परिवार वालों को यही बताया जाता है कि भारत के तमाम शहरों में उन्हें आसानी से नौकरी मिल जाएगी। बस एक बार इन लड़कियों को वहां भेजने की जरूरत है। कारोबार को सुचारू रूप से चलाने और नई लड़कियों को इस धंधे में अधिक से अधिक खींचने के लिए यह भ्रम बनाये रखना जरूरी होता है कि इन लड़कियों को नौकरी पर लगाया जा रहा है। इसी क्रम में उन्हें यह भी समझा दिया जाता है कि यदि वे बाहर के मुल्कों में जाएंगी तो उन्हें और अधिक पैसे मिलेंगे। जब एक बार अधिक पैसे पाने का लालच उनके सिर पर सवार हो जाता है तो दलालों का काम आसान हो जाता है। फिर शुरु होती है पासपोर्ट बनवाने की प्रक्रिया।                

एक बार पासपोर्ट बन जाने के बाद शुरु होती है सफर की तैयारी। पहले ये रक्सौल आते हैं और फिर यहां से दिल्ली और मुंबई की ओर रुख कर देते हैं। इन्हीं दो शहरों में उन्हें उनके खरीददारों के सामने परोसा जाता है और फिर मोल-तोल के बाद सौदा तय हो जाता है। इसके बाद शुरु होती है वीजा दिलाने की प्रक्रिया।

बिकने के बाद इनका मुख्य काम होता है अपने आकाओं की कामुक इच्छाओं को तृप्त करना। इसके अतिरिक्त इनसे घरेलू काम भी करवाये जाते हैं। कुल मिलाकर इनकी जिंदगी पूरी तरह से नरकमय हो जाती है। समय निकलने के साथ इनका यौवन ढलता है और ये किसी गंभीर बीमारी की चेपट में आकर धीरे-धीरे मौत की ओर बढ़ती है। इनका हालचाल पूछने वाला भी कोई नहीं होता। इनके घरवालों को भी पता होता है कि वे अब दुबारा लौट कर आने वाली नहीं है।

सीमा पर तैनात दोनों देशों के सुरक्षाकर्मी भी नेपाली बालाओं की तस्करी से अच्छी तरह से परिचित हैं। लेकिन इसकी रोकथाम के लिए उनके पास सटीक योजनाओं का अभाव स्पष्ट रूप से दिखता है।

भारत और नेपाल की दोस्ती काफी पुरानी और मजबूत है। भारत और नेपाल के बीच बेटी और रोटी का संबंध है। दोनों देशों के लोग एक दूसरे की सीमाओं में खुलकर आवागमन करते हैं। सीमा पर तैनात सुरक्षाकर्मी भी इन सांस्कृतिक संबंधों का पूरा ख्याल रखते हैं, और इसी का फायदा उठाते हैं जिस्मफरोशी के धंधे से जुड़े हैवान।    

भारत और नेपाल की 1751 किलोमीटर की खुली सीमा पर चौबीसों घंटे नजर रखना मुश्किल है। दोनों देशों के बीच बेहतर आपसी संबंधों के कारण सीमा पर लोगों की सहज आवाजाही को बाधित करने की कोशिश नहीं की जाती है। नेपाली बालाओं की तस्करी करने वाले लोग इस बात को अच्छी तरह से जानते हैं। सीमा सुरक्षा से जुड़े दोनों देशों के अधिकारी भी आपसी बैठक में स्वीकार करते हैं कि इस मामले से जुड़े कुछ लोगों को गिरफ्तार करने से इस समस्या का हल नहीं निकलने वाला है। इसके लिए व्यापाक जागरुकता अभियान चलाने की जरूरत है।    

नेपाली बालाओं के सौदागर ट्रेन के अतिरिक्त अन्य वाहनों का इस्तेमाल भी अपने धंधे को सुचारू रुप से चलाने के लिए कर रहे हैं। दूर दराज के क्षेत्रों से सीमा पार करा के नेपाली बालाओं को एक जगह पर एकत्रित करना आसान होता है। सीमा पर तैनात अधिकारियों की नजर इन पर नहीं पड़ती है। चेक पोस्ट पर वाहनों की चेकिंक के दौरान इनका ध्यान वाहनों में रखे हुये सामानों पर होता है, सवारी पर नहीं।

भारत और नेपाल सीमा काफी अरसे से चर्चा में रहा है, कभी सोने और हथियारों की तस्करी को लेकर तो कभी आतंकवादियों और जाली नोटों के कारोबारियों के कारण. लेकिन इन दिनों भारत नेपाल सीमा नेपाली बालाओं की तस्करी के लिए कुख्यात हो चुका है। पिछले छह महीने में करीब तीन सौ नेपाली बालाओं को तस्करों के चुंगल से मुक्त कराया गया है। एक अनुमान के मुताबिक प्रतिवर्ष हजारों नेपाली बालाएं बिहार के रास्ते दिल्ली होते हुये खाड़ी देशों में भेज दी जाती हैं।    

तस्करों के जाल में फंसने वाली अधिकतर लड़कियां अशिक्षित हैं। दलाल उन्हें नौकरी दिलाने के नाम पर बहकाते हैं और वे सहजता से उनके जाल में फंसती जाती हैं.

लंबे समय तक धंधे में बने रहने के बाद इन्हीं में से कुछ लड़कियां इस नेटवर्क से जुड़े लोगों का विश्वास हासिल कर इस धंधे में उनकी सहयोगी बन जाती हैं। वापस लौट कर जब वे गांव की अन्य महिलाओं को बताती हैं कि कैसे वे एक बेहतर जीवन जी रही हैं तो अन्य महिलाएं भी अपनी बेटियों को उसके साथ भेजने के लिए तैयार हो जाती है, और इस तरह कारोबार का सिलसिला चलता रहता है।

सीमा पार के गांवों के स्थानीय पुरुष भी बहुत बड़ी संख्या में इस नेटवर्क से जुड़े हुये हैं। इनका काम मुख्यरुप से बाहर के मुल्कों में भेजी जाने वाली नेपाली बालाओं को चिन्हित करना होता है। इन्हीं की सूचना पर नेपाली बालाओं को अपने फंदे में फांसने की रणनीति बनती है, किस तरह से लड़की के परिवार वालों को उसे बाहर निकलने के लिए मनाया जा सकता है। गांव के बड़े बुजुर्गों के साथ भी ये लोग तालमेल बनाये रखते हैं, ताकि लड़की को बाहर भेजने को लेकर कोई सवाल नहीं उठे।     

कुछ सामाजिक संस्थाएं इस मामले को काफी गंभीरता से ले रही हैं। बदस्तूर जारी इस धंधे को रोकने के लिए पुरजोर कोशिश कर रही हैं। नेपाल में भारी संख्या में महिलाएं तस्करों का शिकार हो रहीं हैं. इससे नेपाल के सामाजिक संतुलन पर भी असर पड़ने लगा है. नेपाल में एक संस्था माइती वर्षों से इस क्षेत्र में काम रही है। माइती ने अब तक सैंकड़ों लड़कियों को तस्करों से मुक्त कराया है.  माइती इस समस्या को लेकर काफी गंभीर है।

 सैकड़ों की संख्या में नेपाल की ये सुंदर लड़कियां आम नेपाली लड़कियां नहीं हैं, ये नेपाल की वे खुबसूरत लड़कियां हैं जो,तस्करों से मुक्त कराई गईं हैं अलग अलग जगहों से और अलग अलग दिनों में  मुक्त इन सुंदर बालाओं की कहानी अलग अलग जरुर है लेकिन विवशता और लाचारी एक ही है. यह लाचारी है गरीब होने की ,अपने और अपने परिवार का पेट पालने की.बूढ़े माता पिता को जिंदा रखने की.

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