सोशल मीडिया पर नकेल की कवायद

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क्या मनमोहन सिंह की सरकार सोशल मीडिया से भयभीत है? केंद्र सरकार ने देश के हर व्यक्ति पर नजर रखने की जुगत बैठा ली है। खासकर संचार माध्यमों से जुड़ी सोशल साइटों की  गतिविधियों पर। पिछले महीने केंद्र सरकार द्वारा एक ऐसी योजना की शुरुआत की गई है, जिससे सरकार को देश के संचार नेटवर्क का एक्सेस मिल जाएगा। यानि संचार माध्यमों पर व्यक्ति के हर पल की गतिविधियों पर अब सरकार की नजर होगी। पिछले कुछ वर्षों में दुनिया के विभिन्न हिस्सों में जनांदोलनों को खड़ा करने और सफलतापूर्वक उनका संचालन करने में संचार क्रांति ने अहम भूमिका निभाई है। इसकी धमक को पूरी दुनिया ने महसूस ने किया है और यही वजह है कि अब इस पर नियंत्रण करने के लिए विभिन्न मुल्कों की सरकारें अपने-अपने तरीके से लगी हुई हैं। भारत में यूपीए सरकार भी सोशल साइटों पर होने वाली तीखी प्रतिक्रियाओं से खुद को असहज महसूस कर रही है। फिलहाल सीधे तौर पर सोशल साइटों पर लगाम न लगाकर पिछले दरवाजे से उनका गरदन दबोचने की कोशिश की जा रही है।
इसमें कोई दो राय नहीं है कि भारत में सोशल मीडिया काफी बेबाक हो चली है। छोटी-बड़ी हर तरह की सूचनाएं पलक झपकते ही सोशल मीडिया पर गूंज जाती हैं और इसके साथ ही उन पर त्वरित प्रतिक्रियाएं भी आने लगी हैं। सोशल मीडिया बड़ी मजबूती से ‘पब्लिक ओपिनियन’ गढ़ने करने का भी काम कर रही हैं। भारत में सोशल मीडिया पर नजर रखने वाले विशेषज्ञों का मानना है कि यहां पर जारी सरकार के खिलाफ मुुहिम में सोशल मीडिया अहम भूमिका निभा रही है। सरकार की खामियों की चीड़फाड़ तो की ही जा रही है, उस पर चुटीले अंदाज में तंज भी खूब कसे जा रहे हैं। इसके साथ-साथ सरकार में शामिल तमाम बड़े ओहदेदारों की तस्वीरों के साथ भी छेड़छाड़ करके उन्हें व्यंग्यात्मक लहजे में पेश किया जा रहा है। केंद्र सरकार अपनी बिगड़ती छवि के लिए एक तरह से सोशल मीडिया पर चलाये जा रहे मुहिम को भी जिम्मेदार मान रही है। कई तरह के घोटालों में घिरी हुई केंद्र सरकार के लिए सोशल मीडिया कोढ़ में खाज का काम कर रही है। कोयला ब्लाक प्रकरण में सीबीआई और कानून मंत्री अश्विनी कुमार व घूस के मामले में रेल मंत्री पवन बंसल और उनके भांजे को लेकर जिस तरह की छींटाकशी सोशल मीडिया में की गई है, उसे देखते हुये कई सरकारी नुमाइंदे तो सोशल मीडिया का पूरी तरह से होश ठिकाने लगाने के मूड में हैं।
सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की चौहद्दी को भी सवालों को घेरे में ला खड़ा किया है। आखिर किसी पर छंींटाकशी करने की सीमा क्या है? कई बार देखा गया है कि सोशल मीडिया पर टिप्पणी के दौरान लोग शालीनता को पूरी तरह से ताक पर रख देते हैं। अपने गुस्से का इजहार करने के लिए गाली गलौज पर भी उतर आते हैं। सोशल मीडिया पर ऐसे लोगों को रोक पाना काफी मुश्किल है। हालांकि पुलिस में शिकायत करने पर ऐसे लोगों के खिलाफ कार्रवाई के प्रावधान हैं और कई मौकों पर ऐसे लोगों के खिलाफ एक्शन भी लिया गया है। फिर भी इस तरह की हरकतें बदस्तूर जारी हैं। हालांकि सोशल मीडिया पर नजर रखने वाले विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह के लोगों को लेकर ज्यादा परेशान होने की जरूरत नहीं है। सोशल मीडिया पर मूर्ख लोग नहीं बैठे हुये हैं। यदि कोई व्यक्ति अपनी बात कहने के लिए गंदे शब्दों का सहारा लेता है तो खुद-ब-खुद उसका बायकॉट होने लगता है। आप सोशल मीडिया पर असभ्य तरीके से पेश आकर लोगों को अपनी ओर आकर्षित नहीं कर सकते। सोशल मीडिया को अपनी सीमा रेखा खुद ही तय करनी होगी। इस दिशा में सरकार की तरफ से उठाया गया कोई भी कदम लोगों को उत्तेजित ही करेगा।
वर्ष 2014 में होने वाले आम चुनाव के मद्देनजर सोशल मीडिया की भूमिका और बढ़ गई है। भारत का मध्यम वर्ग तेजी से सोशल मीडिया से जुड़ रहा है। युवाओं के बीच में तो इसका क्रेज दिन पर दिन बढ़ता ही जा रहा है। सोशल मीडिया पर व्यवस्थित तरीके से किया गया प्रचार इन तबकों के वोटिंग पैटर्न को जरूर प्रभावित करेगा और केंद्र सरकार की चिंता भी यही है। खासकर मध्यम वर्ग और युवाओं को लक्ष्य करके सोशल मीडिया पर केंद्र सरकार के खिलाफ बहुत कुछ कहा जा रहा है और अभी से इसका असर दिखने भी लगा है। युवाओं के बीच मनमोहन सरकार को एक करप्ट सरकार के रूप में शुमार किया जा रहा है। मजे की बात है कि केंद्र सरकार सीधे तौर पर इस बात को स्वीकार नहीं कर रही है कि सोशल मीडिया का इस्तेमाल उसके खिलाफ हो रहा है। इसलिए इस पर नजर रखने की जरूरत है। इसके बजाय वह यह दलील दे रही है कि सोशल मीडिया पर एक धर्म विशेष के खिलाफ जहर उगले जा रहे हैं, इसलिए उन पर ध्यान देना लाजिमी है।
पूरी दुनिया में व्यक्ति के जीवन में राज्य के हस्तक्षेप को लेकर लंबी बहस चली है। महात्मा गांधी व्यक्ति के जीवन में राज्य के हस्तक्षेप को न्यूनतम करने के हामी थे और वैज्ञानिक समाजवाद के महान चिंतक कार्ल मार्क्स भी एक ऐसे समाज की पकिल्पना करते थे, जो राज्यविहीन हो यानि लोगों को कानून की जरूरत ही न पड़े। एक आदर्श राज्य की परिकल्पना को लेकर इन दोनों महापुरुषों के सपने दूर की कौड़ी बनी हुई है। इसके विपरीत नागरिकों को शक के नजरिए से देखने की राज्य की प्रवृति में इजाफा में हो रहा है। दुनिया भर में चलने वाली तकनीकी क्रांति और खासकर संचार क्रांति के बाद से तो राज्य अपने नागरिकों को लेकर और भी सशंकित रहने लगा है। वैसे हुकूमत पर विरोधी सूचनाओं के प्रकाशन व प्रसारण पर हमेशा से ही रोक लगाने की प्रवृति हावी रही है। विगत में अपनी बात लोगों तक पहुंचाने के लिए रहनुमाओं को काफी मेहनत करनी पड़ती थी। यदि उसकी सोच में सरकार विरोधी बातें शामिल होती थीं, तो उसका उस देश विशेष में रहना तक मुश्किल हो जाता था। तकनीकी क्रांति ने इस स्थिति को तो समाप्त कर ही दिया है। इसका इस्तेमाल करके आप बेधड़क होकर अपनी बात कह सकते हैं। लेकिन कई मुल्कों की सरकारों को लोगों के हाथ में मिला अभिव्यक्ति का यह शक्तिशाली हथियार रास नहीं आ रहा है। चीन ने सोशल मीडिया पर पहले से ही नकेल कस रखा है। इस्लामिक मुल्कों में भी सोशल मीडिया को नियंत्रण में रखने की कोशिशें जारी हैं। भारत में मनमोहन सरकार भी धीरे-धीरे इसी दिशा में बढ़ रही है। वैसे भी विगत में अन्ना आंदोलन के समय जिस तरह से सोशल मीडिया का इस्तेमाल करके देशभर में लोगों को जन लोकपाल के मसले पर एकजुट करने की कोशिश की गई थी, उसी समय से केंद्र सरकार के नुमाइंदों को सोशल मीडिया की बढ़ती ताकत खटकने लगी है। फिलहाल आप पार्टी के लोग अपने पक्ष में लोगों को लाने के लिए सोशल मीडिया का जबरदस्त इस्तेमाल कर रहे हैं, जिससे केंद्र सरकार के नुमाइंदे भड़के हुये हैं। आने वाले दिनों में सोशल मीडिया की बांह मड़ोरने के लिए केंद्र सरकार द्वारा कुछ और कठोर कदम उठाये जाने की पूरी संभावना है। यदि कुछ कठोर कदम नहीं भी उठाती है तो फिलहाल सोशल मीडिया पर सक्रिय लोगों की चौकसी करने की क्षमता तो उसने हासिल कर ही ली है। सोशल मीडिया के लोगों को भयभीत करने के लिए फिलहाल यह काफी है।

1 COMMENT

  1. मिडिया पर नकेल कसना उनकी मजबूरी है ,क्योंकि मिडिया ने अपनी सक्रियता से इन दलालों को घेर रखा है.उसका धंधा चौपट हो रहा है.
    पर ये नकेल कसने की बात/नकेल कसना लोकतंत्र के लिए बड़ा खतरा हो सकता है.

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