इक अनहोनी घट गयी (कविता)

भरत तिवारी//

इक अनहोनी घट गयी
के सारा आलम सोते से जाग गया
अबला का शारीरिक शोषण
टी.वी. ने दिखाया .
और तब !!! सब को पता चला कि
अभद्रता की सीमा क्या होती है
नेताओं के बिगुल
स्त्री समाज की मुखिया
जिन पर खुद आरोप हैं
शोषण करवाने के
नये नये तरीके के व्याख्यान देने लगे
अरे ! हाँ !
वो क्या हुआ राजस्थान वाले केस का

रोना आता है इस समाज के खोखलेपन पर
जहाँ हर घड़ी
घर के आँगन से शहर के चौक तक
रोज़ ये हो रहा होता है
और समाज आँख खोले
सो रहा होता है,
और जो उबासी आये तो पुलिस को गरिया दिया
… भई ये सब तो शासन ने देखना है ना !!
हम क्या करें ?
… अब इन्तिज़ार है सबको
ऐसा कोई वी.डी.ओ
सामूहिक बलात्कार का भी आ जाये
तो थोड़ा और जागें …
इन्तेज़ार है
(जाओ बेंडिट क्वीन देख लो अगर वयस्क हो गए हो)

किसको बहला रहे हो मियाँ

अंदर जो आत्मा ना मार डाली हो
तो झाँक लेना …
फ़िर सो जाना
सच सुनकर नीद अच्छी आती है

घटिया ओछे नाकारा

***

भरत तिवारी
B-71, शेख सराय फेज़- 1, नई दिल्ली, 110 017.
011-26012386

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सदियों से इंसान बेहतरी की तलाश में आगे बढ़ता जा रहा है, तमाम तंत्रों का निर्माण इस बेहतरी के लिए किया गया है। लेकिन कभी-कभी इंसान के हाथों में केंद्रित तंत्र या तो साध्य बन जाता है या व्यक्तिगत मनोइच्छा की पूर्ति का साधन। आकाशीय लोक और इसके इर्द गिर्द बुनी गई अवधाराणाओं का क्रमश: विकास का उदेश्य इंसान के कारवां को आगे बढ़ाना है। हम ज्ञान और विज्ञान की सभी शाखाओं का इस्तेमाल करते हुये उन कांटों को देखने और चुनने का प्रयास करने जा रहे हैं, जो किसी न किसी रूप में इंसानियत के पग में चुभती रही है...यकीनन कुछ कांटे तो हम निकाल ही लेंगे।
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One Response to इक अनहोनी घट गयी (कविता)

  1. anju(anu) says:

    किसको बहला रहे हो मियाँ

    अंदर जो आत्मा ना मार डाली हो
    तो झाँक लेना …
    फ़िर सो जाना
    सच सुनकर नीद अच्छी आती है

    घटिया ओछे नाकारा…………………………बहुत बढिया ….अगर हर कोई अपने हिस्से की ज़िम्मेवारी निभा ले तो सुधार तो वैसे ही हो जाएगा

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