कहीं डायनासोर की तरह विलुप्त न हो जाये हाथी मेरे साथी

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नीतीश कुमार, पटना

वर्षों पहले हाथी मेरे साथी नामक एक फिल्म काफी पॉपुलर हुई थी। इसमें आदमी और हाथी की दोस्ती की कहानी कही गई थी। लेकिन लगता है इंसान ने अपने इस दोस्त से मुंह फेर लिया है। हाथी भी अन्य कई जानवरों की तरह विलुप्त होने के कगार पर पहुंच चुके हैं। भारत की सांस्कृतिक विरासत के एक प्रतीक हाथियों की संख्या देश में महज 26 हजार ही रह गई है। जानवरों में सबसे ज्यादा दिमाग वाले इस विशालकाय पशु के लिए ट्रेनें काल बनी हुई हैं। पिछले हफ्ते पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी में एक ट्रेन की टक्कर से 7 हाथियों की मौत हो गई थी। पिछले 5 सालों में ट्रेन हादसों में हम 60 हाथियों को खो चुके हैं। असम, पश्चिम बंगाल और उत्तराखंड में ऐसे हादसे ज्यादा हुए हैं।

पर्यावरण मंत्रालय द्वारा गठित एलिफैंट टास्क फोर्स ने हाथियों को बचाने के लिए हाथी बहुल इलाकों में ट्रेन स्पीड कम करने, पानी के स्त्रोतों को बढ़ाने जैसे महत्वपूर्ण सुझाव दिए हैं। इतना ही नहीं- ट्रेन की स्पीड 40 की. मी./घंटा रखे, इस पर भी कई बार हिदायत दिए गये है, पर रिजल्ट फिर भी दुखद मिलता है। सवाल उठता है कि बार बार हिदायत देने के बावजूद ट्रेन की स्पीड कम क्यों नहीं होती? क्या ये पर्यावरण के अंग नहीं है? इतना ही नहीं औधोगीकरण के नाम पर बड़े पैमाने पर  पेड़ों की कटाई हो रही है। इस से तो जानवरों का जीना भी मुहाल हो गया है। पर ये सुझाव अमल कैसे हो ? इस पर सोचने का वक़्त आ गया है। सिर्फ नियम बनाने से इन की रक्षा नहीं हो सकती ! हम इंसान को जानवरों के प्रति अपना नजरिया अपने परिवार के सदस्य की तरह रखना होगा,  क्योंकि ये जानवर भी तो इस प्रकृति के प्रमुख अंग है।

मानव जनसंख्या के बढ़ते दबाव ने हाथियों का संकट बढ़ाया है। जंगल कट रहे हैं और हाथियों के प्राकृतिक आवास कम हो रहे हैं। बेशकीमती दांत के चक्कर में भी ये मारे जा रहे हैं। अगर ऐसे ही हालात रहे तो सेव टाइगर मुहिम की तरह हाथियों को बचाने के लिए सेव ऐलिफेंट अभियान चलाए जाने की जरूरत पड़ेगी। हाथी के बगैर भारतीय जनजीवन अधूरा लगेगा। कितने ही त्योहार फीके पड़ जाएंगे। अगर हाथी इसी तरह विलुप्त होते रहे तो आने वाली पीढ़ियों को ‘हाथी के दांत दिखाने के और, खाने के और’, ‘हाथी के पांव में सबका पांव’ और ‘हाथी पालना’ जैसी कहावतों का अर्थ ही नहीं समझ में आएगा। क्या हम अपने इस साथी को भुला देंगे?

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सदियों से इंसान बेहतरी की तलाश में आगे बढ़ता जा रहा है, तमाम तंत्रों का निर्माण इस बेहतरी के लिए किया गया है। लेकिन कभी-कभी इंसान के हाथों में केंद्रित तंत्र या तो साध्य बन जाता है या व्यक्तिगत मनोइच्छा की पूर्ति का साधन। आकाशीय लोक और इसके इर्द गिर्द बुनी गई अवधाराणाओं का क्रमश: विकास का उदेश्य इंसान के कारवां को आगे बढ़ाना है। हम ज्ञान और विज्ञान की सभी शाखाओं का इस्तेमाल करते हुये उन कांटों को देखने और चुनने का प्रयास करने जा रहे हैं, जो किसी न किसी रूप में इंसानियत के पग में चुभती रही है...यकीनन कुछ कांटे तो हम निकाल ही लेंगे।

6 COMMENTS

  1. Dear Sir
    aapki articles hamesha mujhe inspire karti hai.. mai aapki har article padhti hon..
    mai ye janana chahati hon ki un train drivers pe koi action li jati hai ki nahi jo hathi ko kuchal dete hai..
    aur wan sanrakshan bibhag janwaro ki raksha ke liye kya kadam chala rahi hai.

    sir aapne jo rekha ke bare me likha tha mujhe wo artickle kafi touchy aur motivational laga..

  2. mai tewar online to hamesha visit kati hon par ab jo iski level dikh rahi hai..
    that really a matter of pride..
    now its better than before..
    ab logon ki duniya ke saath janwaron ki suraksha par bhi aawaz uth rahi hai..
    ye sach me kaboletarif hai..
    thanks to the editor

  3. Hé c’est un grand poteau. Est-ce que je peux employer une partie là-dessus sur mon emplacement ? Je naturellement lierais à votre emplacement ainsi les gens pourraient lire le plein article s’ils voulaient à. Remercie l’une ou l’autre manière.

  4. thanks dear.. thanks all of u.. after a very long time i am back on tewar online.. bcoz of some reason i was away from this site.. but i am really motivated that i have got such comments over my report..
    be in touch all of u & keep watching my reports..
    thanks all of you..

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