गजल

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राहुल रंजन महिवाल
राहुल रंजन महिवाल

राहुल रंजन महिवाल

महबूब को सजदा करना, पर दुनिया को झुकाना है |
ज़माने में इसी का नाम, यारों दिल का लगाना है |
सुनी सुनाई होती तो हम खामोश रह जाते,
दर्द-ऐ-मोहब्बत को हमने बड़ी शिद्दत से पहचाना है |

सच है कि ज़िन्दगी का मकसद है चलते जाना,
प्यार ने सबक दिया महबूब के पीछे ही जाना है |
ज़िन्दगी की सौगातों को खोते ही जा रहे हैं,
पर इस य़की पर कि उन्हें हमसफ़र बनाना है |

दो रास्ते नजर आते हैं उनकी दो हसीन आँखें,
उनसे गुजर कर ही अपने मंजिल-ऐ-दिल को पाना है |
मिज़ाज है आशिकाना अपना, अंदाज़ शायराना है,
नाम पूछो तो लोग हैं कहते ‘महिवाल’ दीवाना है |

राहुल रंजन महिवाल,
भारतीय प्रशासनिक सेवा
जिलाधिकारी
अमरावती, महाराष्ट्र

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सदियों से इंसान बेहतरी की तलाश में आगे बढ़ता जा रहा है, तमाम तंत्रों का निर्माण इस बेहतरी के लिए किया गया है। लेकिन कभी-कभी इंसान के हाथों में केंद्रित तंत्र या तो साध्य बन जाता है या व्यक्तिगत मनोइच्छा की पूर्ति का साधन। आकाशीय लोक और इसके इर्द गिर्द बुनी गई अवधाराणाओं का क्रमश: विकास का उदेश्य इंसान के कारवां को आगे बढ़ाना है। हम ज्ञान और विज्ञान की सभी शाखाओं का इस्तेमाल करते हुये उन कांटों को देखने और चुनने का प्रयास करने जा रहे हैं, जो किसी न किसी रूप में इंसानियत के पग में चुभती रही है...यकीनन कुछ कांटे तो हम निकाल ही लेंगे।

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