जीवन … जीत है अंत! (कविता)

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अरविन्द कुमार,

हर क्षण पाता हूँ खुद को एक दोराहे पर..
जिंदगी की जटिल राह पर
क्या बाहर आ पाउँगा इस जाल से …
बचपन में खुश होता था जब मछली को तालाब तक पहुंचा देता था उस पुस्तक के रंगबिरंगे पन्नों पर ..
और खुश हो लेता था कि…
जिंदगी मिल गयी है अब मछली को …
पा गयी है अब वो तालाब ….
पर क्या ये सच था…

समझ आ गई है कि
अब जब मंजिल करीब है
लगता है कि ये तो खेल का भी अंत है …
अब जीतना नहीं है लक्ष्य
बस खेलना खेलना और खेलना ही है जिंदगी का स्वरुप …
जीतना तो अंत है
जीवन के खेल का…
कितना प्यारा है ये जिंदगी का जाल …
हर पल लड़ता खुद अपने वजूद से
क्या गलत क्या सही …
बस एक मौका कोई दूसरा नहीं …
खूब खेल है ये भी जिंदगी …
हारने वाले ही मजे लेते हैं …
जो जीत गया … वो पा गया अंत को और ख़त्म हो गयी जिंदगी का खेल…

हारना ही है मकसद अब
उलझने में ही है मजा
जीत जाना ख़त्म हो जाना है
खुश हो लें अगर जिन्दगी देती है कोई सजा ….!

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सदियों से इंसान बेहतरी की तलाश में आगे बढ़ता जा रहा है, तमाम तंत्रों का निर्माण इस बेहतरी के लिए किया गया है। लेकिन कभी-कभी इंसान के हाथों में केंद्रित तंत्र या तो साध्य बन जाता है या व्यक्तिगत मनोइच्छा की पूर्ति का साधन। आकाशीय लोक और इसके इर्द गिर्द बुनी गई अवधाराणाओं का क्रमश: विकास का उदेश्य इंसान के कारवां को आगे बढ़ाना है। हम ज्ञान और विज्ञान की सभी शाखाओं का इस्तेमाल करते हुये उन कांटों को देखने और चुनने का प्रयास करने जा रहे हैं, जो किसी न किसी रूप में इंसानियत के पग में चुभती रही है...यकीनन कुछ कांटे तो हम निकाल ही लेंगे।

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