दुनिया का बंटवार (कविता)

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साभार: indian history .com
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हव्वा और आदम ने ठाना

 दुनिया का बंटवारा होगा,

 मादा सृष्टि मेरी होगी

 नर संसार तुम्हारा होगा।

 पांव की जूती नहीं रहूंगी

जोर-जुल्म भी नहीं सहूंगी,

 मुझको भी आज़ादी प्यारी

 दासी बनकर नहीं जिऊंगी।

 स्वर्ग से हम दोनों आए थे

 जीवन तुमने नर्क बनाया,

 सृष्टि का आधार बनी में

 तुमने अपना नाम कमाया।

अंकुर कोख में मैंने पाला

 सारा जीवन उसमें ढाला,

 अपना कोई हक न समझा

 सब तेरी झोली में डाला।

 पर नर तूने कद्र न जानी

जब चाहा तब की मनमानी,

 तूनें सदियों खूब सताया

अब ये अबला हुई सयानी।

 जाती हूं दहलीज लांघकर

सारे दुख खूंटी पे टांगकर,

 मेरे सुख का द्वार खुला है

खुश हूं मैं मुक्ति जानकर।

 जाओ-जाओ नर चिल्लाया

हव्वा का प्रस्ताव भी भाया,

 मुक्ति लोगी, मुक्ति दोगी

 नहीं सतायेगी मोह माया।

 तेरे कारण बंधन में था

बास-सुबास न चंदन में था,

अब जीवन फर्राटा लेगा

मेरा पहिया मंदन में था।

 अपना स्वर्ग में फिर रच लूंगा

 ज्ञान से सारे सुख कर लूंगा,

 कंधे पर से बोझ हटा है,

 देखो कैसे मैं जी लूंगा।

 तभी सेब एक टूट के आया

 हव्वा ने आदम को थमाया,

 नजर मिली दोनों की फिरसे

 आधा-आधा उसको खाया।

 लगा ज्ञान से प्रेम बड़ा है

 जीवन अब भी वहीं खड़ा है,

 इसके लिए स्वर्ग ठुकराया

 अब क्यों यह अहंकार चढ़ा है।

इंद्र का वह लोक छोड़कर,

 देवत्व के बंधन तोड़कर।

 हमने अपना लोक बसाया,

 चारों ओर है अपनी माया।

 माया का विस्तार है इतना,

 स्वर्गलोक का सार न जितना।

 अगर टूटते हैं हम दोनों,

 अगर कोई बंटवारा होगा।

 तो न संसार तुम्हारा होगा,

 न संसार हमारा होगा।।

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