पटना को मैंने करीब से देखा है (पार्ट-6)

0
39

फ्री-स्टाइल में होता था फैटा-फैटी

 घिच-पिच आबादी वाली बस्ती कई मायनों में बच्चों को समृद्ध करती हैं, और उनके अंदर व्याप्त सहज गुणों को काटते-तराशते हुये उन्हें निखरने का पूरा मौक प्रदान करती है, लेकिन यहां पर भी प्रकृति सर्वश्रेष्ठ का चयन करती है का नियम पूरी मुस्तैदी से लागू होता है। जरा सा भी कमजोर पड़ने की स्थिति में घिचपिच आबादी की बदबूदार दांतें बच्चों को चबाने-खाने में पूरी निर्ममता बरतती हैं। यही कारण है कि दुनिया के विभिन्न शहरों में व्याप्त इस तरह की बस्ती व्यापक पैमाने पर बच्चों के लिए कब्रगाह बनी हुई हैं, चाहे वह मास्को हो, या म्यूनिख, या फिर दिल्ली या मुंबई। पुनाईचक का पूरा माहौल एक ओर तो बच्चों को उनकी प्रतिभा के मुताबिक फूलने-खिलने का पूरा मौका देता था, तो दूसरी ओर ब्लेड की धार की तरह एक झटके में उनके परों को कतर देता था। वैसे सामान्यतौर पर बच्चों के जीवन में उन्मुकता थी, अपनी सहज प्रवृतियों से संचालित होते हुये वे जीवन जीने की विभिन्न कलाओं से रू-ब-रू हो रहे थे, और इसका पूरा स्वाद ले रहे थे।

बच्चों के गैंग में मेरी इंट्री हो चुकी थी, और अपना जगह सुनिश्चित करने के लिए उनके साथ कई बार जोर आजमाइश भी करना पड़ा था। उठा-पटक और फैटा-फैटी पूरी तरह से फ्री-स्टाइल में होता था, और इसी के आधार पर गैंग में स्थान सुनिश्चित होता था। घूंसेबाजी में मैं थोड़ा कमजोर पड़ता था, लेकिन उठापटक में मैं बाजी मार ले जाता था। किसी का जोरदार घूंसा पड़ने के बाद कभी-कभी नाक और मूंह से खून भी आ जाते थे, जिन्हें तुरंत साफ करके दुरुस्त हो जाता था ताकि घर में किसी को पता नहीं चले।   

इन बच्चों के मूवमेंट की कोई भौगौलिक सीमा नहीं थी, जब जिधर मन करता था, उधर निकल पड़ते थे, पूरा पटना इनके रेंज में आता था। पुनाईचक के मुख्य सड़क से बाहर निकलने के बाद सचिवालय शुरु होता था, जो दूर तक फैला हुया था। सचिवालय के सामने तरह-तरह की दुकाने सजी होती थी, और इन दुकानों से सामान उड़ाने में गैंग के बच्चे माहिर थे। बच्चे फल वाले दुकानों पर ज्यादा चोट करते थे। आम, अमरुद, सेव, नासपाती आदि पर हाथ साफ करने के लिए पहले ये लोग दुकानदार को तरह-तरह परेशान करते थे। कभी कोई उसके कंधे पर पड़ा हुआ गमछा ले भागता था, तो कभी कोई उसका तोलने वाला बटखरा उठा लेता। बच्चों को देखते ही दुकान वाले अलर्ट हो जाते थे, और ज्यादा परेशान करने की स्थिति में मारपीट करने पर उतारू हो जाते थे। बच्चों की कोशिश होती थी कि दुकानदार को इतना परेशान करो कि वह उनके पीछे मारने के लिए दौड़े। इस बीच मौका देखकर गैंग के दूसरे बच्चे आंख बंद डिब्बा गायब के तर्ज पर उसके सामान पर हाथ साफ कर देते थे, और फिर बाद में उस सामान के बंटवारे को लेकर आपस में ही उलझ पड़ते थे, और एक-दूसरे का नाक- मुंह तोड़ने पर उतारू हो जाते थे। यह सब रुटीन में शामिल था। लगभग हर रोज दिन में बच्चों का यह गैंग सचिवालय का चक्कर काटता था, और जी-भर कर उधम मचाता था।

सचिवालय मुख्य रूप से दो भागों में बंटा हुआ था, पुराना सचिवालय और नया सचिवालय। इसे सेक्रेटिरियट कहा जाता था, यहां तक कि रिक्शा वाले भी इसे सेक्रेटेरियट कहते थे, सचिवालय बोलने पर वे समझते ही नहीं थे। अंग्रेजों के कुछ मौलिक शब्द लोगों को जुबान पर इस कदर चढ़े हुये थे कि यदि उन्हें उन शब्दों का हिन्दी उच्चारण समझ में ही नहीं आता था।

पुराना सचिवालय की चौहद्दी में एक बड़ा सा झील आता था, जिसमें बहुत सारी मछलियां तैरती रहती थीं। इस झील के सामने एक कैंटिन था, जिसमें से तरह तरह के मिठाइयों की खूश्बू आती थी। दिन में एक बजे के बाद ही यहां जोरदार भीड़ होता था, सभी छोटे-बड़े कर्मचारी काउंटर पर खड़े होकर खाने की चीजें लेने के लिए हो-हल्ला मचाते थे। सस्ते दर पर यहां काला जामुन, समोसे, पकौड़ियां, लड्डु आदि मिलते थे, लेकिन इन्हें हासिल करने के लिए काफी देर तक अव्यवस्थित भीड़ के साथ खड़ा होना पड़ता था। कहीं से पैसे हाथ लगने की स्थिति में बच्चे इस कैंटिन की ओर रूख करना नहीं भूलते थे। नया सचिवालय की बड़ी सी घुमावदार बिल्डिंग बेलीरोड से सटी हुई थी, और इसके मुख्य दरवाजे पर सिपाही खड़े होते थे, जो बाहर से आने वाले लोगों से अंदर जाने की इजाजत देने की स्थिति में कुछ पैसे वसुलते थे। बच्चों का गैंग इन सिपाहियों से अक्सर उलझता था। चलते-चलते कोई बच्चा इन्हें मामू कह देता था, और फिर एक साथ सभी बच्चे मामू-मामू कह कर चिल्लाते थे। पहले तो गेट पर तैनात सिपाही इन बच्चों को अनदेखी करने की कोशिश करते थे, लेकिन फिर अचानक वे बच्चों पर झपट पड़ते थे। सिपाहियों की इस अप्रत्याशित हरकत के लिए बच्चे अक्सर तैयार रहते थे, वे छिटककर दूर भाग जाते थे और वहीं से जोर-जोर से मामू-मामू चिल्लाते थे।

बिहार में जोड़तोड़ के बाद मुख्यमंत्री के पद पर काबिज होने के बाद मोस्यू लालू प्रसाद ने अपनी लोकप्रियता को और बढ़ाने के लिए सचिवालय के इन्हीं गेटों का सहारा लिया था। वह सुबह दस बजे  सचिवालय के किसी गेट पर आकर खड़ा हो जाते थे, और सिपाही को गेट बंद करने का आदेश देकर यहा पता लगाने का जबरदस्त नाटक करते थे कि कौन-कौन देर से पहुंच रहा है। प्रारंभिक दौर में सचिवालय के कर्माचारियों के साथ मोस्यू लालू यादव का व्यवहार किसी स्कूल के प्रधानाध्यापक की तरह था, जो हाथ में छड़ी लेकर स्कूल के गेट पर खड़ा हो जाता है और देर से आने वाले छात्रों को सेंकता जाता है। मोस्यू लालू यादव का यह नाटक काफी हद तक लोगों के ऊपर अपना असर छोड़ रहा था। सचिवालय के इर्दगिर्द के इलाकों में मोस्यू लालू यादव के हरकतों की खूब चर्चा होती थी, कब किस गेट पर वह आये, किसको क्या कहा। आम लोगों के साथ कम्युनिकेशन करने का उनका स्टाईल निसंदेह अनूठा था, कम से कम मोस्यू लालू यादव के पहले ऊंचे पायदान पर जितने भी सियाही लोग थे, वे लोगों के लिए सहज रूप से सुलभ नहीं थे। कांग्रेसी कल्चर आम जन से दूरी रखकर सत्ता का उपभोग करने का था। मोस्यू लालू यादव ने इस ट्रेंड को बखूबी तोड़ा था, और व्यापाक पैमाने पर लोग उनसे या उनकी छवि से डायरेक्ट जुड़ते चले गये थे, लेकिन वह इस नये ट्रेंड को अंजाम तक नहीं पहुंचा सके। बाद के दिनों में सारी शक्ति रेला-ठेला में झोंकते रहे, और जनसमूह के व्यापक उभार को एक बेहतरीन दिशा दे पाने में नाकामयाब रहे। एक विदूषक और भांड़ की तरह  व्यवहार करते हुये कब वह कांग्रेस द्वारा छोड़ी गई भ्रष्ठाचारी संस्कृति में लोटपोट हो गये खुद उन्हें भी पता नहीं चला, और जब पता चला तो बहुत देर हो चुका था। इसके साथ ही उनकी आभा मलिन पड़ती गई और एक विदुषक के रूप में उनके व्यवहार में इजाफा होता गया। खबरिया तंत्रों के लिए तो वह एक बिकाऊ माल बनते गये, लेकिन उनकी खुद की जमीन घिसकती गई।

पतंगबाजी के मौसम में धागे पर धार चढ़ाने के लिए शीशे की जरूरत होती थी, और बच्चों के इस जरूरत की पूर्ति सचिवालय करता था। सचिवालय के अंदर एक जगह पर वहां के सारे कूड़े-कबाड़े फेंके जाते थे, जिनमें काले कागजों, गोंद के खाली डब्बे, टाइपराइटर के फीता वाले प्लेट, फ्यूज बल्व और ट्यूब लाइट की अधिकता होती थी। बच्चे वहां से फ्यूज ट्यूबलाइट उठाकर लाते थे और फिर उन्हें फोड़कर बड़ी सफाई के साथ उसके अंदर से सारा पाउडर निकालकर टूटे हुये शीशे एक-एक टुकड़ों को साफ करने के बाद उन्हें कूट-पीट कर बारीक बनाते थे। अंत में एक बड़े से सूती कपड़े में बारीक शीशे को चालकर अलग करते थे, और पीसे हुये चावल का लेई चढ़ाने के साथ साथ रील से सरसरा कर निकलते हुये धागे पर शीशे का बारीक पाउडर चढ़ाते थे। यह मोस्यू लालू यादव के सत्ता में आने के पहले की बात है। उस समय बिहार के मुख्यमंत्री डा. जगन्नाथ मिश्रा हुया करते थे, और राज्यपाल ए आर किदवई।        

डा. जगन्नाथ मिश्रा, और ए आर किदवई के नाम इसलिय जेहन में धंस गये हैं कि उन दिनों गैंग के कुछ लड़के स्कूल भी जाने लगे थे, और बेलीरोड के पास स्थित जगन्नाथ मिश्रा की हवेली के बगल से गुजरते हुये एक लड़का जोर जोर से चिल्लाता था,

“बिहार के मुख्यमंत्री कौन?”

उसके साथ स्कूल जाने वाले अन्य लड़के जवाब देते थे, -“डा. जगन्नाथ मिश्रा।” डा. जगन्नाथ मिश्रा की हवेली दूर से चमकती थी, और मुख्य दरवाजे पर कुछ संतरी हाथों में बंदूक लेकर हमेशा खड़े रहते थे।

डा. जगन्नाथ मिश्रा की हवेली के बगल से एक बड़ा सा रास्ता था, जो आगे जाकर चार छोटे-छोटे रास्तों में बंटा था। उस पूरे इलाके में विभिन्न तरह के फलों के कितने पेड़ थे गैंग के लड़कों को अच्छी तरह से याद था। किस कोठी के पहरेदार पेड़ों की पहरेदारी करने में ढीले हैं और किस कोठी के चौकस गैंग को भलिभांति पता था। कुछ लड़के ऊंचे–ऊंचे पेड़ों पर चढ़ने में माहिर थे, और अन्य लड़कों को भी अपने साथ होड़ करने के लिए उकसाते थे। उनके उकसावे में आकर पेड़ों पर ऊंचा जाने की होड़ सी लग जाती थी, जिन्हें नहीं चढ़ना आता था वे नीचे खड़े होकर फल गिराने को कहते थे,और ऊपर से चिढ़ाने की स्थिति में नीचे से गंदी–गंदी गालियां निकालते हुये पत्थर चलाने की धमकी देते थे, और कभी-कभी चलाने भी लगते थे।  कोठियों के बाहर वाले पेड़ों के फल तो पकने से पहले ही गायब हो जाते थे, क्योंकि आम लोगों की इन तक सहज पहुंच होती थी। लेकिन कोठियों के अंदर वाले फलों को चखने के लिए थोड़ा रिस्क लेना पड़ता था, और रिस्क लेने में गैंग के लड़कों को मजा आता था। तूत और जामून के पेड़ों पर पूरा गैंग चढ़ जाता था और तब तक नहीं उतरता था जब तक सभी खाकर अघा नहीं जाते थे, लेकिन आम, लीची, और अमरूद के लिए निश्चित रणनीति अपनानी होती थी, क्योंकि इन पेड़ों की रक्षा करने के लिए सियासी बंगले वाले बेहद चौकसी बरतते थे। गर्मी के दिनों में दोपहर को और जाड़े के दिनों में सुबह में इन बंगलों में सेध लगाना आसान होता था।

इकालाजिकल पार्क वाले रास्ते को उन दिनों झउआ रोड कहा जाता था, शायद यह नाम उस सड़क पर लगाये गये एक विशेष प्रकार के पेड़ों की श्रंखला के आधार पर पड़ा था, जिसके पत्ते काफी छायादार थे। वैसे इस इस सड़क पर रिठा के भी काफी पेड़े थे। गैंग के कुछ बच्चे इन पेड़ों से रिठा तोड़कर घर ले जाते थे और उसी से अपने कपड़े साफ करते थे। जीवन के शुरुआती दौर में बच्चों के इस गैंग में रहकर अनजाने में ही बहुत कुछ करने और सीखने को मिला।

प्रत्येक सभ्य समाज का अपना एक मापदंड होता है, जिसके आधार पर अच्छाई और बुराई को निर्धारित करते हैं। सभ्य समाज के मापदंड को यदि आधार माने तो पुनाईचक के उन बच्चों के जीवन में कई बुराईयां मिल जाएंगी, लेकिन जो कुछ भी वो करते थे, या करने की कोशिश करते थे वो सब परिस्थितिजन्य था। उस माहौल में इसके इतर और कुछ हो भी नहीं सकता था। बच्चों को सहेजे बिना दूरगामी परिवर्तन की बात भी सोचना बेकार है, क्योंकि एक दिन बच्चे ही बड़े होकर सबकुछ संभालने की कगार पर खड़े होते हैं। बच्चों की नींव मजबूत करने में मोस्यू लालू यादव से भारी चूक हुई, एक पीढ़ी तो लालू की चमक से चकाचौंध रहा, लेकिन दूसरी पीढ़ी उनके खोखलेबाजी को समझने लगी। बिहार के पाठ्य के पाठ्य पुस्तकों में सिर्फ गुदड़ी का लाल ही ठूसना काफी नहीं था। बेहतर होता गुदड़ी फेंककर बिहार में मोस्यू लालू यादव सिर्फ लाल तैयार करने की परंपरा डालते, लेकिन वह खुद के ही बच्चों को संभालते रहे, किसी को मेडिकल की डिग्री दिलाते रहे, तो किसी को नेशनल लेवल के क्रिकेटर बनाते रहे, जबकि उनके हुंकार पर उमड़ पड़ने वाली लाखों लोगों के बच्चे गंदी बस्तियों और कस्बों में पिसते रहे, शिक्षा से दूर, किताबों से दूर, जिंदगी को शानदार तरीके से जीने की कला से दूर।       

जारी……( अगला अंक अगले शनिवार को)

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here