बचपन की धुंधली यादों में बस गया था एक डाक्टर का चेहरा…

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नालंदा मेडिकल कालेज अस्पताल के जाने-माने चिकित्सक सर्जन डा. जे.डी सिंह पूरी तरह से पटनाइट्स हैं। अपनी स्कूली शिक्षा से लेकर चिकित्सकीय सेवा प्रदान करने तक का अवसर उन्हें पटना ने ही दिया है। सेंट माइकल स्कूल, दीघा से 1969 में मैट्रिक पास करने वाले जे.डी. सिंह अपने विद्यालय के कुशाग्र विद्यार्थी थे। स्कूल का कड़ा अनुशासन एंव उसके टूटने पर मिलने वाले कठोर दंड उनके बाल सुलभ मन को बार-बार शरारत न करने को बाध्य करता था। शरारत नहीं, तो फिर मन सिर्फ पढ़ाई की ओर। पुलिस अधिकारी पिता के बेटे जे.डी सिंह एक बार अत्यंत छोटी उम्र में बीमार पड़ने पर पिता के साथ डाक्टर के पास गये। बचपन की धुंधली यादों में उस डाक्टर का चेहरा तो उन्हें याद है परन्तु नाम भूल गये हैं। उसी चेहरे को याद कर वे बताते हैं कि मैंने भी डाक्टर साहब को देखकर बड़े होकर डाक्टर बनने का सपना देखा। मैंने सोचा कि मैं भी इन्हीं की तरह डाक्टर बनूंगा। पुलिस वाले के बेटे ने आखिरकार अपनी चाहत को हकीकत बना डाला।

पटना मेडिकल अस्पताल से 1972-83 में एस.एस जेनरल सर्जरी की पढ़ाई कर के वे एक चिकित्सक बन गये। वे कहते हैं, “वह दौर डाक्टर, इंजनियर इत्यादि बनने का था। तब पुलिस विभाग या लाल,पीली बत्तियां कोई आकर्षण का विषय नहीं थी। ग्लैमर फील्ड डाक्टर बनना था। मुझे खुशी थी कि मैंने जो चाहा वह पाया।”

यूपीएससी (सीडीएस) की चयन प्रणाली के तहत साढ़े चार सालों तक वे जमालपुर में पदस्थापित रहें। परन्तु वहां अपना दायरा निश्चित होने की वजह से उन्हें संतुष्टि नहीं मिलती थी। अत: उन्होंने वहां से त्याग पत्र देकर बिहार सरकार में अपना योगदान दिया। आज वे एन.एम.सी.एच.में कन्सलटेंट लेप्रोस्कोपिक एवं जेनरल सर्जन के पद पर बने हुये हैं। उनके अनुसार रेलवे में वे बंधा हुया महसूस करते थे। वहां सिर्फ रेलवे कर्मचारियों को ही वे अपनी सेवा दे सकते थे। आज उन्हें खुशी है कि वे यहां एक गरीब की रोग मुक्ति में भी सहायक   हैं।

पत्नी वकील हैं, परन्तु डाक्टर पति की व्यवस्तता, घर में बच्चों एवं वृद्ध सास-ससुर की देखभाल ने उन्हें पूरी तरह से एक गृहिणी बना दिया है। हालांकि अपनी पत्नी के इस समर्पण को वह सिरे से महसूस करते हैं, और उन्हें इस बात का अफसोस है कि आज भी महिलाओं को काफी त्याग करना पड़ता है। डा. साहब का एक पुत्र असम से मेडिकल की पढ़ाई कर रहा है, एक पुत्री जेएनयू में और दूसरी दिल्ली में मैनेजमेंट की पढ़ाई कर रही है। उन्हें सर्वाधिक खुशी इस बात की है कि अभी भी उनके माता-पिता का आर्शीवाद उनके सिर पर बना हुआ है, तथा वे पूरी तरह से स्वस्थ्य हैं।

एक व्यक्ति बिना चिकित्सक के पास जाये कितना स्वस्थ्य रह सकता है, के सवाल पर डा. जे.डी सिंह कहते हैं, “यदि व्यक्ति प्राकृतिक नियमों का पालन करे, प्रकृति से छेड़छाड़ न करे तो उसे डाक्टर के पास कभी जाने की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी।” साथ ही उनका कहना है कि एड्स, कैंसर इत्यादि जैसी असाध्य बीमारियां किसी व्यक्ति को पकड़ लेती हैं तो उसे बचाने में हम डाक्टर भी असमर्थ हैं।

वर्तमान परिस्थितियों पर उनका मानना है कि आज व्यक्ति धन तो बहुत कमा रहा है, परन्तु स्वास्थ्य का निरंतर ह्रास हो रहा है। पहले स्थितियां विपरित थी। लोगों के पास धन बहुत नहीं थे, परन्तु स्वस्थ्य शरीर ही उनकी सबसे बड़ी पूंजी थी।

2 COMMENTS

  1. Hé c’est un grand poteau. Est-ce que je peux employer une partie là-dessus sur mon emplacement ? Je naturellement lierais à votre emplacement ainsi les gens pourraient lire le plein article s’ils voulaient à. Remercie l’une ou l’autre manière.

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