मंजिल का सफ़र (कविता )

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–  धर्मवीर कुमार          

मंजिल का सफ़र कतई आसान न था, 
क्योंकिं मुझ पर कोई भी मेहरबान न था.
रास्ते में छोटे- बड़े अवरोध भी मिले,
 सच कहता हूँ  हरगिज परेशान न था. 

खुश हूं वहीं, जो मिला उसी को ‘मंजिल’ समझकर ,
जहाँ बैचेन हैं सभी ‘मंजिल’ से आगे भी निकलकर . 

 गिनता नहीं दुखों को जिसे देखा है हमने,
आखिर खुशियों को गिनने से फुरसत भी तो रहे. 
मिलता नहीं उन्हें अपने सिवा कोई,
 जिससे उन्हें कोई भी शिकायत नहीं रहे. 

रोते हैं वे यह सोचकर जिन्दगी की दौर में , 
बहुतों से वे बहुत ही पीछे रह गए.
खुश रहतें हैं हम  हमेशा यह सोच- सोच कर, 
कि कल जहाँ थे उससे आज, हम आगे निकल गए. 

गर उनके लिए खुशियों में ख़ुशी ढूँढना मुश्किल बना रहा,
मेरे लिए भी दुखों में ख़ुशी ढूँढना आसान न था. 
मंजिल का सफ़र कतई आसान न था, 
क्योंकि मुझ पर कोई भी मेहरबान न था.

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सदियों से इंसान बेहतरी की तलाश में आगे बढ़ता जा रहा है, तमाम तंत्रों का निर्माण इस बेहतरी के लिए किया गया है। लेकिन कभी-कभी इंसान के हाथों में केंद्रित तंत्र या तो साध्य बन जाता है या व्यक्तिगत मनोइच्छा की पूर्ति का साधन। आकाशीय लोक और इसके इर्द गिर्द बुनी गई अवधाराणाओं का क्रमश: विकास का उदेश्य इंसान के कारवां को आगे बढ़ाना है। हम ज्ञान और विज्ञान की सभी शाखाओं का इस्तेमाल करते हुये उन कांटों को देखने और चुनने का प्रयास करने जा रहे हैं, जो किसी न किसी रूप में इंसानियत के पग में चुभती रही है...यकीनन कुछ कांटे तो हम निकाल ही लेंगे।

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