लागा चुनरी में दाग….झनक,झनक तोरी बाजी पायलिया

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आशुतोष कुमार पांडेय

तुम हंसती हो तो मस्ताना कमल लगती हो। मीर का शेर,गालिब की गजल लगती हो। मन्ना डे । गायकी का एक ऐसा नाम जिनके सुर मदहोशी की शमां बांध देते थे। जिनकी कशिश भरी आवाज में वह क्लासिकल टैक्सचर होता था जो लोगों को बांधे रखता था। आज भी वह गाना…जिसे कोई भी गाने से पहले दस बार सोचता है। लागा चुनरी में दाग। इस गाने को आज भी कोई गायक गाने से पहले यह कहना नहीं भूलता कि मैं गा तो रहा हूं….लेकिन कोई गलती हो तो श्रोता क्षमा करेंगे।

  मुजफ्फरपुर की धरती ने मन्ना डे की 93वीं जन्म दिवस को सेलिब्रेट किया। सांस्कृतिक संस्था हरीतिमा द्वारा संगीत संध्या सह विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया। जहां मन्ना दा की मधुर आवाजों का संगीत एक बार फिर जीवंत हो उठा। एक ऐसा संगीत और गीत का भंडार जिसे समेटने के लिए संगीत के सागर जैसे दिल की आवश्यक्ता है। कार्यक्रम में आए कई वक्ताओं ने कहा कि आज की वर्तमान संगीत और गीत के बोल जहां संगीत से दूर करते जा रहे हैं वहीं पुराने संगीत में आज भी मनुष्यता की मीठास है। वैसे लता जी से लेकर पंडीत विश्वमोहन भट्ट, आशा ताई और देश वे करोड़ों श्रोता जो आज भी मन्ना डे को कभी भूले नहीं। उनकी आवाज का जादू आज भी किसी वीसीडी और साउंड बाक्स में सुनाई देने पर कई श्रोताओं के कदम रुक जाते हैं।

 कार्यक्रम में शामिल शहर के गायकों ने जिसमें भरत भूषण ने कौन आया मेरे मन के द्वारे..विनय कुमार मुन्ना ने ए.. भाई जरा देख के चलो गाकर श्रोताओं का मन मोह लिया।

 मन्ना डे के गाये गीत आज भी जीवंतता के पर्याय बनेहुए हैं। जिसमें प्राकृतिक सौंदर्य के साथ विरह वेदना की वह तड़प है जिसे आज भी कोई गायक पाने के लिए संघर्षरत रहता है। मन्ना डे के जन्म दिन पर आयोजित इस कार्यक्रम  में मुजफ्फरपुर के कई बुद्धिजीवी,संस्कृतकर्मी,पत्रकार और समाजसेवी शामिल हुए।

        ( लेखक आशुतोष टीवी पत्रकारिता से जुड़े हैं।)

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सदियों से इंसान बेहतरी की तलाश में आगे बढ़ता जा रहा है, तमाम तंत्रों का निर्माण इस बेहतरी के लिए किया गया है। लेकिन कभी-कभी इंसान के हाथों में केंद्रित तंत्र या तो साध्य बन जाता है या व्यक्तिगत मनोइच्छा की पूर्ति का साधन। आकाशीय लोक और इसके इर्द गिर्द बुनी गई अवधाराणाओं का क्रमश: विकास का उदेश्य इंसान के कारवां को आगे बढ़ाना है। हम ज्ञान और विज्ञान की सभी शाखाओं का इस्तेमाल करते हुये उन कांटों को देखने और चुनने का प्रयास करने जा रहे हैं, जो किसी न किसी रूप में इंसानियत के पग में चुभती रही है...यकीनन कुछ कांटे तो हम निकाल ही लेंगे।

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