आंसू से पत्र लिखा हूं …(कविता)

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अनंत//

आंसू से पत्र लिखा हूं

प्रियवर तुम्हें पढने को

गीले कागज पर लिखे शब्दों क़ो
मन की आखों से देख-देख
दिल की आखों से पढ़ना तुम,
मन मन्दिर के दरवाजे को
चहु ओर खोल देना तुम
पत्र पढ़कर पुलकित होना
अपनी मुस्कान बिखेरना तुम,
जब भी उदास देखता तुमको
झर झर आंसू टपके अंखियन से
मोल समझो इन असुअन की
आंसू नहीं ये मोती हैं
चुन चुन कर इन मोतियों को
बेशकीमती माला बनाना तुम,
इस माले को गले में डालकर
अपने ह्रदय स्थल में झाकना तुम,
उस ह्रदय में बैठे शख्स को
पह्चानना तुम,
वो शख्स कोई और नहीं
सिर्फ तुम्हारा सखा होगा
अपने सखा को गले लगाकर
सुखमय जीवन का नवरंभ करो ।।

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सदियों से इंसान बेहतरी की तलाश में आगे बढ़ता जा रहा है, तमाम तंत्रों का निर्माण इस बेहतरी के लिए किया गया है। लेकिन कभी-कभी इंसान के हाथों में केंद्रित तंत्र या तो साध्य बन जाता है या व्यक्तिगत मनोइच्छा की पूर्ति का साधन। आकाशीय लोक और इसके इर्द गिर्द बुनी गई अवधाराणाओं का क्रमश: विकास का उदेश्य इंसान के कारवां को आगे बढ़ाना है। हम ज्ञान और विज्ञान की सभी शाखाओं का इस्तेमाल करते हुये उन कांटों को देखने और चुनने का प्रयास करने जा रहे हैं, जो किसी न किसी रूप में इंसानियत के पग में चुभती रही है...यकीनन कुछ कांटे तो हम निकाल ही लेंगे।

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