इच्छा मृत्यु : किसकी इच्छा…

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एक बूढ़ा लकड़हारा रोज जंगल में लकड़ियां काटता और भारी गट्ठर सिर पर रखकर घर की ओर जाता । अपने रोज रोज के इस मेहनत के  काम से उसका दिल भर आया और उसने नित्य की भांति उस दिन भी लकड़ियों का गट्ठर बनाया तथा उसे उठाने के क्रम में काफी तकलीफ का अनुभव कर बुदबुदाया , हे ईश्वर ! मुझे उठा ले । ईश्वर ने उसकी बाते सुनी , प्रकट होकर उससे साथ चलने का आग्रह किया । हतप्रभ लकड़हारे ने सारा माजरा समझ चतुराई से जवाब दिया ,प्रभु मैंने तो लकड़ियों के इस गट्ठर को उठाने के लिये आपको याद किया था । अभी तो जीवन में मुझे बहुत कुछ करना है।

इस कहानी के माध्यम से यह बताने का प्रयास है कि यदि किसी से उसके जीवन के अंत की बात की जाये तो उत्तर नकारात्मक ही मिलेगा।

अत: अरुणा शानबाग या उनकी तरह के किसी भी दूसरे लोगों की इच्छा मृत्यु की याचिका में किसकी इच्छा शामिल है। किसकी इच्छा से यह मृत्यु , जब पीड़ित अपनी इच्छा तक व्यक्त नही कर सकता तो फिर कैसी इच्छा मृत्यु ? एक बेजान , बेआवाज और बेसुध अबला के लिये इच्छा मृत्यु के नाम पर मौत की मांग क्यों ?

मंदिर में भगवान किसी चढ़ावे की इच्छा व्यक्त नहीं करते , गिरिजा घरों में शूली पर लटके जीजस कभी वहां साफ सफाई का आग्रह नहीं करते , मस्जिद और गुरुद्वारों के चमचमाते फर्श एवं दीवारे तथा साज सज्जा में तो उपर वाले की मर्जी शामिल नहीं होती ,सब कुछ श्रद्धा एवं भक्ति पर निर्भर करता है। फिर अरुणा एवं उन जैसे दूसरे प्राणी भी तो ईश्वर का ही दूसरा रुप हैं। उनकी सेवा सुश्रुषा से पीछे हटकर उनके लिये मौत मांगना क्या अमानवीय नहीं है। अरुणा शानबाग एक नर्स थी ,सेवा जिसका परम धर्म था एक हादसे ( अस्पताल के वार्ड व्वाय ने अरुणा के साथ उसे गले में रस्सी से बांधकर उसके साथ बलात्कार किया था ,गले की रस्सी से उसके मस्तिष्क का आक्सीजन कुछ समय के लिये रुक गया था जिससे उसकी हालत अपाहिजों जैसी हो गयी ) ने अरुणा को मौत से भी बदतर जिंदगी जीने के लिये मजबूर कर दिया। अस्पताल के नर्सों की तपस्या और सेवा ने पिछले 37 वर्षों से उसे जीवन दिया है। शास्त्रों की माने तो आत्मा शरीर की अमानत है तथा वह इस सुंदर शरीर को छोड़कर जाना नहीं चाहती । इस प्रकार अरुणा का शरीर उसकी आत्मा के लिये आज भी महत्वपूर्ण है। फिर प्रकृति के इस नियम से छेड़छाड़  करने का प्रयास क्यों ?

अस्पताल की नर्सों ने अरुणा की एक कथित सहेली द्वारा दायर की गयी इच्छा मृत्यु की याचिका पर दुख जताया तथा न्यायालय के फैसले से उनमें राहत आ गयी ।अपनी खुशी व्यक्त करते हुये उनलोगों ने कहा कि जीवन और मृत्यु तो ईश्वर के हाथ में है , हम कौन होते हैं इनमें दखल देने वाले । हमें तो अत्यंत खुशी है कि अरुणा आज भी हमारे साथ है और आगे भी रहेगी । उनकी बातों से ऐसा लगा मानों उसका जाना भविष्य में उन्हें खालीपन से भर देगा । बहरहाल मामला इच्छामृत्यु शब्द के इस्तेमाल का है । क्या कोई भी व्यक्ति किसी के लिये इच्छा मृत्यु मांग सकता है, ब्रेन डेथ की स्थिति में उस व्यक्ति की इच्छा कहा परिभाषित हो रही है। अहिंसा के इस देश में एवं परिस्थितियों के संदर्भ में इच्छा मृत्यु जैसे शब्द की सार्थकता कहाँ है ?

11 COMMENTS

  1. अनिता जी, कोई भी आदमी 37 साल तक घुट-घुट कर जीना चाहता है या नहीं, यह सवाल पूछना ही मुझे अमानवीय लग रहा है। गांधी जी ने एक बार एक बछड़े को इंजेक्शन देकर मारने का आदेश दिया था और इसे दया मरण कहा गया था। और होना भी यही चाहिए। जब ये नर्स खुद कुछ नहीं बता सकतीं तो उन्हें हम क्यों और तड़पा-तड़पा कर जिंदा रखना चाहते हैं। मैं इस बात से सहमत हूं कि कोई भी जीव मरना नहीं चाहता। दर्द को महसूस करने में 37 साल अगर कोई गुजार चुका हो तो हम उसे क्यों हर दिन मारना चाहते हैं। अगर हम किसी को कुछ ऐसे मारें कि पहले एक अंगुली काटें, फिर दूसरी और इस तरह से महीनों तक एक एक अंग काटते रहें और अंत में एक दिन तो वह मर ही जाएगा। हां, हमें उस नर्स की सेवा में कोई कमी नहीं करनी चाहिए लेकिन इतने वर्षों तक मौत से भी बदतर हालत में जिंदा रखना बिल्कुल उचित नहीं अगर कोई डाक्टर उसे ठीक नहीं कर सकता। और जहां तक ईश्वर की बात है तो जब जन्म और मृत्य उसके हाथ में हैं तो ये विचार भी उसी के हैं जिन्हें मैं, आप या कोई और बता रहे हैं। ईश्वर ही क्यों नहीं ठीक कर देता या बचा लेता जबकि वह अजामिल के नारायण कहने पर उसे मुक्ति प्रदान कर देता है और सब जानते हैं कि अजामिल ने अपने बेटे को पुकारा था।

  2. चंदन जी ,
    Medical Ethics में यह अपेक्षित है कि डाक्टर मरीज को तब तक जीवित रखने की कोशिश करे जब तक संभव है। भविष्य में वह ठीक होगा या नहीं यह नहीं सोचना है। साथ ही मेडिकल साइंस में रोज नये खोज हो रहे हैं ,हो सकता है कोई रास्ता निकल आये । यदि नहीं , तब भी इच्छा मृत्यु के माध्यम से हत्याओं का सिलसिसा जारी होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता और जो अहम बात है कि किस किस को मारेंगे दुखियारों से भरी पड़ी है यह दुनिया।

  3. अनिता जी,
    नैतिकताएं तो हर क्षेत्र की अलग-अलग हैं और कोई इस पर अपना मालिकाना हक तो जता नहीं सकता लेकिन सब कुछ सापेक्ष ही होता है। चलिए मान लेते हैं कि भविष्य की आशा में हर दुखियारे को कालेपन की सजा दे दें। भगतसिंह ने भी कहा था कि फांसी या शीघ्र मौत से बहुत कष्टकारी और मुश्किल है आजीवन कारावास या लम्बी दुखदायी जिंदगी(ड्रीमलैण्ड की भूमिका)। जब बात यह आती है कि किसी के मरने पर हमारा वश चलता है या नहीं तब हम याद रखें कि सरकार या कोई भी कानून हम पर क्यों लागू होना चाहिए, इसे हमारी अपनी इच्छा पर छोड़ देना चहिए। मैंने अपनी बातों के साथ स्वतंत्रता आंदोलन के दोनों महान नायकों गांधीजी और भगतसिंह के विचार ऐसे मुद्दे पर पेश किए हैं। मैं भी उस नर्स के दोस्त की दोस्ती का सम्मान करता हूं। ऐसे ही लोगों को तो होना चाहिए, सेवा करने के लिए अपना सब कुछ त्याग करने वाले लोग वाकई महान होते हैं।

  4. Anita ji I respect court verdict . Court is correct that birth and death is god juridiction. Let Aruna atleast see the world how good nurses taking care of her. In our world we doent have only bad person who made her life miserable but also good person those who are taking care of Aruna.

  5. अनिता जी, कालेपानी की जगह कालेपन लिख दिया था। उसे काला पानी समझा जाय।

  6. i liked the article.
    it should b praised.i dont have such depth info on this topic like u bt how far i know LIFE aruna’s life should’nt b judged by any court.
    it should b judged by humanity and mankind.
    if we want justice for that lady,we have to understand her pain of silence.
    wo 37 years se chup hai aur saayad hm bhi lekin ab nahiiiiii……..

  7. Anita, no one wants to die. It is true. When the Pope John Paul II was sick in the hospital in Rome, he expressed his desire to be kept alive even chemically when he remains in comma. So he was kept alive until he stopped breathing himself. A religious head of such a large group whom the public worshiped as next to God, did not want to die. What to say about common persons? I, therefore , approve your idea that no one likes do die on his/her own.

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