जग से जीते मौत से हारे जगजीत

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गजल गायकी को नये आयाम तक पहुचांने वाले जगजीत सिंह ने अपनी मखमली आवाज से जग को तो जीत लिया पर मौत से हार गये । पिछले चार दशकों से लाखों करोड़ों संगीत प्रेमियों के दिलों पर राज करने वाले 70 वर्षीय जगजीत सिंह को विगत 23 सितंबर को ब्रेन हैमरेज की वजह से मुबंई के लीलावती अस्पताल में भर्ती करवाया गया था । इस दरम्यान उनकी हालत नहीं सुधरी और वे लागातार  कोमा में ही रहें । अंततः 10 अक्टूबर 11 को सुबह 8.30 बजे उन्होंने अपनी आखिरी सांस ली ।

राजस्थान के गंगानगर में जन्में इस सिक्ख नवयुवक ने बंबई (आज की मुबंई) को अपनी कर्मभूमि बनाया । इस मायानगरी ने उन्हें दौलत शौहरत सब कुछ यहीं दिया यहीं वापस भी ले लिया । कहते हैं व्यक्ति खाली हाथ आता है और खाली ही जाता है पर अपने पीछे भरा-पुरा परिवार छोड़ जाता है । पर इनके साथ ऐसा नहीं हुआ। जगजीत सिंह के घर भी खुशियों ने दस्तक दिया था । 1969 में बंगाली बाला चित्रा सिंह के साथ विवाह बंधन में बंधकर उन्हें अत्यंत खुशी हुयी थी । चूंकि चित्रा भी एक गजल गायिका थी अतः उनके पेशेवर तालमेल की बजह से वे बुलंदियों को छू रहे थे । उनके जीवन में परिपूर्णता आयी जब उनके घर विवेक का जन्म हुआ। उनकी पत्नी के पहली शादी से एक बेटी मोनिका थी । इस प्रकार दो बच्चों के बीच एक खुशहाल परिवार बन गया था उनका । पर नियती को कुछ और मंजूर था । उसे  किसी की नजर लग गयी और 1990 में उनका पुत्र विवेक एक कार दुर्घटना का शिकार हो गया । 18 वर्षीय जवान बेटे की मौत ने उन्हें तोड़ दिया। यह उनके जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी थी । जीवन ठहरता नहीं पर तिल तिल कर मरने के लिये  विवश अवश्य कर देता है । वही चित्रा के साथ भी हुआ। उन्होंने गायिकी पूरी तरह से छोड़ दी । दर्द को अपना सहारा बना जगजीत सिंह ने और भी दिलकश आवाज में गाना जारी रखा । दर्द में डूबे जगजीत सिंह की आवाज अब गले से नहीं दिल से निकलती थी । कहते हैं चिट्ठी ना कोई संदेश जाने वो कौन सा देश जहां तुम चले गये , गीत उनके बेटे को श्रधांजलि थी । जिंदगी संभलती नहीं कि दर्द आ धमकता । जिंदगी की गाड़ी पटरी पर लौटती उससे पहले ही चित्रा की पहली शादी से हुयी बेटी मोनिका ने 2009 में अपने मुबंई (बांद्रा) स्थित घर में आत्महत्या कर ली । इस बड़े हादसे ने तो रही सही कसर भी पूरी कर दी । पूरा परिवार बिखर गया । तिनका तिनका बिखर गया घर । उपर वाला मानों दुःखों को सहने की उनकी शक्ति को आजमां रहा था । । इस हादसे से नहीं संभल सके जगजीत सिंह।  जीवन को फिर भी व्यस्त रखकर जीना चाहा पर नियती को कुछ और ही मंजूर था । उसने तो जैसे उनकी सारी परीक्षा ले ली थी और अपने पास बुलाने के लिये सही समय का इंतजार कर रहा था ।

ये दौलत भी ले लो ये शौहरत भी ले लो भले छीन लो मुझ से मेरी जवानी मगर

मुझको लौटा दो बचपन का सावन वो कागज की कश्ती वो बारिश का पानी …

सुदर्शन फाकिर के इन शब्दों को जब जगजीत सिंह की दिलकश आवाज मिली तो हर कोई हर कीमत पर बचपन को वापस पाना चाहता था। उसे यह अहसास होने लगा कि उसने अपना सबसे अच्छा समय खो दिया है । कभी न लौट कर आने वाला बचपन ।

 आमतौर पर हिंदी सिनेमा के साथ जुड़े लोगों की गायिकी ही सफल मानी जाती है पर जगजीत सिंह ने  अपनी गजलों को एक अलग पहचान दी । लोगों ने गायक को ज्यादा और फिल्मों को कम जाना । गजल यानी जगजीत सिंह । हर उम्र के लोगों के हरदिल अजीज़ थे जगजीत सिंह । क्या आम क्या खास सभी एक सुर में यह मानते थे कि जगजीत सिंह को सुनकर दिल को एक सुकून मिलता है मन को शांति मिलती है। एक खास वर्ग की पहचान और शौक माना जाने वाला गजल आज आम लोगों के बीच गाया और गुनगुनाया जा रहा था । गज़ल मुख्य धारा में आयी जगजीत सिंह की पहचान बनकर। करोड़ों लोगों के दिलों पर राज करने वाले जगजीत सिंह सशरीर भले हमारे बीच न हों पर उनकी अमर गायकी सदा राज करती रहेगी । उनके होठो से छुए गीत सदा अमर रहेंगे।

कभी खामोश बैठोगे , कभी कुछ गुनगुनाओगे ,

मैं उतना याद आउंगा , मुझे जितना भुलाओगे …

7 COMMENTS

  1. चिट्ठी ना कोई संदेश जाने वो कौन सा देश जहां तुम चले गये

  2. Aap ka lekh, Jagjit Singh G ki ek sachchi shardhanjali hai.
    Saath Saath ek karwi sachchai hai jindigi ki.
    “Chaak jigar ke see laite hai … Jaise bhi ho Ji laite hai”

  3. कहते हैं व्यक्ति खाली हाथ आता है और खाली ही जाता है पर अपने पीछे भरा-पुरा परिवार छोड़ जाता है ।

  4. जगजीत मेरे प्रिय गायक हैं। उन पर आपका लिखा लेख बेहतरीन है। सुबह से हीउनकी गायी गालिब की ग़ज़लें सुन रहा हूं

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