दंगों में मीडिया को बदलनी होगी अपनी भूमिका !

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संतोष सिंह, पत्रकार।

पत्रकारिता से जुड़े हुए लगभग 15 वर्ष होने को है। मैं खुशकिस्मत हूं कि मैंने पत्रकारिता की शुरुआत सबसे निचली इकाई प्रंखड और थाने से किया है। थाने में प्राथमिकी दर्ज कराने में क्या परेशानी होती है। बीडीओ इंदिरा अवास के चयण में क्या करते हैं। मुखिया, प्रखंड प्रमुख की क्या भूमिका है, विधायक क्या करते हैं। कहने का यह मतलब है कि मैंने पत्रकारिता की शुरुआत अंतिम व्यक्ति से किया और आज सत्ता के सर्वोच्च शिखर पर हो रहे खेल को देख रहा हूं। ऐसा सौभाग्य बहुत ही कम लोगों को मिलता है, जो बीडीओ से मुख्यसचिव तक, दारोगा से डीजीपी तक और मुखिया से मुख्यमंत्री तक की कार्यशैली को इतने करीब से देख पाते। इस दौरान मुझे 50 से अधिक छोटे और बड़े सम्प्रदायिक दंगों पर रिपोर्टिंग करने का मौंका भी मिला। कई बार जान जाते जाते बची है। दंगे के पीछे के खेल को देखने और समझने का काफी करीब से मौंका मिला है। प्रशासन दंगाईयों से कैसे निपटते है, फिर भाजपा और हिन्दू संगठन के साथ साथ मुस्लिम संगठन इस दौरान कैसे काम करते हैं, फिर मीडिया की क्या भूमिका रहती है, सब कुछ देखने को मिला है। हाल के दिनों में अचानक पूरे देश में फिर से दंगे भड़कने लगे हैं। बिहार में ही नवादा खगड़िया, बेतिया सहित कई जिलों में दंगे हुए हैं और कभी भी कहीं भी फैल जाने की स्थिति बनती जा रही है। एक पत्रकार के रुप में मेरा क्या अनुभव रहा है और कैसे दंगे को रोका जा सकता है इसे लेकर मेरे कुछ ख्यालात हैं जो आपसे से शेयर कर रहा हूं।

दंगा रोकना है तो तुष्टीकरण की नीति पर रोक लगाना होगा———मैंने साम्प्रदायिक रुप से काफी संवेदनशील दरभंगा में पांच वर्षों तक काम किया हैं, इस दौरान कई बड़े और छोटे दंगे हुए हैं और एक दो बार तो स्थिति इतनी भयावह हो गयी थी कि हजारों लोग मारे जा सकते थे लेकिन प्रशासन की सक्रियता से दंगा भड़क नहीं सका। लेकिन मुझे लगा कि कानून के अनुसार काम हो तो दंगे की स्थिति नहे बनेगी । और अब पहले वाली स्थिति भी नहीं है, जैसे जैसे लोगों की संमृद्धि बढ रही है राष्ट्रवाद की भावना प्रबंल होती जा रही है। और फिर नरेन्द्र मोदी जैसा नायक सामने है, बहुसंख्यक समुदाय को अब दबा कर अब दंगा को नहीं रोक सकते है। सरकार और तंत्र को समझना होगा और इसके लिए सबसे बेहतर तरीका है कानून अपना काम करे। आजादी के साथ ही गांधी जी की पहल पर गौ हत्या पर एक कानून बना लेकिन उस कानून पर आज भी अमल नहीं हो रहा है। खुलेआम गायों की हत्या हो रही है और प्रशासन मूक दर्शक बना रहता है। प्रशासन इसको कठोरता से लागू करे । दूसरी बात जिस पर अक्सर विवाद होता है, मूर्ति विसर्जन के दौरान मस्जिद होकर या फिर मुस्लिम बस्ती होकर जुलुस जा रहा है तो उस पर हमला होना या फिर रोकना। तनाव का सबसे बड़ा कारण यही देखा गया है कानून क्या कहता है प्रशासन वो करे अगर मूर्ति विसर्जन गलत है तो प्रशासन कठोर कारवाई करे और अगर रोकना गलत है तो रोकने वालों के खिलाफ भी कड़ी कारवाई होनी चाहिए। क्यों कि इस तरह का उपद्रव फैलाने वाले लोगों की संख्या काफी कम होती है उनको चिंहित कर कठोर कारवाई कर दी जाये तो फिर कभी परेशानी नहीं होगी। लेकिन होता क्या है प्रशासन मामले को खींचता है और सरकार तुष्टीकरण को लेकर प्रशासन पर दबाव बनाती है फिर उस पर प्रतिक्रिया होती है और मामला बढता है। मुझे लगता है कि प्रशासन एक तरफा कारवाई ना करके दोनों ओर समान कारवाई करे तो फिर कभी तनाव नहीं होगा। वही सम्प्रदायिक भावना भड़का कर राजनीति करने वाली पार्टियों की दुकान भी बंद हो जायेगी।

विवादास्पद जगह को चिहिंत कर उसे समाप्त करे———-एक वाकया बताता हूं, दरभंगा में एक हिन्दू संगठन के नेता महोदय सड़क की जमीन पर कब्जा जमाने के लिए दरभंगा लहेरियासराय मुख्यमार्ग पर शंकर जी की प्रतिमा लगा दिये। पूरे दिन उस रास्ते से बस ट्रक धूल उड़ाते जाते रहता है, मूर्ति पूरी तरह से धूल से भरा रहता है, एक बार मुहर्रम का जुलुस उस होकर जा रहा था, किसी ने अपवाह फैला दिया कि जुलुस में शामिल लोगों ने शंकर जी की नाक काट दी है फिर क्या था सुबह होते होते हजारों की संख्या में हिन्दू और मु्स्लमान तलवार लेकर आमने सामने हो गये। सुबह का वक्त था मैं भी भागा भागा घटना स्थल पर पहुंचा। भीड़ का रुप देख कर रोगटे खड़े हो गये, एक बार हजारों लोग जय श्री राम का नारा लगा रहा हैं तो दूसरी ओर से अल्लाह-हो-अकबर। बीच में एसपी अपने बॉर्डीगार्ड के साथ आर्म्स लहरा रहे हैं। हमलोग भी दोनों समुदायों के बीच में फंसी पुलिस के साथ देख रहे थे। फिर किसी तरह बढ़कर भीड़ के पास पहुंचा तो पता चला कि मुस्लिम लोग शंकर जी की नाक काट दिये हैं। हैरान होकर सोचा कि मुझे भी देखना चाहिए, जब मूर्ति के पास पहुंचा तो शंकर जी नाक पूरी तरह से सुरक्षित थी। मैंने उसका भिजुउल बनाया और भागते हुए हिन्दूओं की भीड़ की ओऱ पहुंचा। उन लोगों को भिजुउल दिखाया तो वे लोग थोड़े शांत हुए। फिर एसपी को दिखाया, उसके बाद पांच लोगों को शंकर की मूर्ति के पास ले जाया गया। मूर्ति देख कर लोगों का आक्रोश शांत हुआ और फिर धीरे धीरे भीड़ हटने लगी। सीधे समझा जाये तो एक बड़ा हदसा टल गया। हलाकि इस अफवाह के कारण कई दिनों तक महौल अंशात रहा। कहने का यह मतलब है कि मशरुम की तरह जहां मन करे लोग धार्मिक स्थल बना देते हैं, इस पर रोक लगनी चाहिए और इसके लिए कड़े कानून बनने चाहिए।

लड़कियों के साथ छेड़छाड़ एक बड़ा कारण बनकर सामने आया है———इन दिनों दो समुदाय के बीच लड़कियों को लेकर काफी विवाद हो रहे हैं और इसके कारण हाल के दिनो में कई दंगे भड़के हैं। मुजफ्फरनगर में भड़के दंगे के पीछे भी यही कारण रहा है। इस मामले में भी प्रशासन का रवैया ठीक नहीं रहता है। जब भी इस तरह की शिकायत लेकर परिजन थाने पहुंचते हैं, तो पुलिस उसको गम्भीरता से कभी नहीं लेती है, इस पर भी सोचने की जरुरत है। चाहे लड़की 18 वर्ष के अधिक उम्र की ही क्यों ना हो हमारे यहां कानून है, शादी के लिए धर्म परिवर्तन नहीं करा सकते और यह गलत है। लेकिन हो क्या रहा है धड़ल्ले से लोग धर्म परिवर्तन करके शादी कर रहे हैं, इसको रोकना होगा क्यों कि हमारे यहां मैरेज एक्ट में भी इस शादी को मान्यता नहीं हैं। वही धर्म परिवर्तन को लेकर भी कानून बने हुए हैं. उसका शख्ती से पालन होना चाहिए। आज उड़ीसा हो या फिर झारखंड सहित कई और राज्य है जहां मशीनरी इस काम में लगी हुई है। काफी संख्या में लोगों का धर्म परिवर्तन कराया जा रहा है। इसको लेकर कई बड़ी घटनाए घट चुकी हैं क्यों नहीं इस तरह के धर्म परिवर्तन पर कानून के अनुसार प्रशासन करवाई करती है।

संविधान की मूल भावनाओं के साथ खेलवाड़ क्यों—— संविधान ने देश के सभी नागरिक को एक समान अधिकार दिया है फिर धर्म के आधार पर आप कानून क्यों बना रहे, इस पर सोचने की जरुरत है। महिलाओं के लिए अलग कानून क्यों इस तरह के तुष्टिकरण से उस धर्म के लोगों को ही नुकसान हो रहा है। इस पर सरकार को गम्भीरता से विचार करने की जरुरत है ,ये भी एक वजह है जो दूसरे संगठन के लोगों की भावना भड़काने में मदद करती है।

दंगों के दौरान समाज के प्रबुद्ध लोगों को साथ जोड़िए—— हाल के दिनों में बिहार में जितने भी दंगे हुए हैं उसमें एक बात सामने आई है कि युवा अफसरों का जनता से सीधे संवाद स्थापित करने से परहेज करने से परहेज करना। जिसके कारण अपराधी और बवाली तत्वों को उपद्रव फैलाने का मौंका मिल रहा है। मेरा खुद का अनुभव रहा है कि इस तरह के तनाव के दौरान दोनों समाज के प्रबुद्ध लोगों से बात करने से समस्या का समाधान तुंरत हो जाता है। इसलिए प्रशासन को हमेशा ऐसे लोगों के सम्पर्क में रहना चाहिए उन्हें सम्मान देना चाहिए क्यों कि अभी भी हमारे समाज में 95 प्रतिशत लोग शांति प्रिय हैं, कुछ ही लोग इन सब बातों में रहते हैं।

मीडिया की भूमिका—–मुझे लगता है कि इस तरह के मामले में मीडिया जिस ऐथिक्स की बात करती है वो कहीं ज्यादा खतरनाक है और अब तो स्थिति और भी खरनाक हो गयी है। मीडिया ने तय कर रखा है कि दंगे जैसी खबरों को तब्बजो नहीं देगी। क्या इससे दंगे होने बंद हो गये ये कहना कि खबर नहीं छापने से दंगो का प्रभाव सीमित रह जाता है, मुझे लगता है मीडिया के सेंसर के कारण स्थिति और भी बिगड़ रही है लोग अफवाह फैलाते हैं। अब तो सोशल मीडिया और मोबाईल का जमाना आ गया है और इसका जमकर दुरुपयोग हो रहा है। मीडिया को अपनी भूमिका बदलनी चाहिए दंगे की खबर को प्रमुखता से छापनी चाहिए, प्रशासन के नकारापन को उजागर करना चाहिए क्यों कि कहीं भी दंगे होते हैं उसकी सबसे बड़ी बजह प्रशासनिक अधिकारियों की लापरवाही होती है और ये बातें आम जन और सरकार के सामने नहीं आ पाती है। जिसके कारण प्रशासन पर भी दबाव नहीं रहता है खबर छापनी चाहिए और दिखानी भी चाहिए और जिसकी भी गलती हो उसे उजागर करना चाहिए। हमलोग लिखते और दिखाते हैं कि नहीं, सांमतो ने दलित बस्ती को उजाड़ा, बलात्कार किया। क्या इस खबर से दोनों वर्गों के बीच तनाव नहीं बढता है, लेकिन इस खबर के आने के बाद प्रशासन और सरकार हरकत में आती है और फिर दोषियों के खिलाफ कारवाई होती है। इसलिए दंगे की खबर पर खुलकर रिपोर्टिंग होनी चाहिए और प्रशासन नेता और सरकार की नीति पर खुलकर चर्चा होनी चाहिए इससे मुझे लगता है इस तरह के दंगे पर अंकुश लगेगा।

सरकार को अपनी नीति बदलनी होगी—–सरकार को भय दिखा कर राज करने की नीति को बदलना चाहिए अगर वो वाकई में चाहते है कि दंगा न हो, देश में अमन चैन बना रहे तो तुष्टीकरण को छोड़े। इससे किसी का भला नहीं होने वाला है और एक बात और आर्थिक उदारीकरण के बाद एक बड़ा वर्ग पैदा लिया है इस देश में जिसमें राष्ट्रवाद का जजबा पनप रहा है, उसके पास पैसा है अपनी सोच को थोपने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है यह प्रवृति हिन्दू आंतकवाद को बढ़ा सकता है। गम्भीरता से सोचने की जरुरत है इन लोगों के पास गोडसे और तिलक जैसे विचारक के विचार भी हैं। सरकार हल्के में ना ले अगर देश में अमन और शांति चाहते हैं तो कानून का राज चलने दें नहीं तो उग्र विचार वाले लोगों को रोकना मुश्किल हो जायेगा और इस तरह के विचार वाले लोगों की संख्या काफी तेजी से फैल रही है। वामपंथ हासिए पर जा रहा है, ऐसे में जमीनी स्तर पर इस तरह के उग्र विचारों का काउन्टर करने वाले लोगों की संख्या कम होती जा रही है, सोचने की जरुरत है नये सिरे से इस समस्या के समाधान पर।

अल्पसंख्यक को मुख्यधारा से जोड़ने की जरुरत है—- मेरा मानना है कि अभी भी भारत में हिन्दू और मुसलमान के बीच बहुत बड़ी खाई है। एक दूसरे के बारे में बहुत ही कम लोग जानते हैं, गांव से लेकर शहर तक रहने की जो परम्परा रही है वो भी एक दूसरे को जोड़ने में बाधक है। जरा गौर करें दोनों समुदाय कहीं भी एक साथ नहीं रहते हैं। दोनों अलग अलग हिस्से में रहते हैं। शहर में तो ऐसे ऐसे अपार्टमेंन्ट हैं जहां सिर्फ अल्पसंख्यक रहते है। पूरे पढाई के दौरान साथ पढ़ने वाले अल्पसंख्यक छात्र गिनती के मिले होंगे। पत्रकारिता में भी यही स्थिति है। देश की इतनी बड़ी अबादी कहां है किस काम में लगी है, मेरी समझ से परे हैं। मिलेंगे भी तो पंक्चर बनाने वाले, गांड़ी बनाने वाले, जूते बेचने वाले, ड्राइवर यही सब ज्यादा हैं। गरीबी, भुखमरी, अशिक्षा चरम पर है और इसे ही दूर करने की आवश्यकता है। धर्म के नाम पर संस्थान खुल रहे हैं, लेकिन उन संस्थानों का हाल जाकर देखिए। दूसरे लोग डोनेसन देकर पढ़ रहे हैं जबकि अल्पसंख्यक संस्थानों के लिए सरकार विशेष रियायत देती है। बिहार से प्रति वर्ष हजारों बच्चे महाराष्ट्र मदरसे में पढ़ने में जाते हैं, गरीबी की मार झेलते ये बच्चे भोजन की चाह में वहां जाते हैं। हकीकत भयावह है, फासले बहुत हैं, जरुरत है उन्हें पाटने की और एक दूसरे को समझने की। कभी देश में यह जुमला इस्तेमाल होता था कि हिन्दू और मुसलमान भारत की दो आंखें है पर समय के बदलाव और तुष्टिकरण की राजनीति ने इसे एक मिथक बना दिया है।

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सदियों से इंसान बेहतरी की तलाश में आगे बढ़ता जा रहा है, तमाम तंत्रों का निर्माण इस बेहतरी के लिए किया गया है। लेकिन कभी-कभी इंसान के हाथों में केंद्रित तंत्र या तो साध्य बन जाता है या व्यक्तिगत मनोइच्छा की पूर्ति का साधन। आकाशीय लोक और इसके इर्द गिर्द बुनी गई अवधाराणाओं का क्रमश: विकास का उदेश्य इंसान के कारवां को आगे बढ़ाना है। हम ज्ञान और विज्ञान की सभी शाखाओं का इस्तेमाल करते हुये उन कांटों को देखने और चुनने का प्रयास करने जा रहे हैं, जो किसी न किसी रूप में इंसानियत के पग में चुभती रही है...यकीनन कुछ कांटे तो हम निकाल ही लेंगे।

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