महिलाओं को कब मिलेगा अश्लील फब्तियों से छुटकारा ?

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देश में बहुत सारे छोटे-बड़े रेलवे स्टेशन हैं जहां महिलाओं के लिए अलग से टिकट कटवाने के लिए कोई काउंटर नहीं है। इन काउंटरों पर पुरुषों की लाईन में खड़े होकर उनके भद्दे द्विअर्थी संवादों (फब्तियों) मसलन, मिडिल लगा दो, बर्थ स्वंय कन्फर्म हो जाएगा के बीच टिकट कटवाना मजबूरी है। निजी कंपनियों की नौकरी का नियुक्ति पत्र प्राप्त होना और बधाईयों का सिलसिला शुरु, मैडम नौकरी मिल गई, मुंह मीठा करवाइये। सरकारी या प्राइवेट कोई भी हो, सिर्फ भीड़ भरी बस होनी चाहिये। महिलाओं की परेशानी वहीं से शुरु। धक्का-मुक्की के साथ फिर वही द्विअर्थी संवादों का सिलसिला जो दादा कोंडके की फिल्मों को भी पछाड़ दे। संवाद की अश्लीलता का अंदाजा बोलने वाले के मिजाज और उसकी विचित्र हंसी से आसानी से लगाया जा सकता है।

नब्बे डिग्री पर क्यूं खड़े हो, कैसे खड़े होते हैं आओ समझाता हूं। ये तमाम डायलॉग सीधे-सीधे महिलाओं को इंगित कर नहीं बोले जाते परन्तु पुरुषों की बहुलता एवं पुरुष प्रधान समाज में महिलाओं को अपना सिर शर्म से झुकाने पर आवश्य मजबूर कर देते हैं।

मैडम का उच्चरण मइडम करना, किसी भी वस्तु के आदान-प्रदान में महिलाओं के हाथों को छू लेना, अपने आप को बेचारा साबित करना, अपनी पत्नी को पागल और नासमझ बताना, बेतरतीब ढंग से खींसे निपोरना तथा महिलाओं के ना में भी हां है तथा हां तो हां है ही- ये कुछ टोटके पुरुषों को बिना किसी ट्रेनिंग स्कूल में दाखिला लिये ही प्राप्त हो जाते हैं।

महिला उत्पीड़न, महिलाओं के शोषण, महिलाओं की सुरक्षा या फिर महिलाओं की इज्जत, मामला कोई भी हो, कानून कितने भी बन जाये सामाजिक स्तर पर आज भी महिलाओं को अपनी प्रतिष्ठा को दाव पर रखकर ही घर से बाहर कदम रखना पड़ता है। पत्नियों को सीता सावित्री का दर्जा देने वाले पुरुष स्वंय रावण की भूमिका में विचरण करते मिल जाएंगे। राम और राम की मर्यादा का तो उन्हें भान भी नहीं होता।

प्रशासनिक महिला अधिकारी के साथ बदसलूकी, थाने में महिला के साथ पुलिसकर्मियों द्वारा बलात्कार, कालेज छात्रा के चेहरे पर तेजाब का फेंका जाना, खेल जगत में महिला खिलाड़ियों का यौन शोषण, शिक्षा जगत में पुरुष शिक्षकों द्वारा नाबालिग स्कूली छात्राओं का मानसिक एवं शारीरिक दोहन ,ये कुछ मामले उस समय अखबारों की सुर्खियां बनते हैं जब हजारों घटित घटनाओं में कोई वाक्या मर्यादा की देहरी लांघकर थाने एवं अदालतों तक पहुंचते हैं।

ईश्वर की भक्ति के नाम पर यदि भारत में पूजा विधि का वर्णन किया जाये तो सर्वाधिक स्त्री रूपी देवियों का ही रूप निकलकर सामने आता है। काली, दुर्गा, सीता, सावित्री, अनुसूइया, पार्वती और न जाने क्या-क्या। साथ ही महिलाओं के अपमान के मामले भी सबसे ज्यादा यहीं मिलेंगे। यह कैसी नीति है पुरुषों के समाज की?

महिला राष्ट्रपति, महिला लोकसभा अध्यक्ष, विभिन्न प्रदेशों की महिल मुख्यमंत्री, महिला पार्टी अध्यक्ष, महिला मुखिया एवं सरपंच इन सब को बर्दाश्त करना पुरुषों की मजबूरी हो सकती है, परंतु इज्जत न करना उनका अधिकार है। पद और प्रतिष्ठा प्राप्त महिलाओं से टकराव संभव नहीं होता तो उसका खामियाजा मध्यम स्तरीय महिलाएं जो रोजमर्रा के कामों के लिए घर से बाहर निकलती हैं को भुगतना पड़ता है। पुरुषों द्वारा  कसी अश्लील फब्तियां उसका माध्यम बनती हैं। जिसके भोंडेपन को उच्चारण विधि और भद्दी हंसी से समझा जा सकता है। उनकी इस हरकत का कोई मापदंड नहीं है। किसी कानूनी कार्रवाई के दायरे में भी उनका यह अपराध साबित नहीं हो सकता, क्योंकि सभी वहां सिर्फ श्रोता भर होते हैं। सार्वजनिक स्थलों पर किसी से किसी का परिचय नहीं होता। सिर्फ महिला होने भर के अहसास से आपको उनके संवादों से शर्मिंदगी उठानी पड़ सकती है। आखिर कब मिलेगा महिलाओं को उनका उचित सम्मान? कब होगी उनकी इज्जत? कब मिलेगा इन अश्लील फब्तियों से छुटकारा ?

20 COMMENTS

  1. Respected Madam,

    Aaj ki samaj mai mahila barabari ki baat karti hai lakin ek line mai aane se darti hai. Misuse ko rokiya Mam, immandar purush ki sankhya khud bakhudh baddh jayegi.

    Regards,

  2. Hey – good weblog, just looking about some blogs, appears a fairly great platform you might be utilizing. I’m currently making use of WordPress for several of my websites but looking to alter one of them around to a platform comparable to yours as a trial run. Anything in specific you would recommend about it?

  3. Jab ek aaurat apne kapdon mein girawat lati hai to wo janam dene wali se janam harne wali banti chali jati hai…
    Jis din aaurtein apni aabroo ki izzat karna seekhengi, wo use sambhalna bhi jaan jayengi..

    aur us din ya us din ke baad se koi mard ek aaurat par hath nahin dalega kyunki use bhi ek aaurat ne hi janam diya hai…

  4. अपनी इस हालत के लिये महिलायें स्वयं जिम्मेवार हैं।

  5. woman would face ,but must not accept any wrong thing happens to them,
    must bring culprit to the notice. woman must learn the word oppose and must not hide.

  6. Very strong posting but i want to say that women is self responsiable for present situation. They will have to come out from mental barrier which made them weak. Once they will cross lots of problem will be solved automatically. Glad to see that this is already happening in bigger as well as smaller city but still lots of change requir. My only suggestion to the women let men think whatever they want to think,not to be panic move forward in the way of upgradation, the day will come when same men will recognise them as a proud mother,proud sister, proud friend and confident stranger. Thank u

  7. Prevention is better than cure. The devils cannot be changed into saints. Therefore women have to take some preventive measures themselves.

  8. these is what that is not changing in bihar , youths are not changing there cheap mentalities even what i have seen some married peoples also comment about women’s dresses , jewelleries how she hav wore etc etc …………………the main problem is that there’s no perfect solution that can solve it except the people change their mentalities themselves. you women should also come forward of these not only of assaulting also of dowry system , “nari shoshan” etc etc JAI BIHAR……….

  9. ये प्रॉब्लम पुरे विश्व में है ,आदमी तो आदमी यहाँ तक की जानवरों ने भी भेदभाव करना सिख लिया है !

  10. सबसे बड़ी लड़ाई आर्थिक असमानता को दूर करने की है , अगर औरते आर्थिक असमानता को दूर करने के लिए खुद को आर्थिक रूप से मज़बूत बनाने के लिए घर से बाहर निकलती है तो उन् पर अश्लील फब्तियो और दूसरे कई व्यंग्यो से मानसिक हिंसा द्वारा दबाव बनाया जाता है ,, ताकि वो आर्थिक रूप से सबल ना बने ,,
    इसका सर्वोत्तम इलाज यही है की हम लोग आर्थिक रूप से मजबूत बने और आर्थिक के साथ साथ प्रशानिक और राजनेतिक जगत में खुद को मजबूत बनायें, ये एक लंबी प्रकिर्या जरुर हो सकती है परन्तु ये कारगर सिद्ध होगी, क्योंकि हमें किसी का मोहताज होने का दबाव नहीं रहेगा और अपनी गरिमा और आत्मसम्मान का पता चलेगा

  11. Feel and make yourself strong. Nobody will touch you. Youngmen with only inferior cultural background resort to such anti-social activities. Be brave, even if you are alone. There is no dearth of saner and courageous persons in our society to deter such elements.

  12. In general women are very soft target and often people, mostly middle/old age, use to pass double meaning comments on them. Sometimes young boys do similar act with middle/old age ladies. However, still there are people who oppose such activities of these type of vagabonds.
    There is one question, whether in all such cases, boy/men are responsible for such untoward incidents and passing obscene comments?
    In my view, the type of dress which allures masculines and open behaviour of ladies also adds to such activities. It seems that feminines have also lost their respect to some extent in the society for which they are exclusively responsible.

  13. नागरिकता की प्राथमिक पाठशाला परिवार हैं। आज परिवारों द्वारा अपने बच्चों मे नागरिकता की शिक्षा देने का चलन नहीं है। इसी का दुष्परिणाम वे बाते हैं जिंनका उल्लेख इस पोस्ट मे है। तमाम टिप्पणिया असंगत हैं। परिवार के बाद स्कूलों मे भी नागरिकता के विकास की बातें नहीं होती हैं जबकि पहले नागरिक शिक्षा कोर्स मे होती थी।

  14. Anitaji,me Aapki Post Se poori tarah Sahmat hoon Par Is Sandharb me Mahilao ko Bhi aage aana Padega Tabhi Kuch Baat Banegi nahi to Wahi “Dhaak ke Teen Paat” Wali Baat Charitarth hogi.

  15. mahilawon ke prati puroshon ka aisa vyahar nindniya hai. Aisi vikat paristithi se do char honewali mahilayen hamesha tanav mein jeeti hain.

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