मौनी अमावस्या पर ‘मौन’ हुए लोगों का जिम्मेवार कौन?

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अनीता गौतम//

धर्मिक उन्माद पर होने वाली मौत का ठीकरा सभी एक दूसरे पर फोड़ते दिखते हैं, पर जब धार्मिक अनुष्ठान के नाम पर जमा भीड़ में होने वाली बदइंतजामी से मौतें होती, तो सभी अपना दामन बचाते। पिछले महीने भर से भारी भीड़ के एक स्थल पर जुटे होने के बावजूद राज्य और केन्द्र सरकार की बनाई गई तमाम योजनाएं कुंभ के आखिरी दिन यानी मौनी अमावस्या के दिन, जब कि सबसे ज्यादा लोगों के जमा होने का अंदेशा पहले से था, इलाहाबाद में बिखरता ही नहीं ढहता दिखा। तीन करोड़ लोगों के गवाह बनने की खबर तो थी पर इसकी सुध लेने के रास्ते बंद थे। ज्ञात्व्य हो कि भारी भीड़ पर बेकाबू होने का इल्जाम लगा और हमेशा की तरह इसके लिए दोषी बनी पुलिस। इस तरह से मची भगदड़ का जो हाल होता है वह यहां भी हुआ।

प्रत्यक्षदर्शियों की माने तो जब भीड़ का रेला थमा, तब तक तो कई लोग मर चुके थे और दर्जनों घायल घटनास्थल पर कराह रहे थे। अफरातफरी का आलम ऐसा था कि हजारों लोग अपने परिवार से बिछुड़े हुए उन्हें इधर से उधर तलाश रहे थे। संगम में आस्था से सराबोर लोगों के पहुंचने का यह सिलसिला पिछले एक महीने से जारी था, पर मौनी अमावश्या की वजह से उस दिन लगभग तीन करोड़ से भी ज्यादा श्रद्धालुओं के डुबकी लगाने की बात कही गई।

संगम में डुबकी लगाकर लौटी भीड़ का रेला वापसी के लिए इलाहाबाद रेलवे स्टेशन पर पहुंचा तो वहां पर लाखों लोगों का जमावड़ा एक साथ हो गया। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार शाम के समय स्टेशन और उसके आसपास इतनी ज्यादा भीड़ थी कि किसी को कुछ नहीं सूझ रहा था। यहां तक कि पैदल चलने के रास्ते भी नहीं। सभी अपने सर पर भारी गट्ठर उठाए आगे की तरफ बढ़ नहीं बल्कि सरक रहे थे। रेलवे के प्लेटफार्म नंबर छह पर तिल रखने की भी जगह नहीं थी ऐसे में पुलिस वालों की लाठी भांजने की कोशिश कितनी गैर जिम्मेदाराना हो सकती थी इसकी अंदेशा पुलिस वालों को अगर नहीं था तो लानत है उनपर और उनके काम करने के तरीकों पर।

कुंभ क्षेत्र में या किसी भी धार्मिक स्थल पर इस तरह की मौतों की वारदात कोई नई बात नहीं है ,पहले भी ऐसे हादसे होते रहे हैं। पर न तो लोग सजग होते है , और न ही प्रशासन। वह तो जैसे इस तरह के हादसों को ऐसी भीड़ का ही हिस्सा मानती है। भीड़ का दबाव बनना और व्यवस्था के बिगड़ने पर जब पुलिस तंत्र का भीड़ से नियंत्रण हट जाता है और बिगड़े मामले को लेकर शुरू होती लाशों पर राजनीति।

इस तरह से धार्मिक स्थलों पर भीड़ के साथ धक्कामुक्की और बदइंतजामी का यह पहला आलम नहीं है। कई ऐसे हादसों का गवाह बना है यह देश, पर कभी इस तरह के हादसों से सबक लेने की कोशिश नहीं की गई।

बहरहाल हादसों की जिम्मेदारी तय हो न हो पर कुछ सरकारी घोषणाओं और राजनेताओं के खेद और दुख जताने का सिलसिला एवं हेल्पलाइन के माध्यम से सरकारी तंत्र बेहतर देने के लिए प्रयासरत अवश्य दिखती है।

इसका सीधा मतलब यथाशीघ्र सब कुछ सामान्य बनाने का प्रयास ही होता। इस प्रकार ऐसा करना यह बताने के लिए काफी होगा कि सरकारी तंत्र ऐसी घटनाओं को सामान्य ही मानता है। किसी को न्याय मिलने की उम्मीद तो बेमानी है पर ऐसे हादसों में होने वाली मौतों से सबक लेने की उम्मीद तो की ही जा सकती। क्योंकि बिहार की राजधानी पटना का छठ घाट हादसा बहुत पुराना नहीं है। ऐसी कुव्यवस्था के आलम में लोगों का धर्म और आस्था के नाम पर किसी धार्मिक स्थल पर जमा होना और सीधा बैकुंठ का रास्ता अख्तियार करना सर्वथा निंदनीय है क्योंकि इस घटना के लिए प्रकृति नहीं बल्कि मानवीय चुक जिम्मेदार है। सरकार और सरकारी तंत्र के लिए इससे शर्मनाक कुछ हो ही नहीं सकता।

1 COMMENT

  1. पटना मे छठ-पर्व पर जो हुआ वही अलाहाबाद मे कुम्भ पर हुआ। आश्चर्य क्यों?ढोंग-पाखंड-आडम्बर को जब तक ‘धर्म’ माना और कहा जाएगा ऐसे दुखद हादसे होते ही रहेंगे।

    संत रेदास का कथन-‘मन चंगा तो कठौती मे गंगा’।
    कबीर दास जी कथन-‘दुनिया ऐसी बावरी की पत्थर पूजन जाये’।
    महात्मा बुद्ध का कथन -‘नदियों मे स्नान करना मूढ़ता है।’
    सद-वचनों की उपेक्षा और व्यापारी/उद्योगपति वर्ग के आर्थिक हितों को सम्पन्न करने वाले पाखंडों को धर्म कहना ही मूल समस्या है। देखिये विद्वान के विचार-
    Danda Lakhnavi
    भीड़ के आई-क्यु का परिक्षण कब तक चलेगा?
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    किसी स्थान पर तरह-तरह के प्रलोभनों में भरमा कर भीड़ को बुलाना आसान है किन्तु उस पर नियंत्रण रखना अत्यंत कठिन होता है| जब कोई अनहोनी घट जाती है, तो लोग प्रशासन को कोसने लगते हैं| इस प्रकार की अनहोनी पहली बार नहीं घटी है| भीड़ जुटाने वाले … भीड़ का मनोविज्ञान समझते क्यों नहीं? उसका कंट्रोल-स्विच खो क्यों देते हैं? उसे सलीके से चलना क्यों नहीं सिखाते? वे अपनी जुम्मेदारी से कब तक मुख मोडेंगे? भीड़ के आई-क्यु का परिक्षण वे कब तक करते रहेंगे?
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    भीड़-IQ की जहाँ, की जाती है………नाप।
    मृत्यु नाचने क्यों वहाँ, आ जाती चुपचाप??
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    सद्भावी-डॉ० डंडा लखनवी

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