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Thursday, February 2, 2023
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सदियों से इंसान बेहतरी की तलाश में आगे बढ़ता जा रहा है, तमाम तंत्रों का निर्माण इस बेहतरी के लिए किया गया है। लेकिन कभी-कभी इंसान के हाथों में केंद्रित तंत्र या तो साध्य बन जाता है या व्यक्तिगत मनोइच्छा की पूर्ति का साधन। आकाशीय लोक और इसके इर्द गिर्द बुनी गई अवधाराणाओं का क्रमश: विकास का उदेश्य इंसान के कारवां को आगे बढ़ाना है। हम ज्ञान और विज्ञान की सभी शाखाओं का इस्तेमाल करते हुये उन कांटों को देखने और चुनने का प्रयास करने जा रहे हैं, जो किसी न किसी रूप में इंसानियत के पग में चुभती रही है...यकीनन कुछ कांटे तो हम निकाल ही लेंगे।

बेटी (कविता)

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ऐ श्रृष्टि रचाने वाले, दुनिया को बसाने वाले। बस इतना तू बता दे मुझको, ऐ इंसान बनानेवाले। मैं ही जननी हूँ फ़िर भी, मुझसे ही नफरत...

लुप्त (हिन्दी काव्य)

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शिव कुमार झा 'टिल्लू' दड़क गए शिखर मेरु के हिलकोरें सागर की लुप्त हुईं रवि आभा जब मलिन दिखा- नीरज पंखुड़ियाँ लुप्त हुईं वात्सल्य स्नेह में भी छल है संतति...

शहीदों का सम्मान (कविता)

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वेंकटेश कुमार. ... न करते वो वलिदान, तो आजादी एक सपना होता ! लालकिले पर फहराता झंडा, पर नहीं वो अपना होता !! गर अपनाते उनके आदर्शो को, संसार में...

सिविल सेवा परीक्षा विवाद का औचित्य

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धर्मवीर कुमार, जमशेदपुर । संघ लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित सिविल सेवा परीक्षा के वर्तमान पैटर्न का विरोध कर रहे हजारों छात्रों की अघोषित मांग  अगर...

निर्भया: बार-बार लगातार !

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संतोष सिंह, निर्भया  एक बार फिर चर्चा में है,  लोगों का आक्रोश उसी तरह सड़कों पर दिख रहा है, जैसा दिल्ली में दिखा था। दिल्ली...

हिन्दी और पेंटिंग से प्रेम है फ्रोसो विजोतोसु को

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‘मैं एक यात्री हूं और यात्रा करना पसंद करती हूं। भारत आना मुझे बेहद पसंद है। यहां मैं तीसरी बार आई हूं और बार...

क़स्बाई लड़कियाँ (नज्म)

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खुलती हैं रफ़्ता-रफ़्ता मोहब्बत की खिड़कियाँ, कितनी हसीन होती हैं क़स्बाई लड़कियाँ। काजल भरी निगाह में शर्मो-हया के साथ, धीरे से आये सुर्ख़ लबों पर हरेक बात। रंगीन...

मुजफ्फरपुर : मिठास से भरी लीची नगरी

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18 वीं सदी में तत्कालीन तिरहुत से अलग हो कर मुजफ्फरपुर अस्तित्व में आया। शहर को ब्रिटिश शासन काल के रेवेन्यू अफसर मुज़फ्फर खान...