मीडिया को भोंपू की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं माओवादी

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मीडिया वालों की मेहरबानी से माओवादी हौट न्यूज बनते जा रहे हैं, और अब तो इन्हें यह भी पता चल गया है कि मीडिया का इस्तेमाल कैसे और कहां पर करना है, जबकि हकीकत में सभी मीडिया वाले एक स्वर से यही चिल्लाते हैं कि माओवादी देश के दुश्मन है, लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा है, वर्तमान व्यवस्था को गंभीर चुनौती दे रहे हैं, केंद्रीय स्तर के कई मंत्री नक्सलियों के समर्थक हैं आदि आदि, फिर भी वे नक्सलियों के कारनामों का प्रचार प्रसार करने वाले भोंपू बनकर ही सामने आते हैं, या फिर यह कहना ज्यादा उचित होगा कि नक्सली उन्हें अपने तरीके से इस्तेमाल करने की कला सीख चुके हैं। मीडिया वाले पिछले दो दिन से लखीसराय की घटना के पीछे पड़े हुये हैं।

खबर के मुताबिक माओवादियों ने 7 जवानों को  मार डाला है,  4 को बंदी बना रखा है, और उनकी रिहाई के एवज में अपने आठ साथियों को छोड़ने की मांग कर रहे हैं। पूरा तमाशा इसी के पीछे चल रहा है। अभी तक यह भी पता नहीं है कि वाकई में चारों जवान बंदी है या फिर उनका भी काम तमाम हो चुका है, और टीवी वाले हवा में लाठी भांज रहे हैं, और तथाकथित माओवादियों के एक प्रवक्ता के हवाले से बता रहे हैं क्या-क्या अल्टीमेट्म दिया गया, फिर कैसे अल्टीमेटम को बढ़ा दिया गया, और फिर कब जन अदालत बैठने वाला है, और जन अदालत के फैसले में कैसे एक जवान को मौत की सजा दी गई है। किसी मीडिया ने मीडिया धर्म का निर्वहन करते हुये यह पुष्टि करने की कोशिश नहीं की क्या वाकई में चार जवान माओवादियों की कैद में है, और यदि हैं तो उनके पास इस बात के सबूत क्या है?  ये लोग रोती-बिलखती महिलाओं के बाइट चलाने में ज्याद दिलचस्पी ले रहे हैं, जो आम लोगों को भावनात्मक स्तर पर पूरे प्रकरण से जोड़ने में सक्षम है।  

इधर तथाकथित माओवादियों ने चार सिपाहियों के घर पर फोन के माध्यम से यह खबर दी कि मुख्यमंत्री के सामने जाओ रोओ-पीटो। एक जवान की पत्नी तो चली भी आई, इसके पहले उसे टीवी पर हाय-हाय करके रोते हुये दिखाया गया। अब सवाल यह कि माओवादी यदि वाकई में राष्ट्रीय दुश्मन की हैसियत रखते हैं तो उनसे निपटने वाले जवानों और उनके परिवार वालों में वह दम और हौसला क्यों नहीं है जो किसी राष्ट्रीय दुश्मन से निपटने लिए चाहिये। उस सिपाही की महिला का टीवी वालों के सामने छटपटाकर रोना भले ही कैमरा वालों को बेहतर शाट्स लगे और दिल्ली के नेशनल मीडिया में बैठे लोग भी उस बाइट पर फिदा होकर रात गुजरते-गुजरते इस विषय पर मोटा-मोटा कार्यक्रम बनाने की तैयारी कर ले, लेकिन यह शुभ संकेत नहीं है। यह पूरी तरह से सरकार और जवानों को मानसिक तौर पर तोड़ने की प्रक्रिया का ही एक हिस्सा है, जिसमें मीडिया वालों को ये लोग सफल तरीके से इस्तेमाल कर रहे हैं।     

कुछ अपनी चारित्रिक विशेषताओं के कारण भी मीडिया वाले इस मामले में नकारात्मक रूप से ही सही माओवादियों के भोंपू बने हुये हैं। मीडियावाले हर मामले में कुछ लाल बुझकड़ टाइप के लोगों को रखते हैं, जो टाई-कोर्ट लगा के पहुंच जाते हैं अपना ज्ञान देने, बेशक इसके बदले में वे मीडिया हाउसों से मोटी रकम भी पाते हैं, गेस्ट फंड से। कल रात को एक खबरिया चैनल पर  एक लाल बुझकड़ धांसू टाइप का आइडिया देते हुये कह रहे थे कि अभी तत्काल माओवादियों से बात करके उन चार जवानों को छुड़ा लेना चाहिये, फिर माओवादियों पर जोरदार हमला करना चाहिये, मानो माओवादी उनके इस आइडिया से तुरंत ध्वस्त हो जाएंगे।

माओवाद एक संगठित जनयुद्ध की वकालत करता है, जिसमें भाग लेने वाले योद्धा लोगों के बीच आम आदमी की तरह रहते हैं, और एक व्यवस्थित नेटवर्क को मेनटेन करते हुये सूचनाओं का आदान प्रदान करते हैं, यहां तक खाना और खुराकी की तरफ भी इनका पूरा ध्यान रहता है। अब इस नेटवर्क से निपटने के लिए स्थानीय स्तर पर तो पुलिस पूरी तरह से अक्षम है, और इससे असहमति व्यक्त करना सच से मुंह मोड़ने जैसा है। स्थानीय स्तर पर पुलिसिया कल्चर पूरी तरह से सड़ चुका है और इसमें से दमघोंटू बदबू निकल रहा है। थाने में हर केस पर स्थानीय पुलिस वाले कमाई करने के चक्कर में लगे रहते हैं, अपने-अपने इलाके में पड़ने वाले बाजारों में तो ये लोग खुलेमाम लूट-खसोट करते ही हैं। माओवादियों ने पुसिल को पूरी तरह से बैकफुट पर ला दिया है, यहां तक आपरेशन ग्रीन हंट में शामिल सैनिक बलों को भी छका-छका कर मार रहे हैं।     

पिछले दिनों में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने माओवादी मुद्दे पर दिल्ली में मुख्यमंत्रियों की एक बैठक के बाद कहा था कि माओवाद समस्या का समाधान मानवीय आधार पर किया जाना चाहिए, सिर्फ हथियार के बल पर इस समस्या का समाधान नहीं किया जा सकता है। अब नीतीश कुमार की सरकार ही माओवादियों के निशाने पर आ गई है। हालांकि यदि देखा जाये तो माओवादियों द्वारा जवानों को निशाना बनाने की यह  कोई पहली घटना नहीं है। इस तरह के घटना विभिन्न राज्यों में लगातार हो रही है, और हर स्तर पर इसकी निंदा भी की जा रही है, लेकिन इसके रोकथाम के लिए अभी तक कोई सौलिड मैकेनिज्म सामने नहीं आया है। माओवादी लोग आटोमैटिक राइफल चलाने के साथ-साथ लैपटाप चलाने में भी माहिर है, और इस स्तर पर पुलिस प्रशासन उनके सामने कहीं नहीं ठहरता है। पुलिस प्रशासन के मुकाबले माओवादियों का फिल्ड एक्सरसाइज भी काफी मजबूत है, लंबी दूरी तक वो बिना हांफे हुये वजनदार हथियारों के साथ दौड़ सकते हैं, और अपने अनुकूल स्थान का चयन करते हुये घात लगा सकते है। विभिन्न जिलों में स्थानीय बाजारों से सब्जी वसुल करने वाले पुलिसकर्मी इनके सामने कहीं नहीं टिकते।

कुछ विशेषज्ञ लोग माओवादियों को संगठित एक्सटार्शन गैंग के रूप में प्रचारित कर रहे हैं, यह बहुत हद तक सही भी है। लेकिन माओवादी इसे लेवी कहते हैं, और इसका पूरा हिसाब-किताब भी रखते हैं। चूंकि वे लोग संगठित तौर पर एक सेना के साथ शासन से जुड़े कई संस्थाओं को मेनटेन कर रहे हैं, तो ऐसे में धन की आवश्यकता स्वाभाविक है। इसके अलावा जन अदालत लगाकर वे लोग एक समानांतर न्यायिक व्यवस्था भी चला रहे हैं, भले ही इसका क्षेत्र सीमित हो, लेकिन निरंतर इनके क्षेत्र का विस्तार हो रहा है। ऐसे में माओवादियों को संगठित एक्सटार्शन गैंग मानना एक रणनीतिक भूल के सिवा कुछ नहीं है। इतिहास यही कहता है कि जंग में सिपाही शहीद होते हैं, उसके लिए मातम मनाने की जरूरत नहीं है। लेकिन यहां की डेमोक्रेटिक सरकार एक संगठित अनडेमोक्रेटिक संगठन के निशाने पर खड़ी है, और यह अनडेमोक्रेटिक संगठन पूरी व्यवस्था के वजूद को ही उखाड़ फेंकने पर तुला हुआ है, हालांकि अपने आप को डेमोक्रेटिक सिद्ध करने के लिए उनके पास अपने तर्क भी हैं।

जहां तक आम जनता के व्यवस्था में भागीदारी का सवाल है तो आज भी डेमोक्रेटिक प्रतिनिधि विधानसभा या संसद में काफी तिकड़मबाजी के बाद ही जीत कर जाते हैं, और यदि इस चयन प्रक्रिया का विश्लेषण किया जाये तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि जीतने वाले प्रतिनिधि को हारने वाले कूल प्रतिनिधियों की तुलना में काफी कम मत प्राप्त होता है, लेकिन एक बार जीतने के बाद वह पूरे क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने का दम भरता है, जबकि हकीकत में वे एक वर्ग विशेष के हितों को साधते रहता है। वैसे भी चुनाव में चालिस प्रतिशत जनता घर से वोट देने नहीं निकलती है, इसके कई कारण हो सकते हैं। एक महत्वपूर्ण वर्तमान व्यवस्था के प्रति उनके मन व्याप्त उदासीनता है।

सवाल चार पुलिस वालों की जिंदगी का नहीं है, निसंदेह उन्हें बचाने की पूरी कोशिश करनी चाहिये, यदि वे अभी तक जिंदा हैं तो। सवाल यह है कि पूरी व्यवस्था दमघोंटू स्तर पर क्यों और कैसे पहुंच गई ? और क्या इससे निजात पाने का एक मात्र रास्ता माओवाद से होकर ही गुजरता है?? इस प्रश्न को छिटपुट स्तर पर सुलझाने की कोशिश करना एक रणनीतिक भूल होगी, क्योंकि इसके पहले भी जहानाबाद में जेल-ब्रेक जैसे दुस्साहसी घटनाओं को सफलतापूर्वक अंजाम दिया जा चुका है, महाराष्ट्र में भी बड़े पुलिस पदाधिकारी की पलटन को रौंदा जा चुका है। इसके साथ ही तथाकथिक देश की मीडिया की मुख्य धारा को भी राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े खबरों को प्रस्तुत करने की तमीज सीखनी होगा, हालांकि बेशक अभी वे इसके लिए तैयार नहीं है।

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