सत्ता की प्रकृति को न समझ कर भंयकर भूल की है बाबा रामदेव ने

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दिल्ली के रामलीला ग्राउंड में पुलिसिया कार्रवाई के दौरान अपनी जान बचाने के लिए बाबा रामदेव ने महिला का वेश धारण कर बचने की कोशिश की, इसके बावजूद पुलिस ने उन्हें धर धबोचा। इस पुलिसिया कार्रवाई को देखकर बाबा रामदेव अंदर तक हिले हुये हैं। दिल्ली से देहरादून पहुंचने के बाद वहां पर आयोजित संवाददाता सम्मेलन में पुलिस की बर्बरता का बखान करते हुये बाबा रामदेव बिलख पड़े। बाबा रामदेव पुरी तरह से रक्षात्मक मुद्रा में दिखे, साथ ही रो-रोकर यह भी कहते रहे कि उन्हें पत्र लिखने के लिए धमकाया गया था। यदि वे पत्र नहीं लिखते तो उनकी हत्या कर दी जाती। बाबा के पूरे आंदोलन पर यदि गौर किया जाये तो यह स्पष्ट हो जाता है कि बाबा को एक आंदोलन का अनुभव न के बराबर है। सीधी सी बात है कि जब आप व्यवस्था के खिलाफ व्यापकतौर पर आंदोलन करने उतरेंगे तो व्यवस्था से जुड़े लोग हर तरीके से उस आंदोलन का दमन करेंगे ही। कांग्रेस लंबे से अंग्रजों से लड़ती रही है, उसके बाद देश पर शासन करने के अनुभव भी उसका लंबा है। ऐसे में भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन में सरकार और व्यवस्था की भूमिका का सही तरह से आकलन न कर पाना कही न कहीं बाबा के नेतृत्व क्षमता पर ही प्रश्नचिन्ह लगाता है। इस मुहिम में बाबा रामदेव को जो झटके मिले हैं उससे बाबा भविष्य में कुछ सीख पाएंगे यह भी कह पाना मुश्किल है।

देश और विदेश में बाबा रामदेव की लोकप्रियता योग को लेकर है। इसी लोकप्रियता का इस्तेमाल वे अपना राजनीतिक कद बढ़ाने के लिए कर रहे हैं। योग के माध्यम से उनके साथ जुड़े हुये लोगों के पास भी राजनीतिक अनुभव का सर्वथा अभाव है, जबकि व्यापाक जन आंदोलन के लिए राजनीतिक अनुभव से संपन्न कार्यकर्ता और नेता निहायत ही जरूरी तत्व होते हैं। बाबा रामदेव का सारा आंदोलन शुरु से ही विरोधाभाषों से ग्रसित है। एक ओर तो बाबा रामदेव भ्रष्टाचार और काले धन के खिलाफ देशव्यापी मुहिम चलाने की बात करते रहे तो दूसरी ओर कांग्रेस प्रमुख सोनिया गांधी को माता और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को ईमानदार व्यक्ति बताते रहे। रामलीला मैदान में हुई फजीहत के बाद अब बाबा सोनिया गांधी पर खुद की हत्या कराने के आरोप लगा रहे हैं। अभी भी बाबा रामदेव व्यवस्था के उन तंतुओं की जटिलता को नहीं समझ पा रहे है जो सलीके से व्यापक जन उभारों का दमन करने में कुशल है। जिस तरह से बाबा रामदेव आंसू बहा रहे हैं उसे  देखकर यही लगता है कि बाबा का आत्मविश्वास हिल चुका है, और इसके लिए खुद बाबा ही जिम्मेदार हैं। सत्ता की प्रकृति को न समझ कर उन्हें भयंकर चूक की है।

कहा जाता है कि राजनीति और कुछ नहीं शक्ति का खेल है। बाबा रामदेव की समस्या यह है कि वह इस खेल को खेलना भी चाहते हैं और इसमें खुलकर शरीक भी नहीं होना चाहते। गेरुआ वस्त्र धारण कर वह छद्म रूप से देश की राजनीति को प्रभावित करने की कोशिश कर रहे हैं, जो निहायत ही अवैज्ञानिक कदम है। किसी भी राजनीतिक आंदोलन के लिए यह निहायत ही जरूरी है कि उस आंदोलन में शामिल सभी लोग राजनीतिक चेतना से परिपूर्ण हो, और साथ ही राजनीतिक तौर पर लोगों को कुशल नेतृत्व प्रदान करने वाले लोग उस आंदोलन में शामिल हो। राजनीतिक लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए नैतिकता से परे हर उस हथियार का इस्तेमाल किया जाता है, जिसकी जरूरत होती है। राजनीतिक आंदोलन में कुशल रणनीति तो चाहिये ही साथ ही विरोधी खेमे की रणनीति का भी सही आकलन जरूरी है। बाबा रामदेव दोनों मोर्चे पर बुरी तरह से अक्षम साबित हुये हैं।लंबे समय तक योग का अलख जगाते हुये उन्होंने देशभर में बहुत बड़ी संख्या में लोगों को अपने साथ जोड़ तो लिया लेकिन उन्हें राजनीतिक प्रशिक्षण देने की कोई कुशल व्यवस्था नहीं की। बस लोगों से इमोशनल अपील ही करते रहे।

लंबी चौड़ी बात करने वाला बाबा रामदेव को एक बार गहराई के साथ कांग्रेस का इतिहास पढ़ना चाहिये और कांग्रेस को समझना चाहिये। अंग्रजों के खिलाफ लड़ाई में कांग्रेस ने भी सत्याग्रह जैसे हथियार का इस्तेमाल किया था, तो स्वाभाविक है कि सत्याग्रह के विभिन्न पहलुओं को कांग्रेस बाबा रामदेव से ज्यादा बेहतर समझती है। अपने आंदोलन को लेकर बाबा रामदेव शुरु से ही तकनीकी गलती करते गये, जो कांग्रेस के नजर में सहजता से आ गई। योग के नाम पर रामलीला मैदान की बुकिंग किया और वहां पर राजनीतिक भाषणबाजी करने लगे। कांग्रेस के पास विकल्प साफ था कि बाबा रामदेव बात से मानेंगे तो ठीक है नहीं तो पुलिसिया कार्रवाई तो हो जाएगी। बाबा रामदेव के आंदोलन की नींव ही झूठ पर रखी हुई थी, जिसकी हवा कांग्रेस ने सहजता से निकाल दी। अभी बाबा रामदेव भटकी-भटकी बातें कर रहे हैं। विचारों की स्पष्टता का अभाव तो बाबा में दिख ही रहा है, प्रैक्टिकल स्तर पर फाइटिंग करने की कुशल रणनीति का भी अभाव है।

2 COMMENTS

  1. सबसे पहले तो इस लिंक को जरूर पढ़े जो अभी-अभी भोजपुरी में लिखकर प्रकाशित किया है। http://bhojpurihindi.blogspot.com/2011/06/blog-post_07.html

    बाबा की एक मांग है काले धन की यह तो बिलकुल सही थी। क्योंकि मान लीजिए कि सब के सब चोर अपने पैसे लेकर भारत से भाग जाएँ तो क्या होगा? अच्छा यह बताइए कि कितना पैसा है विदेशी बैंकों में। चार सौ लाख करोड़ कहाँ से आया? हाँ एक बात बता दूँ कि बहुत जगह देखा कि काले धन की बात सबसे पहले इतने जोर शोर से राजीव दीक्षित ने ही उठाई थी। 2002 ,17 अगस्त के भाषण में उन्होंन यह बात कही है कि 48 लाख करोड़ रूपया बैंकों में है।

    बाबा की अन्य मांगों पर आपके क्या विचार हैं? अन्य को छोड़कर अभी काले धन की बात करेंगे तो यह तो होना ही चाहिए था। बात रही आन्दोलन की तो राजीव दीक्षित आन्दोलन से बीस सालों तक जुड़ें रहे हैं, लाठियाँ खाई हैं, बहुत जगह सफलता भी पाई है और इसलिए उनके अन्दर राजनीतिक समझ थी लेकिन बाबा ने कोई आन्दोलन किया नहीं था। यह बात तो सही है लेकिन सरकार ने जो किया है वह इतना गलत है कि क्या कहूँ? बाबा की गलती या बेवकूफी चाहे जो हो लेकिन सरकार की हरामखोरी भी कम नहीं। आपले आलेख में शीर्षक में भी भयंकर गलत है, आपने लिख दिया है भंयकर।

    कांग्रेस लंबे से अंग्रजों से लड़ती रही है, उसके बाद देश पर शासन करने के अनुभव भी उसका लंबा है।
    यह बात भी गलत कह रहे हैं आप। एक तो समय छोट गया है इस वाक्य में। अब यह वाक्य गलत है क्योंकि कोई कांग्रेसी नेता अंग्रेजों से लड़ा है, ऐसा अब नहीं है और सत्याग्रह को समझना कांग्रेस के पास से कोई सीखे यह जरूरी नहीं। हाँ कांग्रेस ने एक्यावन सालों तक राज किया है।लेकिन पार्टी कोई सजीव चीज नहीं है कि उसके पास लम्बा अनुभव हो। लम्बा अनुभव का मतलब किसी नेता या आदमी का लम्बा अनुभव। हाँ यह सही है कि बाबा की उम्र कांग्रेस के सभी नेताओं से कम ही होगी। राहुल से पाँच वर्ष बड़े होंगे बस।

    देश और विदेश में बाबा रामदेव की लोकप्रियता योग को लेकर है। इसी लोकप्रियता का इस्तेमाल वे अपना राजनीतिक कद बढ़ाने के लिए कर रहे हैं।

    यह बात संदेहास्पद है। हमें इससे कोई मतलब नहीं होना चाहिए कि लोकप्रियता का इस्तेमाल कोई कैसे कर रहा है। कल अमिताभ बच्चन अगर देश के लिए लड़े तो उसको हम क्या कहेंगे। यह तो अच्छी बात है लेकिन ऐसी लोकप्रियता में संघर्ष हमेशा कम होता है क्योंकि पहले से व्यक्ति के पास लोगों की कमी नहीं होती। अब अन्दर क्या है, ये तो कोई नहीं जानता।

    गेरुआ वस्त्र धारण कर वह छद्म रूप से देश की राजनीति को प्रभावित करने की कोशिश कर रहे हैं, जो निहायत ही अवैज्ञानिक कदम है वस्त्र तो छोटी सी बात है, हिम्मत के लिए और लड़ने के लिए फुल-पैंट नहीं चाहिए। उदाहरण सामने हैं- मंगल पांडे, कुँवर सिंह आदि। वस्त्र महत्वपूर्ण नहीं है। गाँधी के वस्त्र और महात्मा होने को ध्यान में रखिए।

    अंग्रजों के खिलाफ लड़ाई में कांग्रेस ने भी सत्याग्रह जैसे हथियार का इस्तेमाल किया था, तो स्वाभाविक है कि सत्याग्रह के विभिन्न पहलुओं को कांग्रेस बाबा रामदेव से ज्यादा बेहतर समझती है।

    यह सही नहीं है। वह कांग्रेस गाँधी की थी और गाँधी के लाख किलोमीटर तक कोई आज का कांग्रेसी नहीं टिकता। मैं पहले भी कह चुका हूँ कि सत्याग्रह का अनुभव कोई आनुवांशिक नहीं होता। अनुभव आनुवांशिक नहीं है तो कैसे कांग्रेस सत्याग्रह को आज भी समझती है। सत्याग्रह को जो समझता था उसे मार दिया गया। सत्याग्रह के किसी पहलू को बाबा से ज्यादा कांग्रेस नहीं समझती, दोनों नये हैं इस मामले में।

    जेल में भगतसिंह का अनशन भी सत्याग्रह था तो न तो वे हैं और न गांधी।

    योग के नाम पर रामलीला मैदान की बुकिंग किया और वहां पर राजनीतिक भाषणबाजी करने लगे।
    इसका जवाब मैंने भोजपुरी में लिखा है लेकिन अब फिर से कह रहा हूँ। आप या कोई सरकार को हमेशा सही ठहराएँ तो मुझे अच्छा नहीं लगता। बाबा की बेवकूफी का दो आलेख लिख चुका हूँ तो तय है कि बाबा से मुझे बहुत लगाव नहीं है। इसका जवाब है कि जब गाँधी मैदान में लालू या नीतीश की रैली में पचास हजार लोग या तारेगना(2009 में सूर्यग्रहण देखने मैं भी गया था) में पचास हजार लोग आ सकते हैं तो किस बेवकूफ सरकार या पुलिस अधिकारी ने पाँच हजार लोगों की बात को सही और विश्वसनीय मान लिया, नहीं आलोक जी, यह सरकार या पुलिस का झूठ है। एकदम झूठ है। भोजपुरी में उम्मीद है कि आप सब समझ पाएंगे क्योंकि इन सबका जवाब लिख दिया है। कपिल सिब्बल, दिग्विजय सिंह आदि के बयान पर उसमें लिखा है।

    बाबा रामदेव के आंदोलन की नींव ही झूठ पर रखी हुई थी, जिसकी हवा कांग्रेस ने सहजता से निकाल दी। अभी बाबा रामदेव भटकी-भटकी बातें कर रहे हैं। विचारों की स्पष्टता का अभाव तो बाबा में दिख ही रहा है

    यह समझ में नहीं आया। नींव मतलब क्या? और झूठ क्या? कांग्रेस में राजीव, इंदिरा और अब मनमोहन किसी को भाव देने की जरूरत नहीं है।

    यह घोंचू आडवाणी की मांग देखिए माफी किस बात की माफी, मतलब अत्याचार करो और माफी मांगो, कैसी घटिया मांग है। बाबा हों या कोई हो बड़े लोगों के साथ जुड़ना अच्छा नहीं है।

    मनमोहन, कपिल, दिग्विजय, राहुल, सोनिया, प्रतिभा, लालू, पासवान आदि हैं तो गलत और इसका नुकसान इनमें से सबको उठाना पड़ सकता है।

    भारतीय सेना और पुलिस एकदम घटिया हैं। लोग लड़ बैठेंगे यह सुनकर, लेकिन यह मजाक नहीं है सच है। मंगल पांडे नहीं हैं ये सब। ये सब नौकरी करते हैं, देश सेवा नहीं, देश से कोई मतलब नहीं। बस कैंटीन से सस्ता सामान मिल जाए, फायदा मिलता रहे यही है इनका देशप्रेम। मैं तो कहता हूँ कि सेना को फोड़ लें तो भारत एकदिन में ठीक हो सकता है।

    कितने बुद्धिमान इन बातों को सरकार की और कानून की अवहेलना मानते हैं। सरकार जो चाहे कानून बना ले उन सबमें हम मरते रहें यह तो नहीं होना चाहिए। ये बुद्धिजीवी कभी क्रान्ति नहीं कर सकते, यह मेरा दावा है। वैसे मुझे बाबा और इनके आन्दोलन से बहुत कुछ सीखने को मिले रहा है।

    अगर भाजपा के कार्यकाल में यह अनशन होता तब मैं नहीं समझता इससे कुछ खास अच्छा होने वाला था। आन्दोलन को वे भी दबाते या कोशिश करते। भाजपा के चेहरे को मैं समझने की कोशिश करता हूँ।
    आपको एक बात की गारंटी देता हूँ कि कभी भी सरकार को समय नहीं देना चाहिए वरना झूठ-मूठ का आयोग और समिति करते-करते हजार साल लग जाएगा। जिनको रैडिकल चेन्ज लगता है, मैं बाजी लगा सकता हूँ कि उनके अन्दर कोई हिम्मत नहीं कुछ नया करने की। उनके अन्दर अंग्रेजियत का कीड़ा है। और मेरे पूरे समझने और सोचने की शक्ति और मनोविज्ञान यह दावा करते हैं कि अगर ऐसा कहने वाले को शासन थमा दें तो यह एकदम कमजोर शासक साबित होंगे और कुछ नया नहीं कर पाएंगे। हिटलर, बिस्मार्क, कमाल पाशा आदि ऐसे लोग हो नहीं सकते। ठानना होगा तभी कुछ होगा। वरना वास्कोडिगामा को या इस्ट इंडिया कम्पनी को जैसे छूट दिया गया था ये वैसे ही छूट लेते-लेते छुट्टी कर देंगे। थोड़ी दिक्कत हो जाय या थोड़ी-सी हिंसा भी हो जाय तो झेलना होगा लेकिन समय देना कहीं से जायज नहीं।

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