मोदी के बहिष्कार की राजनीती

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अक्षय नेमा मेख//

पिछले दस सालों से लगातार गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के बहिष्कार में लगा ब्रिटेन अचानक उसी मोदी के साथ अपने रिश्तों में प्रगाढ़ता लाने का अवसर ढूढने लगे तो इस बात में जरुर कुछ काला होने की आशंका जताई जा सकती है। इस विषय पर हमारे भारतीय राजनीतिज्ञों को अवश्य विचार करना चाहिए ताकि ये जाहिर हो सके की आखिर खिचड़ी क्या पक रही है?
ब्रिटेन सरकार ने भारत में अपने उच्चायुक्त से मोदी से बात कर आपसी हितों के मुद्दों पर सहयोग की संभावनाएं तलासने को कहा था और जिसपर अमल भी हुआ। ब्रिटेन उच्चायुक्त जेम्स बेवन की मुलाकात मोदी से हुई मगर चिंताजनक बात यह रही कि 2002 में भड़के गुजरात के दंगों के बाद यूरोप के कई देशों सहित ब्रिटेन ने भी मोदी की भूमिका पर नकारात्मक टिप्पणियाँ की थी और मोदी को सवालों के कठघरे में खड़ा करने में जरा भी परहेज नहीं किया था। ब्रिटेन के आलावा अमेरिका ने भी मोदी पर अंगुलियाँ उठाई थी। इन दोनों देशों ने मोदी को कट्टरपंथी तक कह डाला था, मगर आज की स्थिति देखकर यह नहीं लगता कि यह वही ब्रिटेन है जो कल मोदी का बहिष्कार करता था। आशय साफ है अमेरिका ने जिस तरह पहले ही मोदी में भारत के भावी प्रधानमंत्री के दर्शन कर लिए ठीक उसी तरह अब ब्रिटेन भी यही सब करने वाला ज्ञात होता है। कल तक यूपीए सरकार का गुणगान करने वाले ये देश उसकी लड़खड़ाती स्थिति को देख कर ये सब कर रहे हैं और इन दोनों देशों की सबसे बड़ी राजनीती यह है कि ये भारत की कमान एक ऐसे कट्टरपंथी के हाथ में दिलवाना चाहते है जिसकी भूमिका स्वंय संदिग्ध रही हो, अतः भारत को ऐसी राजनीती से बचना होगा।

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